पुस्तक भूमिकाएँ · Book Introductions
प्रत्येक पुस्तक की आत्मा — लेखिका द्वारा स्वयं लिखित भूमिकाएँ।
The soul of each book — introductions written by the author herself.
I invoke Agni, the priest, the divine, the master of the sacrifice, the giver of the greatest treasure.
प्रस्तावना / समीक्षा: मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास
“पुस्तकें मानव द्वारा सृजित समस्त चमत्कारों में सबसे बड़ा चमत्कार है।” — मैक्सिम गोर्की
“आने वाले युगों में कविता की अवश्यंभावी नियति यही है कि वह मानव-मात्र को जोड़ने वाली और जीवन को अर्थ प्रदान करने वाली भूमिका का निर्वाह करे…” — मैथ्यू आर्नल्ड
इस सत्य तथ्य में कोई मत वैभिन्नय नहीं है कि साहित्य और कला द्वारा संस्कृति के समूह विशेष की चेतना का निर्माण और विकास होता है। सांस्कृतिक परिवर्तन और संयोजन का मूलाधार मानवीय चेतना की ऊर्जा कही जा सकती है, जो उसकी सांस्कृतिक सर्जनाओं में निरंतर प्रभावशील रहती है। साहित्य मानवीय संस्कृति का एक विशिष्ट सांस्कृतिक व्यापार तथा संचार प्रबंध है, तो संस्कृति के समूह संचार प्रबंधों के अनुभवी प्रत्यक्षण की एक विलक्षण युक्ति भी है। साहित्य अपने जन्मकाल से ही मानवीय संवेदनाओं के अनुभव तथा संरचनात्मक बोध को व्यवस्थित और संचित करता आया है। साहित्य ने व्यास, वाल्मीकि, तुलसी, सूरदास, कबीर, मीरा और जायसी को सर्जनात्मक धरातल पर सुरक्षित रखा तो भारतेंदु, द्विवेदी, गुप्त, निराला, प्रसाद, महादेवी और दिनकर की सर्जनाओं को भी संभाल कर रखा है। आश्चर्य नहीं कि साहित्य में ही यथार्थ के अंतर्विरोध, अंतर्द्वंद्व एवं सदैव बदलते हुए सामाजिक अर्थ नित्य नई साहित्यिक चेतना के मुहावरे में प्रकट होते हैं। शायद इसीलिए साहित्यिक रचनाओं को रोलां बार्थ ने “सांस्कृतिक चेतना के प्रतिरूप” का नाम दिया है। भारतीय संस्कृति के कुशल चितेरे तुलसी एवं मैथिलीशरण गुप्त की कृतियाँ, विशेषकर 'रामचरितमानस' एवं 'साकेत', भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों तथा सदाजीवी चेतना का एक्स-रे हैं।
यदि रडारनुमा दृष्टि से देखा जाए तो साहित्यिक प्रबंधों में कुछ भी नया नहीं होता, क्योंकि ये वैज्ञानिक प्रबंधों की तरह नहीं होते। साहित्यकार अपने आसपास जानी-पहचानी और पढ़ी-सुनी कहानी को नए प्रबंधों में निर्मित करता है। इसे ही टैरी ईगलटन रूपांतरणों की विचारधारा मानता है और मनुष्य तथा समाज के बीच संरचनात्मक एकसुरता का काम करने वाली शक्ति की संज्ञा देता है। ये रूपांतरण साहित्यिक युगों-युगों से प्रवहमान हैं। तुलसी और गुप्त जी से शताब्दियों पहले राम, सीता, लक्ष्मण और उर्मिला का जीवंत अस्तित्व रहा है। यदि और कसकर कहें तो तुलसी से पहले रामकथा थी और गुप्त जी से पहले 'साकेत' के नागरिक भी थे। यह तो स्व-अनुभवनुभूति, प्रेरणा, प्रभाव एवं विषय निर्वहन का कलात्मक करिश्मा होता है कि रचनाकार की मानसिक कोख रचना-काया बनकर जन्म ले लेती है। यह सुखदानुभूति है कि प्रखर आलोचक एवं बाल साहित्य की मर्मज्ञ विशेषज्ञ डॉ. शकुंतला कालरा ने अपनी सद्यः आलोचना कृति 'मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास' (चिंतन, कलागत साम्य एवं प्रभाव) में अपनी पारखी नज़र से तुलसी एवं गुप्त जी में एक नई दृष्टि, नई चेतना और चकितपरक संवेदना को खोज निकाला है। वे गहरे में रेखांकित करती हैं कि इन कृतिकारों के महाकाव्यों की पाठ संरचनाओं की परिवर्तनशीलता और विस्थापन की बोधक संरचनाओं एवं उनके बीच में परिवेश का संतुलन साफ़ दृष्टिगोचर होता है।
युगीन चेतना और मूल्यांकन
किसी भी साहित्यिक रचना और साहित्यकार का मूल्यांकन युगीन संदर्भों और युगीन चेतना से जुड़ा होता है। तुलसी और गुप्त जी भी इसके अपवाद नहीं हैं। 'रामचरितमानस' एवं 'साकेत' काव्य ग्रंथों में काल की धारा का क्षेत्र अतीत से वर्तमान की ओर ही प्रवाहित नहीं होता है, अपितु वर्तमान से अतीत की ओर भी अपनी धारा का प्रसार करता है। इसी से इनमें काल-स्थान-निरपेक्षता विद्यमानित हुई है। लेवी हाइमन, कवियों की रचनात्मक निरंतरता और नवीन अर्थों के संदर्भ में लिखते हैं, “मानव तो आते और चले जाते हैं। लेकिन जिस साहित्य की सृजना करते हैं, वह उनके उपरांत भी जीवित रहता है और समाज को उत्तेजित करने वाला खमीर बनता है।” इस अकाट्य सत्य को विवेकशील समालोचक डॉ. शकुंतला ने अपनी अद्वितीय आलोचनात्मक कृति में साक्ष्यांकित किया है। उनकी मान्यता है कि परंपराओं और समकालीनता का संबंध गतिशील और जटिल प्रकृति-प्रवृत्ति का धरणी होता है। वे समीक्षात्मक लहज़े के शंखनाद भी कर देती हैं कि तुलसी और गुप्त जी के महाकाव्यों में परंपरा, संस्कृति और समकालीनता का विवेक ही उजागर नहीं होता, अपितु अनिवार्य नैरंतर्य की जीवंत गति भी सुस्थापित होती है।
अपनी प्रस्तुत कृति में शकुंतला जी अपनी परिमार्जित ऐतिहासिक दृष्टि से दूरबीनित करती हैं कि तुलसी और गुप्त जी के काव्य-संसार की जड़ें भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में ही मौजूद हैं और दोनों ही संस्कृति के अमर गायक हैं। समालोचक डॉ. शकुंतला निष्पक्षता से उद्घाटित करती हैं कि परंपरा और संस्कृति का संश्लिष्टीकरण कवि की प्रेरणा बनता है। उत्तर संरचनावादियों से बढ़त लेते हुए वे यह अकाट्य सूत्रबद्ध कथन भी दाग देती हैं कि तुलसी और गुप्त जी ने नवीनता में गतिशील ऐतिहासिक एवं आख्यानात्मक विवेक को पहचानकर नूतन-दृष्टि और ऐतिहासिक चेतना के स्वरूप को लक्षित किया था। इस संदर्भ में टी.एस. इलियट का कहना है, “किसी अकेले कवि या कलाकार का कोई संपूर्ण अर्थ संभव नहीं, उसकी सार्थकता का मूल्य हो चुके कवियों और कलाकारों के संबंधों में ही सार्थक हो सकता है। आप उसका अकेले मूल्यांकन नहीं कर सकते। तुलना के लिए उसमें समस्त हुए कवियों को प्रसंग में रखना भी आवश्यक है। यह एक ऐसा निर्णय, एक ऐसी तुलना है, जिसमें दो वस्तुएँ एक दूसरे द्वारा नापी-तोली जा सकती हैं।”
