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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

भक्त शिरोमणि तुलसीदास और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त · भूमिका

भक्त शिरोमणि तुलसीदास और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

रामकथा · परंपरा · नवीनता — एक तुलनात्मक दृष्टि

भक्त शिरोमणि महाकवि तुलसीदास और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त दोनों हिंदी काव्य की अन्यतम विभूतियाँ हैं। दोनों राम के अनन्य भक्त हैं और उन्होंने रामकथा का प्रणयन किया है। रामकथा भारतीय साहित्य की आदि कथा है, जिसका सूत्रपात सर्वप्रथम इक्ष्वाकुवंशीय संतों द्वारा आख्यान-काव्य के रूप में हुआ। यही कथा ‘वाल्मीकि रामायण’ का आधार बनी, जिसने आगे चलकर हिंदी भाषा ही नहीं, अहिंदी भाषी भारतीय एवं अभारतीय पाठकों को भी काव्य एवं चिंतन की दृष्टि से बहुत प्रभावित किया। जब हम गुप्त जी और तुलसीदास के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो दोनों में पर्याप्त सादृश्य-संबंध पाते हैं जो वस्तु, भाव, विचार एवं शैली सभी स्तरों पर है।

‘रामचरितमानस’ के मंगलाचरण में ‘नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि’ कहकर कथास्रोत की तुलसीदास की यद्यपि स्पष्ट घोषणा है तथापि वाल्मीकि की रामकथा ही ‘मानस’ का प्रमुख आधार बनी। इसी प्रकार मैथिलीशरण गुप्त के पूर्व अनेक रामकाव्यों की रचना हो चुकी थी। किंतु गुप्त जी ने अपनी सारग्राहिणी प्रतिभा के बल पर अपने पूर्व के संस्कृत एंव हिन्दी के महाकाव्यों से सामग्री-ग्रहण करते हुए भी प्रमुख प्रेरणास्रोत के रूप में तुलसीदास तथा उपजीव्य ग्रंथ के रूप में ‘रामचरितमानस’ को ग्रहण किया है।

किसी भी रचनाकार के साहित्यिक व्यक्तित्व के गठन में उसके परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके साथ ही व्यक्ति को दिशा एवं दृष्टि देने में कोई विशेष विभूति होती है, जिसके व्यक्तित्व-कृतित्व से प्रभावित हो वह उससे ऊर्जा एवं पोषण ग्रहण करता है। गुप्त जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर महान रचनाधर्मी रामभक्त तुलसीदास का प्रभाव है जहां से उन्होंने प्रेरणा ग्रहण की। यही कारण है कि मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास दोनों कवियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर प्रभाव के अनेक अन्त:सूत्र दिखाई देते हैं। उनके ‘साकेत’ पर ‘मानस’ का विशेष प्रभाव है किंतु मानस के अतिमानवीय प्रसंगों को युगानुरूप व्याख्यायित करके उनकी स्वाभाविकता की रक्षा की है। कहीं-कहीं तो प्रत्यक्ष भावानुवाद ही प्रतीत होता है। ‘रामचरितमानस’ की कथा को आधार रूप में ग्रहण करते हुए कवि ने साकेत और अपने अन्य रामकाव्यों में उसे मौलिक रूप में प्रस्तुत किया है। अपनी कल्पना द्वारा अनेक नवीन उद्भावनाएं करते हुए उन्होंने कवि-कला का आदर्श प्रस्तुत किया है। तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’ के साथ-साथ पौराणिक धार्मिक रामायणों, महाभारत, बौद्ध-जैन-ग्रंथ तथा ललित साहित्य की राम-काव्य परंपरा का खोजपरक अध्ययन किया और अपनी सारग्राही प्रतिभा से उसका स्तुत्य नवीनीकरण किया।

‘साकेत’ की भावभूमि युगानुरूप एवं आधुनिकता-सम्पन्न सामयिक है। साहित्य की नवीनता नए विषयों की खोज ही नहीं, पुराने विषयों को नया अर्थ देना भी है। कुछ चरित्र, कुछ घटनाएं तथा कुछ प्रसंग राम एवं कृष्णकाव्य को नए रूप में प्रस्तुत करते हैं किंतु साथ ही कथा का मूलरूप इनमें विद्यमान है। सभी रामकाव्य-प्रणेताओं ने यह एक मत से स्वीकार किया है कि वाल्मीकि से लेकर आधुनिक काल तक यत्किंचित परिवर्तन-परिवर्तन के बाद भी रामकथा मूलतः एक है, जिसमें भारतीय संस्कृति की सफल अभिव्यक्ति हुई है। रामकथा में परिवर्तन का कारण कवि का निजी दृष्टिकोण है। रचनाकार पुनर्सृजन करता है। वह एक रचना को आधार बनाकर उसे अपनी कल्पना के अनुरूप नया रूपाकार देता है, किंतु साथ ही यह भी ध्यान में रखता है कि उसकी ऐतिहासिकता कहीं खंडित न हो। यही मैथिलीशरण गुप्त ने किया है। साकेत में शैलीगत नए प्रयोग हुए हैं। परंपरा और आधुनिकता दोनों को अपनाते हुए उन्होंने युगधर्म के बीच समन्वय