एक सबल एवं प्रबल मूल्यांकन के रूप में डॉ. शकुंतला पृष्ठांकित करती हैं कि तुलसी और गुप्त जी ने अपनी रचना-दृष्टि की मूल शक्ति किसी विराट प्रेरणा से ही ग्रहण की है। इसीलिए इनके रचनात्मक रूपांतरणों की ऐतिहासिक चेतना का संबंध काल-चेतना की तुलना में संकल्प-चेतना से अधिक जुड़ता है। वे पारदर्शित कर देती हैं कि इस प्रकार की चेतना तभी होती है, जब महाकाव्य में कोई सांस्कृतिक परंपरा सृजनात्मक नैरंतर्य प्राप्त कर युगों-युगों में प्रक्षेपण करती हुई अपनी समस्त सीमाएं लांघ जाती है और नित्य नए सामाजिक संदर्भों में दिखाई देती है।
विश्लेषणात्मक दृष्टि और सांस्कृतिक आकांक्षा
विश्लेषणात्मक आलोचक डॉ. शकुंतला का फ़लसफ़ा है कि वास्तव में मानव-जाति की चेतना और संवेदना सतत प्रवहमान अस्तित्व है जो प्राचीन से प्राचीन संवेदनात्मक रूपों को नए-नए रूप-प्रबंधों में रूपेमान करता है। कहा जा सकता है कि थीमिक सार्थकता का यह रूपांतरण दोहराव मात्र लगता है, लेकिन सुलझी हुई बौद्धिकता-संपन्न डॉ. शकुंतला का वज्राक्षर है कि यह रूपांतरण तो रचनाकार की गहन सांस्कृतिक आकांक्षा की उपज होता है। और सांस्कृतिक मूल्यों में रिश्तों के संकट को एक लावण्य भाषा प्रदान करता है। तुलनात्मक आलोचना-पद्धति की आंच में तपी-पगी शकुंतला जी ने तुलसी और गुप्त जी के व्यक्तित्वों में युग की छाप को खुली आंखों से पहचाना है। नारी होने के नाते वे संवेदना की स्यामिति की अधिकारिणी है और इस अभिव्यक्ति में भी दृढ़ है कि संवेदना वैश्विक स्तर पर समान होती है। नगाड़े की तरह बजते शब्दों में वे शबदांकित कर देती हैं कि शाश्वत प्रकृति एवं प्रवृत्ति की यही मानवीय संवेदना तुलसी और गुप्त जी को साम्य वृत्त में ला खड़ा करती है, भले ही दोनों कवियों की जीवन-रेखा एवं साहित्यिक व्यक्तित्व में वैषम्य तत्वों की मौजूदगी है। यह वैषम्य भी युगीन स्थितियों, काव्य-दृष्टि, निजपन एवं रचनात्मक कल्पना के कारण ही अंकुरित हो सका है।
यूं तो गुप्त जी आधुनिक हिंदी-जगत में बेहद लोकप्रिय रहे हैं और उनके काव्य का साहित्यिक ही नहीं, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी है तथा खड़ी बोली के वे प्रवर्तक, उन्नायक और जन-समाज के प्रतिनिधि रचयिता हैं। जहां वे भारतीय नवोत्थान के पुरस्कर्ता हैं, वहीं मानवतावादी नैतिक-सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि तथा आधुनिक हिंदी-काव्य के अन्यतम प्रबंध-शिल्पी भी हैं। तुलसी में एक युग का प्रतिबिंब है। वे अपने युग की समस्त प्रवृत्तियों के प्रति सजग और सचेष्ट रहे। नवीन जीवन-आदर्शों, मूल्यों एवं सौंदर्यात्मक स्पंदनों की सरगम को तुलसी ने काव्य में स्थान दिया। दोनों कवियों को पढ़ते हुए पाठक को बराबर यही लगता है कि वह काव्य नहीं पढ़ रहा है, अपितु किसी स्थिति, मनःस्थिति और अनुभूत से गुज़र रहा है। इन दोनों कवियों की विशेषता यह है कि इनकी प्रतिश्रुति कविता के लिए है और कविता संकल्पित है पाठकों के लिए। डॉ. शकुंतला की इस आलोचना-पुस्तक की राह से गुज़रते हुए पाठक को भी लगता है कि वह दो काव्य-विभूतियों से एक ऐसे बिंदु पर आकर विमर्श कर रहा है जहां अतीत और वर्तमान का मिलन है।
नारी-मनोविज्ञान और काव्य-बिंब
यह सर्वमान्य है कि प्रकृति ने सृष्टि के विकास के लिए दो रूपों की रचना की है– नारी और पुरुष। नारी सृष्टि का साधन, प्रकृति का मूर्त रूप होकर पुरुष के लिए सौंदर्य, प्रेम और आनंद का आधार बनती है। इसीलिए उसमें देवत्व है और वह शक्ति और चित्ति है। अतः तुलसी और गुप्त जी के काव्य में नारी की अभिव्यक्ति होना सहज एवं स्वाभाविक है। इतिहास और साहित्य में अपने किसी-न-किसी अंश में नारी का गौरव प्रतिष्ठित होता रहा है। मानव-जीवन का प्रत्येक क्षेत्र नारी के अभाव में अपूर्ण है, वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नारी से प्रभावित रहा है। तुलसी और गुप्त जी मानते हैं कि नारी शक्ति है, प्रेरणा है तथा जीवन की आवश्यक पूर्ति है। वह त्याग, बलिदान, सेवा, समर्पण और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है। गृहस्थ का केंद्र-बिंदु तथा परिवार की आधारशिला भी है। नारी का सौंदर्य तथा उसका व्यक्तित्व काव्य, साहित्य तथा इतिहास को प्रभावित करता है। धर्म, समाज और राजनीति तक इससे प्रभावित रहते हैं।
यह सही है नारी-मन को समझना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। लेकिन तुलसी और गुप्त जी ने नारी-मन के इन्हीं भावों, संवेगों और मनोवृत्तियों को काव्य बिंबों के माध्यम से वर्णित किया है। उनकी काव्य-संवेदनाएं उनके सटीक नारी-अनुभव हैं और ये अनुभव काव्य में ढलकर बहुआयामी और बहुस्तरीय हो जाते हैं। डॉ. शकुंतला एक नारी हैं और वे तुलसी और गुप्त जी की नारियों का नारी-मनोविज्ञान बड़ी बारीकी से समझती हैं। एक आलोचकीय मुद्रा में विवेचित करती हैं कि इन दोनों काव्य-मनीषियों के महाकाव्यों में कहीं नारी-तनाव है, कहीं प्रेमिल अनुभूतियां हैं, कहीं उन अनुभूतियों से उपजा दर्द, अवसाद और आत्म-संघर्ष है। कहीं सौंदर्य का इंद्रधनुष है, कहीं जीवन की जद्दोजहद से छटपटाती नारी की मनःस्थितियां हैं, कहीं आक्रोश की आग है और कहीं वैचारिक तपन के परिणामस्वरूप विवेक की आंच है। कहने का प्रयोजन यह है कि तुलसी और गुप्त जी काव्य-जगत में रोमानी भावनाओं को वैचारिक सरणियों तक ले गए हैं। कुछ अनुपात में वैषम्य होते हुए भी दोनों कवियों में नारी-संवेदना की बराबर मैत्री रही है।
तुलनात्मक अध्ययन : सीमाएँ और संभावनाएँ
उल्लेखनीय है कि किसी भी कवि का दूसरे कवि से तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए कुछ सीमाएं होती हैं, यथा– उनके भाव तथा कला पक्ष को लेकर विचार करना ज़रूरी हो जाता है। सुविज्ञ आलोचक डॉ. शकुंतला कालरा ने अपने परिपक्व विवेक और तीक्ष्ण पारखी दृष्टि से तुलसी और गुप्त जी की संवेदनाओं, भावों, शिल्प-वैशिष्ट्य, काव्य-कलात्मकता एवं भाषिक संरचना को भीतर उतर कर देखा-परखा है। कथानाटकात्मक मौलिक उद्भावनाओं और काव्यात्मक दृष्टिकोणों पर भी दृष्टि दौड़ाई है। कृतिकार शकुंतला जी ने तुलसी और गुप्त जी के नारी पात्रों की मानसिकता को अपनी मानसिकता का हिस्सा बनाकर मनोवैज्ञानिक व्याख्या की है। वे नारी के उपचेतन-अचेतन मन की परतों, अनगिनत इच्छाओं, अभिलाषाओं, विचारों, भावनाओं एवं व्यवहार की गहराई तक पहुंची हैं। यही वजह है कि इन नारी पात्रों के अचेतन में दबी, दमित-शमित भावनाएं हृदय तल से तट पर आ प्रकट हुई हैं। इस आलोचना-कृति की जननी की सुदृढ़ मान्यता है कि कविता कवि की प्रतिच्छवि है। यह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें कवि-हृदय की गहराई होती है। वे इस सच्चाई को भी पारदर्शित कर देती हैं कि कविता में से न तो कवि को निकाला जा सकता है और ना ही उसके युग-बोध को। इसीलिए 'रामचरितमानस' और 'साकेत' में, विशेषकर अपना-अपना युग मौजूद है।
भक्ति-भाव की प्रधानता होते हुए भी तुलसी की दृष्टि काव्य की सामाजिक उपयोगिता पर बराबर लगी रही। डॉ. शकुंतला यह कहकर चौंका देती हैं कि कविता पक्षियों के गीतों का कोई मानवीय संस्करण नहीं है, वह तो वाल्मीकि और व्यास है, तुलसी और सूर है, गुप्त और दिनकर है तथा निराला और मुक्तिबोध भी। वे चुपके से यह भी बता देती हैं राम की कल्पना सीता के बिना, लक्ष्मण की उर्मिला के बिना और गौतम की यशोधरा के बिना हो ही नहीं सकती।
राष्ट्रीय भावना और सार्वकालिक महत्ता
इतना और जोड़ना है कि गुप्त जी और तुलसी की सार्वदेशिक और सार्वकालिक महत्ता इस अर्थ में है कि वे अपनी सभी प्रकार की संकुचित सीमाओं से ऊपर उठकर मानव-मात्र के आदर्श को सामने रखकर अपनी सर्वकाव्यात्मक शक्ति का सदुपयोग करते हैं। तुलसी अकबर-कालीन एवं गुप्त जी द्विवेदी-कालीन काव्य-साधना की कालजयी सिद्धि हैं। दोनों ने भारत के अतीत-गौरव के गीत गाए, तो देश की दलित दशा पर दोनों ने तपती प्रतिक्रिया भी ज़ाहिर की। गुप्त जी और तुलसी की राष्ट्रीय भावना का मूल स्रोत एक है और वह है– भारतीय संस्कृति। उनके महाकाव्यों में ध्वनित है कि सच्चरित्रवान और कर्मणीय व्यक्ति से युक्त स्वस्थ परिवार से ही आदर्श समाज की सृष्टि होती है। दोनों काव्य-मनीषी धार्मिक सहिष्णुता के लिए स्वयं आदर्श थे। मूल संवेदनाएं एवं आदर्श समान हैं, एक ही हैं।
गत कुछ वर्षों से यूरोप, अमेरिका एवं भारत के विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक शोध, तुलनात्मक साहित्य-अध्ययन पर अधिक ज़ोर दिया जा रहा है। इस प्रयोजनार्थ स्वतंत्र तुलनात्मक शोध-केंद्र भी स्थापित किए गए हैं। भारतीय साहित्य में तुलनात्मक शोध की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। इस दिशा में स्वतंत्र आलोचनात्मक ग्रंथ भी लिखे जा रहे हैं। डॉ. शकुंतला कालरा का प्रस्तुत आलोचनात्मक ग्रंथ इस संदर्भ में तुलनात्मक शोध, तुलनात्मक साहित्य अध्ययन के नए द्वार खोलता है। निस्संदेह, प्रदीप-पंडित यह अद्वितीय ग्रंथ साहित्य-प्रेमियों एवं शोधार्थियों के नव ज्ञान की जिज्ञासा-पिपासा को तृप्त करने में सक्षम सिद्ध होगा। सही अर्थों में यह कृति आलोचना-मूल्यों की मशाल की मिसाल है।
दो शब्द
“केवल अपने क्षणिक गौरव के लिए नहीं, वरन् अपने देश के अनंत गौरव तथा समग्र मानवता के कल्याण के लिए कार्यरत रहना, इससे अधिक श्रेष्ठ और महान् कार्य और क्या हो सकता है।” — चेर्नीशेव्स्की
मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास दोनों ही हिंदी साहित्य के यशस्वी कवि-चिंतक हैं। दोनों साहित्य-साधकों का हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान है। तुलसीदास केवल 'मध्ययुग' के ही नहीं वरन् समग्र हिंदी साहित्य-जगत की चिरस्मरणीय एक विलक्षण प्रतिभा हैं। वह केवल कवि ही नहीं, भक्त कवि के रूप में जन-जन की वाणी में, वरन् हृदय में भी विराजमान हैं। मैथिलीशरण गुप्त भी 'द्विवेदीयुग' के ही नहीं अपितु समग्र हिंदी साहित्य की यशस्वी प्रतिभा हैं। दोनों हिंदी साहित्य के ज्योति-स्तंभ हैं। दोनों युग-द्रष्टा के रूप में हमारे सामने आते हैं। यह अद्भुत संयोग है कि दोनों रामभक्त हैं और दोनों ने राम-काव्य का प्रणयन किया है। पूर्व-प्रचलित रामकथाख्यान से कथावस्तु ग्रहण करके उसमें युगीन परिप्रेक्ष्य के अनुरूप कथात्मक परिवर्तन किए हैं।
साहित्य की नवीनता नए विषयों की खोज ही नहीं, पुराने विषयों को नया अर्थ देना भी है। रामकथा के मौलिक स्रोत के रूप में उपलब्ध वाल्मीकि 'रामायण' का उपयोग परवर्ती कवियों ने परिवर्तन-परिवर्धन के साथ किया है। 'रामचरितमानस' के मंगलाचरण में 'नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि' कहते हुए तुलसीदास ने रामकथा के विभिन्न स्रोतों से अपने सामग्री-ग्रहण और प्रभाव को इंगित किया है। आगे चलकर 'रामचरितमानस' स्वयं एक स्रोत बन गया, जिसका आधार-ग्रहण कर परवर्ती रचनाकारों ने रामकाव्य का प्रणयन किया। गुप्त जी ने वाल्मीकि–रामायण, तुलसीकृत 'रामचरितमानस' के साथ-साथ पौराणिक, धार्मिक रामायणों, महाभारत, बौद्ध-जैन-ग्रंथ तथा ललित साहित्य की राम-काव्य-परंपरा का खोजपरक अध्ययन किया और अपनी सारग्राही प्रतिभा से रामकथा का स्तुत्य नवीनीकरण किया है। परिणामस्वरूप साकेत केवल गुप्त जी के साहित्यिक जीवन की उत्कृष्ट निधि ही नहीं, आज का बहुचर्चित रामकाव्य भी है। गुप्त जी की रचनात्मकता हिंदी जातीय परंपरा की वाहक है। लेकिन परंपरा गुप्त जी की सीमा नहीं है। रामकाव्य-परंपरा के आदि कवि वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों गुप्त जी की प्रेरणा रहे हैं। उन पर उनका गहरा रंग है। 'रामचरितमानस' गुप्त जी का विशेष प्रिय ग्रंथ रहा है। निश्चय ही वह उनसे सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं। यह प्रभाव उनके सृजन में स्पंदित होता है। वह वस्तु, पात्र, चिंतन और कला सब में न केवल ध्वनित होता है वरन् दिखाई भी देता है। गुप्त जी की काव्य-प्रतिभा ने प्राचीन और नवीन, परंपरा और आधुनिकता के तत्वों को इस तरह समाहित किया है कि वे उनके काव्य-संस्कार बन गए। अपने समय की हर गतिविधि पर उनकी नज़र थी और हर आवाज़ पर कान। अपने परिवेश के प्रति प्रतिक्षण सजग वे लोक-जागरण के कवि थे।
इस संबंध में आचार्य आनंदवर्धन का मत उद्धरणीय है– “यद्यपि तदपि रम्यं तत्र लोकस्य किंचित् स्फुरितमिदमितीदं बुद्धि रम्युज्जिहीते। अनुगतमपि पूर्वच्छायया वस्तु तादृक् सुकवि रूप निबंधनं निन्द्यतां नोपयाति।” अर्थात् जिस कविता में सहृदय 'भावक' को यह सूझ पड़े कि हां इसमें कुछ नूतन चमत्कार है, फिर उसमें पूर्व कवि की छाया ही क्यों न झलकती हो तो भी कोई हानि नहीं। ऐसी कविता के निर्माता सुकवि पुराने भाव को नूतन रूप देने के कारण निंदनीय नहीं समझे जा सकते। यही प्रभाव का वास्तविक रूप है।
डॉ. गुलाबराय के मत में– “अच्छा कवि तो यदि छाया भी ग्रहण करता है तो उसमें एक नवीन जीवन भर देता है।” मैथिलीशरण गुप्त ने भी तुलसी साहित्य से जो कुछ प्रभाव ग्रहण किया उसे अपनी प्रतिभा के बल पर अपनी संपदा बना लिया।
साम्य, प्रभाव और काव्य-शिल्प
भक्त-शिरोमणि महाकवि तुलसीदास और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त दोनों हिंदी काव्य की अन्यतम विभूतियां हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो राम के अनन्य भक्त हैं ही, आधुनिक युग के कवि होने पर भी गुप्त जी रामभक्त हैं। भाव, चिंतन और काव्य-शैली आदि दृष्टि से दोनों में जो अद्भुत साम्य है, वह तुलसीदास का विशेष प्रभाव है। दोनों में साम्य के अनेक बिंदु हैं। दोनों प्रबंधकार हैं। एक प्रबंध-कवि के रूप में गुप्त जी ने तुलसीदास की भांति जीवन के वैविध्य, जटिलता, तनाव, द्वंद्व-सहित गृहस्थ-धर्म को कथा-माध्यम के द्वारा चित्रित किया है। दोनों ने अपने-अपन महाकाव्य को शास्त्रानुमोदित महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत किया है। कथावस्तु, चरित्र, रस, शिल्प और उद्देश्य सभी दृष्टियों से 'रामचरितमानस' एवं 'साकेत' सफल महाकाव्य की श्रेणी में आते हैं। राम का जीवनवृत्त उन्हें सहस्रों वर्षों की समृद्ध परंपरा से प्राप्त था। दोनों ने उसे अपनी विशिष्ट उपलब्धि बनाया। रस की दृष्टि से भी दोनों के काव्य में अनेकरूपता है। तुलसीदास के महाकाव्य का अंगीरस जहां भक्तिरस है वहां गुप्त जी ने मुख्य रूप से करुण और श्रृंगार को स्थान दिया है।
काव्य के चिंतन-पक्ष में मैथिलीशरण और गुप्त जी दोनों में अधिकाधिक समतुल्यता दिखाई देती है। गुप्त जी को भी हम उसी वैचारिक धरातल पर देखते हैं। आदर्शवाद, लोकसंग्रह दोनों की केंद्रवर्ती भावनाएं हैं। भक्ति और अध्यात्म के क्षेत्र में भी दोनों में अद्भुत साम्य है। दोनों आस्था के कवि हैं। आस्तिकता उनकी भाव-निधि है। सांस्कृतिक चेतना का धरातल भी गुप्त जी का वही है जहां तुलसीदास खड़े हैं। भारतीय संस्कृति के शलाका पुरुष के रूप में दोनों हिंदी साहित्य में समादृत हुए हैं। काव्य-सिद्धांत विषयक दृष्टिकोण में भी गुप्त जी को हम तुलसीदास के करीब पाते हैं। दोनों काव्य-सिद्धांत प्रतिपादक आचार्य नहीं थे। काव्याचार्य अथवा काव्य-शिल्प-विधाता न होते हुए भी अपनी कृतियों द्वारा काव्यादर्शों की अभिव्यक्ति भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से दोनों ने की है।
कला एवं कवित्व के क्षेत्र में भी दोनों की उपलब्धि सराहनीय है। दोनों की कला स्वयं में साध्य न होकर साधन मात्र है। दोनों के साहित्यिक परिस्थितियां भिन्न-भिन्न होते हुए भी कला के प्रति दृष्टिकोण में समानता है। काव्य में जितना महत्व कथ्य, वस्तु या भावबोध का है, उतना ही शिल्प का भी। दोनों कवियों ने काव्य में कथ्य-सौंदर्य को द्विगुणित करने वाले शिल्प को उपकारक रूप में स्वीकार किया है। दोनों की अनुभूति और अभिव्यक्ति के मध्य अंतरंग का संबंध है। एक तारतम्य है। दोनों अभिधामूलक कवि हैं। दोनों रसवादी हैं अलंकारवादी नहीं। अंत्यानुप्रास दोनों को प्रिय है। दोनों ने भाषा का संस्कार किया है। दोनों की प्रवृत्ति व्याकरण-सम्मत और भावनाुगामी भाषा के प्रयोग की रही है। सार-संक्षेप यह है कि मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास में बहुत सी समानताएं हैं, जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि गुप्त जी पर तुलसीदास का गहन प्रभाव था। यही कारण है कि हिंदी साहित्य में तुलसीदास के बाद मैथिलीशरण गुप्त ही एक ऐसे कवि रहे हैं जिन्हें जनता ने अपना भरपूर स्नेह दिया और उन्हें अपना कंठहार बनाया।
पठन-पाठन के दौरान गुप्त जी पर तुलसीदास के गहन प्रभाव के मूल्यांकन की कई नई दिशाएं उद्घाटित होती रहीं। कथावस्तु, चरित्र-चित्रण पर प्रभाव तो प्रत्यक्ष है ही किंतु चिंतन और कला के क्षेत्र में भी उनका विशिष्ट प्रभाव है। गुप्त जी 'रामायण' और 'रामचरितमानस' से प्रभावित हैं फिर भी मौलिकता सर्वत्र बनी हुई है। कथावस्तु और चरित्र-चित्रण में युगानुरूप मौलिक उद्भावनाएं गुप्त जी की विशिष्ट उपलब्धि कही जाएगी। वस्तु और चरित्र-चित्रण में साम्य एवं प्रभाव अपने आप में एक अलग पूर्ण विषय है और इस पर मेरी दूसरी पुस्तक 'मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास: वस्तु एवं पात्रपरिकल्पना' भी शीघ्र प्रकाश्य है जिसमें दोनों के रामकाव्य के साथ कृष्णकाव्य का विवेचन-विश्लेषण भी किया गया है। इस कार्य को करने का शुभ संकल्प उदित हुआ किंतु अध्यापन-काल तक यह संकल्प किन्हीं अपरिहार्य कारणों से 'साकार' रूप में प्रतिफलित नहीं हो पाया। हर कार्य का एक निश्चित समय होता है जो ईश्वराधीन है। आज इसे पुस्तक रूप में सुधि पाठकों एवं साहित्य-प्रेमियों को सौंपते हुए मुझे अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरा यह सृजनात्मक प्रयास तुलनात्मक शोध, तुलनात्मक साहित्य-अध्ययन सभी पाठकों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों के लिए एक संदर्भ-ग्रंथ सिद्ध होगा।
यह आलोचनात्मक कृति तुलसी और गुप्त जी के काव्य-संसार को एक नई दृष्टि से उद्घाटित करती है। तुलनात्मक शोध की दृष्टि से यह एक मूल्यवान संदर्भ-ग्रंथ है।
अपनी ओर से: डॉ. दर्शन सिंह आष्ट और उनका बाल साहित्य
बालसाहित्य आज के सर्जनात्मक साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु उपेक्षित विधा है। साहित्य के इतिहास में बालसाहित्य का कहीं कोई स्थान नहीं क्योंकि उसे साहित्य की मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं किया गया। हालांकि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के शीर्षस्थ लेखकों ने उत्कृष्ट बालसुलभ रचनाएं लिखी हैं फिर भी हमारे विद्वानों, अकादमियों तथा प्रौढ़ साहित्य के लेखकों ने भी इसे दूसरे दर्जे का साहित्य ही माना है किंतु आज ऐसा नहीं है। बालसाहित्य के द्रुत गति से बढ़ते कदम हमें आश्वस्त करते हैं कि बालसाहित्य का भविष्य उज्ज्वल है ।
देशभर में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की लगभग दो सौ साहित्यिक पत्रिकाएं मासिक, द्विमासिक अथवा त्रैमासिक रूप में छप रही हैं। केंद्रीय हिंदी निदेशालय से प्रकाशित ‘वार्षिकी’ में भी हर वर्ष की बालसाहित्य की विकास यात्रा पर लेख प्रकाशित होते हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में बालसाहित्य के महत्व एवं उपादेयताविषयक अनेक लेख इस बात का प्रमाण हैं कि आज बालसाहित्य हाशिए पर नहीं है। बालसाहित्य पर अनेक विश्वविद्यालयों में एम.फिल. और पी-एच.डी. की डिग्री हेतु शोधकार्य निरंतर हो रहे हैं। दोयम दर्जे का उपेक्षित विषय नहीं रहा। हिंदी साहित्य के इतिहासलेखकों के लिए इसके महत्व को अब अस्वीकार करना संभव नहीं होगा। हिंदी बालसाहित्य का अपना एक इतिहास होगा। इधर प्रकाशक भी अब इसे छापना घाटे का सौदा नहीं मान रहे और विभिन्न राज्यों की अकादमियां, सरकारी तथा स्वैच्छिक संस्थाएं भी प्रौढ़ साहित्य के समान ही पुरस्कार एवं सम्मान के माध्यम से इसे मान्यता दे रही हैं ।
इधर हिंदी बालसाहित्य पर कुछ करने के लिए मैं लंबे समय से बालसाहित्यकारों के साहित्यिक अवदान का मंथन करती आ रही हूं। बालसाहित्य और बालसाहित्यकार एक दूसरे से जुड़े हैं। बालसाहित्यकार की गरिमा से बालसाहित्य गौरवान्वित होगा और बालसाहित्य की प्रतिष्ठा से बालसाहित्यकार स्वतः प्रतिष्ठित होगा। दोनों एक-दूसरे की पहचान हैं। हिंदी बालसाहित्य को सम्मानित दर्जा दिलाने में विद्याभूषण विभु, स्वर्ण सहोदर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, दामोदर अग्रवाल, निरंकारदेव सेवक, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, सोहनलाल द्विवेदी आदि ने स्वयं को समर्पित कर दिया ।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बालसाहित्य निरंतर अपने विकासपथ पर अग्रसर हो रहा है। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और, प्रेरणादायी महापुरुषों की जीवनियां आदि विभिन्न विधाओं में अपने ऊर्जापूर्ण अवदान से इसे आगे बढ़ाया है। आज हिंदी बालसाहित्य अन्य किसी भी भाषा के बालसाहित्य से होड़ लेने में पूरी तरह सक्षम है। वह आज के तीक्ष्ण आई.क्यू. वाले बालकों के तेवर के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहा है। उसमें विज्ञान, टेक्नोलॉजी सब समाहित है। अब वह केवल किस्से कहानियों तक ही सीमित नहीं रह गया है। विष्णु प्रभाकर, डॉ. देवसरे, डॉ. श्रीप्रसाद, डॉ. प्रकाश मनु, डॉ. जयप्रकाश भारती, डॉ. राष्ट्रबंधु, डॉ. क्षमा शर्मा, डॉ. ऊषा यादव, देवेंद्र कुमार, रमेश तैलंग, कृष्ण शलभ, भैरुं लाल गर्ग, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’, डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, डॉ. दिविक रमेश, डॉ. शकुंतला कालरा, डॉ. सुरेंद्र विक्रम, हूंदराज बलवाणी आदि ने इसे अपने अमूल्य देय से समृद्ध किया है। हिंदी बाल कविता के उल्लेखनीय हस्ताक्षरों में शेरजंग गर्ग, बालस्वरूप राही, सूर्य कुमार पांडेय, सूरज भान गुप्त आदि हैं जिन्होंने हिंदी बाल कविता को विकास के उच्च शिखर पर पहुंचाया है। ये सभी बालसाहित्य के गौरव हैं ।
पंजाबी और हिंदी की लगभग तीन दर्जन पुस्तकों के रचयिता डॉ. दर्शन सिंह आशट लंबे समय से बालसाहित्य लिख रहे हैं। उनकी रचनाओं ने बच्चों में अपना अलग स्थान बनाया है। उन्होंने बच्चों के लिए कहानियां भी लिखी हैं और कविताएं भी। कुछ शोधपरक आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। इनके अतिरिक्त वह एक अच्छे अनुवादक भी हैं। आशट जी में कविता की संवेदना भी है जिसके कारण उन्होंने काव्यानुवाद में विशेष सफलता पाई है। हिंदी से पंजाबी और पंजाबी से हिंदी में उन्होंने अनेक रचनाओं के सफल अनुवाद किए हैं। एक संपादक के रूप में भी उन्होंने कार्य किया है। शिशुगीत के दो संकलन उन्होंने संपादित किए हैं। इस तरह वे बच्चों के भाव-संसार से बहुत करीब से जुड़े हैं। यह पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं के समर्थ रचनाकार हैं। पाकिस्तान के पंजाबी रचनाकारों में भी इनकी विशेष पहचान है। गुरमुखी व शाहमुखी दोनों लिपियों पर उनका समान अधिकार है। ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. दर्शन सिंह जी के हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं के समग्र साहित्य का जब मैंने अध्ययन किया तो मुझे लगा कि इनके साहित्यिक अवदान का बालसाहित्य अध्येताओं द्वारा मनन-मूल्यांकन होना चाहिए ।
अब तक मैंने डॉ. जयप्रकाश भारती और डॉ. राष्ट्र बंधु के बालसाहित्य पर पुस्तकें संपादित की हैं। विभिन्न विद्वानों द्वारा आकलन के बाद अनेक महत्वपूर्ण लेख उस पुस्तक में संपादित हुए हैं। इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए बालसाहित्यकार डॉ. दर्शन सिंह आशट के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक पुस्तक संपादन की योजना बनी। विद्वान लेखकों ने सहयोग दिया और पुस्तक तैयार हो गई। मैं मानती हूं कि इन लेखकों में दर्शन सिंह आशट और उनके बालसाहित्य की सटीक और सम्यक विवेचना हुई है। व्यक्तित्व-विषयक लेखों में उनके मित्रों द्वारा उनके दृढ़ता, गरिमा, साहस, संकल्प आदि विशिष्ट गुणों की चर्चा है जिन्होंने उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचाने में सफलता प्रदान की है। कृतित्वविषयक लेखों में उनके हिंदी बालसाहित्य का विवेचन-विश्लेषण है। डॉ. आशट जी की रचनाओं को पढ़कर मुझे लगा कि वह बालकहानी-लेखन में बेजोड़ हैं। कहानीकार आशट जी का वैशिष्ट्य इस बात में निहित है कि वह जीवन-मूल्यों पर बच्चों को व्याख्यान नहीं देते ।
बच्चों के मन-मस्तिष्क का गहन अध्ययन करके उनकी भोली बातों एवं शरारतों में से कोई विषय चुनकर अपनी कल्पना-शक्ति से उसे कहानी का रूप दे देते हैं। बच्चे के मनोजगत को वह भलीभांति समझते हैं। बच्चा क्या सोचता है, उसकी रुचि, पसंद क्या है, उसकी जरूरत क्या है आदि बातों एवं मानसिक जगत के क्रिया-कलापों को सूक्ष्म दृष्टि से परख कर उसका विश्लेषण करते हैं, डॉ. आशट के पास बच्चे की हर जिज्ञासा का समाधान है। वह बच्चों के मानसिक धरातल पर आए आरोह-अवरोहों के साथ उनके तनावों और उनकी दुनिया की समस्याओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण करते हैं। दर्शन सिंह आशट बच्चों के प्रिय कहानीकार हैं। उनकी कहानियां बच्चों का सहज एवं स्वस्थ मनोरंजन करने में समर्थ हैं क्योंकि वे बच्चों की प्रिय और जानी-पहचानी भावभूमि को स्वयं मानसिक स्तर पर बच्चा बनकर आत्मसात करके लिखते हैं। दर्शन सिंह के पास बच्चों का सा निष्कपट उन्मुक्त होकर हंसने-खेलने वाला मन है। उनमें बालमन की कोमलता, निश्चलता, भोलापन, सरलता आदि गुण हैं। उनकी कहानियों में सरल बचपन बालानुरूप सरल भाषा में अभिव्यक्ति पाता है ।
वह कहानी की भाषा में सरलता और सहजता के पक्षधर हैं। उनकी वर्णन शैली भी सीधी-सादी है। वे ऐसा घटना व्यापार नहीं रचते जिसमें जटिलता हो। बालमनोविज्ञान पर आधारित उनकी कहानियां सांस्कृतिक तथा नैतिकता का सहज प्रभाव छोड़ती हैं। पंजाबी तथा हिंदी भाषा के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को साहित्य की धरोहर देने का नैतिक कार्य किया है ताकि बच्चे अपनी विरासत और परंपराओं को भुला न सकें। वे बच्चों में नई सोच विकसित करने वाले साहित्यकार हैं। हिंदी बालसाहित्य को गौरवपूर्ण विशिष्ट साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने में उनका योगदान उल्लेखनीय है ।
समग्रतः डॉ. दर्शन सिंह आशट का बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व बालसाहित्य के विकास के प्रति गहरी संभावना प्रकट करता है। अपने मौलिक सृजन तथा पंजाबी से हिंदी और हिंदी से पंजाबी में अनुवाद कर उन्होंने क्षेत्रीय भाषा को हिंदी से जोड़ने का स्तुत्य कार्य किया है आशा है अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक भी उनसे प्रेरणा प्राप्त करेंगे ।
बालसाहित्यकारों से जुड़ी मेरी यह स्मृतियाँ पुस्तक में छपी संस्मरण हो गई। लगभग तीन दशकों के सुदीर्घ अंतराल बहुत सी घटनाएँ स्मृति से उतर चुकने की स्थिति में हैं। जीवन-यात्रा के पथ में मिले कई महत्वपूर्ण चेहरे अब धुंधले भी पड़ने लगे हैं। बचपन में मिले कई महत्वपूर्ण परिचय अब आयु के वार्धक्य की परतों में दबते जा रहे हैं। कुछ स्नेहमयी आँखें अभी भी इन धुंधली आँखों में बसी हुई हैं। मेरा प्रयास रहेगा कि उन चित्रों को भी कागज़ पर उतार लूँ ताकि वे स्मृतियाँ भी संस्मरण बन जाएँ।
भूमिका: दिविक रमेश और उनका बाल साहित्य
दिविक रमेश का योगदान और परिचय
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त दिविक रमेश बड़ों के साहित्य के जाने-माने वरिष्ठ, चर्चित एवं प्रतिष्ठित कवि-लेखक हैं। विशेष रूप से उनकी प्रतिष्ठा कवि के रूप में तो सिद्ध है ही, इसके साथ ही बालसाहित्य-सृजन और समीक्षा दोनों रूपों में उनका स्थान अग्रिम पंक्ति में माना गया है। बच्चों के लिए कविता, कहानी, नाटक आदि विविध विधाओं में उन्होंने लगभग 32 पुस्तकों की रचना की है। उन्होंने कोरियाई भाषा से हिन्दी में सशक्त अनुवाद किया है और लोककथाओं एवं कविताओं का हिन्दी में प्रस्तुतिकरण भी किया है, जिसमें वहाँ के जन-जीवन की झाँकी, उस देश के रीति-रिवाज और खान-पान आदि का प्रामाणिक परिचय प्राप्त होता है।
बालसाहित्य में नई शैली और नए-नए प्रयोग करने वाले दिविक जी के बालसाहित्य के विविध आयामों का विस्तृत फलक एक गंभीर अध्ययन की अपेक्षा रखता है। उनकी रचनाधर्मिता को देखते हुए और उनके समग्र बालसाहित्य के सर्वेक्षण-मूल्यांकन के बाद मुझे महसूस हुआ कि वह ऐसे समर्पित साधक हैं जिन्होंने बालसाहित्य के विकास तथा समृद्धि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बालसाहित्य-साधना में दत्तचित्त दिविक जी इसके उत्थान में अपना ऐतिहासिक महत्व रखते हैं। इस पुस्तक के माध्यम से बालसाहित्य में रुझान रखने वाले तथा शोध करने वाले विद्यार्थियों के साथ 'साहित्य-समीक्षक एवं इतिहास-लेखक' भी यह जान सकेंगे कि बालसाहित्य में उत्कृष्ट लेखन हो रहा है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन में निश्चय ही यह अपना न्यायोचित स्थान प्राप्त कर लेगा।
बाल साहित्य की स्थिति में बदलाव
बालसाहित्य को साहित्य की मुख्य धारा में सम्मिलित नहीं किया गया। शायद यही कारण है कि हिन्दी में स्थापित और प्रतिष्ठित साहित्यकार बालसाहित्य लेखन से परहेज करते आए हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास-ग्रंथों में भी बालसाहित्य हाशिए पर ही रहा है। उसे दोयम दर्जे का मानकर सदा अवहेलित किया गया है। किंतु आज स्थिति बदल रही है। पूरे देश में सरकारी तथा स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा गोष्ठियों और सेमिनारों में बालसाहित्य पर परिचर्चाओं के माध्यम से उस पर विचार-विमर्श हो रहा है। बड़ों के साथ बालसाहित्यकारों के साहित्यिक अवदान को भी रेखांकित करते हुए उन्हें पुरस्कृत और सम्मानित किया जा रहा है।
अब बड़े-बड़े प्रकाशक भी बच्चों के साहित्य को सम्मानपूर्वक प्रकाशित कर लेखकों को रॉयल्टी के रूप में उचित मानदेय दे रहे हैं। रेडियो, टेलीविजन तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक साधन भी बालसाहित्य की रचना में दत्तचित्त हैं। ये सारी बातें बालसाहित्य की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त हैं। अब यह साहित्य की अवहेलित विधा नहीं रह पाएगा। शीघ्र ही साहित्य की मुख्यधारा में यह सम्मिलित हो जाएगा। हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखकों के लिए इसके महत्व को अस्वीकार करना संभव नहीं होगा। हिन्दी बालसाहित्य का अपना अलग इतिहास होगा। देश के कुछ भागों में बाल-साहित्य-शोध-केन्द्रों की स्थापना एवं बालसाहित्य पर अनेक विश्वविद्यालयों में एम.फिल. व पी-एच.डी. की डिग्री हेतु जो शोध-कार्य निरंतर हो रहे हैं, वे उसकी स्वतंत्र सत्ता को दर्शाते हैं।
बाल मनोविज्ञान और दिविक जी की लेखनी
बालसाहित्य बच्चे की बहुत बड़ी ज़रूरत है। सरस, रुचिपूर्ण और मनोरंजक बालसाहित्य की पुस्तकें उसके लिए वह काम करती हैं जो संभवतः माता-पिता या शिक्षक भी नहीं कर सकते। बालसाहित्य बच्चे की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। उसकी जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का सरल ढंग से समाधान करता हुआ उसका मार्गदर्शन भी करता है। देखा गया है कि बालक कहानी के माध्यम से आसानी से सीखता है। यथार्थ जीवन की क्रूरता और निष्ठुरता से घबराया बच्चा काल्पनिक परिकथाओं में आशा को ढूँढ़ता है। जब असंभव को संभव बना देता है तब किसी प्रतिकूल स्थिति में अपने भीतर शक्ति और साहस जुटाने के लिए रहस्य-रोमांचपूर्ण कथाओं का अवलंब भी उसे सुखद लगता है। दुनिया को समझने के लिए उसे यथार्थ कहानियों की भी ज़रूरत पड़ती है।
दिविक जी का मानना है कि कहानी में रोचकता और कल्पनाशीलता हो तो वे कहानियाँ बच्चों को भाएँगी। विस्तृत विषयफलक पर आधारित उनकी बाल कहानियाँ अपने इसी गुण के कारण बच्चों को आकर्षित करती हैं। शिल्प, भाषा एवं प्रस्तुति की दृष्टि से ये सफल कहानी की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। उन्होंने बच्चों के मनोविज्ञान को समझकर अपने अनुभव को बच्चों की अनुभूतियों से जोड़कर उन्हीं की भाषा में लिखा है। बालकों की रुचि, योग्यता, प्रतिभा को दृष्टि में रखकर कौतूहल एवं जिज्ञासापूर्ण बालसाहित्य का सृजन किया है जो बालकों का मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन करता है। बाल कविता, कहानी और नाटक में उन्होंने विविध प्रयोग किए हैं। इस बात पर सदा बल दिया कि उनका बालसाहित्य चाहे किसी भी विधा में हो, वह बच्चों की समस्याओं का प्रतिपादन करे और बाल-परिवेश से जुड़ा हो। दिविक जी ऐसे साहित्यकार हैं जो बदलते जीवन-मूल्यों, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश के अनुरूप साहित्य-सृजन के पक्षपाती हैं।
बालसाहित्य के लिए आवश्यक है बचपन की खोज। उसके लिए बच्चों की मानसिकता को समझना होगा। उसकी संवेदना को महसूस करना होगा। यानी पूर्णतः बालमना होकर लिखना होगा, तभी श्रेष्ठ रचना जन्म लेगी। दिविक जी ने बच्चों के रूबरू होकर लिखा है। बच्चा बनकर लिखा है। वे बच्चों के आज के जीवन से परिचित हैं। उनकी ज्ञान-लब्धि में आए अंतर से भी अनभिज्ञ नहीं हैं। अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति भी आस्थावान हैं और आधुनिकता-बोध के भी पक्षधर हैं। वह अपने बचपन को भी नहीं भूले हैं और बच्चों के आज के जीवन को भी पढ़ रहे हैं, साथ ही भविष्य के बालक की कल्पना भी मस्तिष्क में लिए हैं। उनकी कविताओं में युगानुरूप प्रतिमान हैं। बच्चों का नया भाव-बोध है। परिवेशगत परिवर्तन को वहाँ स्पष्ट देखा जा सकता है। दिविक जी ने छोटे बच्चों के लिए गेय, सरल एवं कल्पना-प्रधान अनेक सुंदर शिशुगीत भी लिखे हैं जो अपनी लयबद्धता में अद्वितीय हैं।
कविता-कहानी के अतिरिक्त वह नाटक के क्षेत्र में भी उतरे हैं। संप्रेषण के दृष्टि से नाटक बच्चों के लिए अत्यंत उपयोगी विधा है। आज का जीवन विभिन्न समस्याओं से उलझा हुआ है। बदलते समाज की स्थितियों को उजागर करता उनका नाटक 'बब्बू हाथी का बालघर' है जिसमें मानव स्वभाव का सूक्ष्म एवं पारदर्शी चित्रण है। बालसाहित्य में दिविक जी का योगदान अपनी मौलिकता और विशिष्टता के कारण महत्वपूर्ण है। उनका बालसाहित्य अत्यंत विस्तृत है, विद्वानों द्वारा उसका आकलन विविध कोणों से किया गया है। दिविक जी का व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही बहुआयामी हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए जिसे मैंने सात खंडों में विभक्त किया है।
पुस्तक की संरचना (सात खंड)
प्रथम खंड: इसमें व्यक्तित्व के विविध पहलुओं का उनके विद्वान साहित्यिक मित्रों द्वारा किया गया विश्लेषण है। एक संवेदनशील साहित्यकार के रूप में, एक योग्य प्रवक्ता के रूप में तथा एक कुशल प्रशासक के रूप में अलग-अलग भूमिकाओं का उन्होंने कितनी कुशलता से निर्वाह किया है इसका परिचय 'व्यक्तित्व के आईने' में है।
द्वितीय खंड: 'लेखकीय वक्तव्य' है जिसमें बालक और बालसाहित्य से जुड़े दिविक जी के अनेक सारगर्भित आलेख हैं। समय-समय पर लिखे गए और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों में से इन कुछ लेखों में बालसाहित्य का स्वरूप और उसकी दशा-दिशा पर प्रकाश डाला गया है। विचारों में प्रौढ़, निश्चय ही ये लेख बालसाहित्य-शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपादेय सिद्ध होंगे।
तीसरा खंड: 'कृतित्व-मूल्यांकन' है। विषय के विशेषज्ञ विद्वज्जनों द्वारा उनके बालसाहित्य से जुड़ी रचनाधर्मिता का विवेचन-विश्लेषण है।
चौथा खंड: 'पुस्तक-परिचय' शीर्षक से है, जिसमें दिविक जी की चुनी हुई कुछ पुस्तकों का समीक्षात्मक मूल्यांकन है।
पांचवें खंड: इसमें 'साक्षात्कार' विधा के माध्यम से दिविक जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व को स्वयं उनके द्वारा परिभाषित किया गया है। इनमें कृतिकार दिविक जी के सृजन-क्षणों का साक्षात्कार है। उनमें उनकी रचना-प्रक्रिया अपने वैचारिक उन्मेष के साथ उद्घाटित हुई है। 'बातचीत' में उनका बचपन भी खुला है जो अत्यंत प्रीतिकर है। ये साक्षात्कार औपचारिकता से दूर अत्यंत आत्मीय हैं जिनमें उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं की झाँकी है। निश्चय ही ये साक्षात्कार रचनाकार के अन्तःसाक्ष्य के आधार पर उनका प्रामाणिक जीवन-परिचय और कृतित्व-परिचय देने में सहायक सिद्ध होंगे। यह परिचय सर्वांगपूर्ण है, ऐसा मेरा दावा नहीं। चंद मुलाकातों में सब समाविष्ट नहीं हो सकता। बहुत से पक्ष अनावृत रह जाते हैं, जिससे सदा संवाद की गुंजाइश बनी रहती है। ये साक्षात्कार दिविक जी और उनके साहित्य से पाठकों को आंशिक रूप से सही, रूबरू अवश्य कराएँगे।
छठे खंड: 'कुछ विचार' के अंतर्गत कृतिकार के विषय में विशिष्ट महानुभावों के समय-समय पर व्यक्त किए गए विचार संकलित हैं।
सातवें खंड: इसमें अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित दिविक जी के बालसाहित्य-विषयक कुछ झलकियाँ हैं।
परिशिष्ट: इसके अंतर्गत दिविक जी एवं संपादक का संक्षिप्त परिचय है।
आभार एवं शुभकामनाएँ
इस कार्य को पूर्ण करने में दिविक जी के सहयोग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। अपनी सारी पुस्तकें, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित दुर्लभ सामग्री उपलब्ध कराई। इस सहयोग के द्वारा उन्होंने अनेक बालसाहित्य के अनुसंधानार्थियों को कृतार्थ किया है। दिविक जी का बालसाहित्य दिविक जी की संपदा के साथ समस्त बालसाहित्य की संपदा है।
पुस्तक से जुड़े सभी सुधी विद्वानों की मैं हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने उनके व्यक्तित्व की अनछुई दुर्लभ झाँकियों का दर्शन कराया है और उनके बालसाहित्य में खिलखिलाते बालक और उसके बचपन की निश्छल छवि को भी उजागर किया।
प्रो. निर्मला जैन, डॉ. प्रतिभा मुदलियार, दामोदर अग्रवाल, क्षमा शर्मा, बालकरराम नागर, श्री रत्नप्रकाश शील, डॉ. राष्ट्रबंधु, जयप्रकाश भारती, डॉ. प्रेम जनमेजय, डॉ. प्रकाश मनु, डॉ. नागेश पांडेय 'संजय', विश्वमोहन तिवारी, मधु जगमोहन, संतोष खन्ना, अशोक कुमार, अहद प्रकाश, श्याम सुशील, डॉ. आलोक रंजन, फिगार बुलंद शहरी, मजीद अहमद, देवेन्द्र कुमार 'देवेश', यशी तथा सभी साहित्य-पारखी पुस्तक-समीक्षकों का भी मैं धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने दिविक जी तथा उनके बालसाहित्य-विषयक उपयोगी आलेख प्रेषित कर अपना सहयोग दिया।
दिविक जी निरंतर लिख रहे हैं। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनकी लेखनी आजीवन इसी प्रकार सक्रिय रहे और वह अपनी नित-नूतन भाव-ऊर्मियों से बाल पाठकों को तरंगित करती रहे, साथ ही हिन्दी बाल-साहित्य को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाए।
अंत में मैं 'यश प्रकाशन' के प्रकाशक श्री शांति स्वरूप शर्मा जी का धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित कर बालसाहित्य प्रेमियों को ऐसा सुंदर, उपयोगी एवं कालजयी उपहार दिया है जो भविष्य में हिन्दी बालसाहित्य का उज्ज्वल परिदृश्य लिखने में सहायक सिद्ध होगा।
इसी कामना और विश्वास के साथ,
डॉ. शकुंतला कालरा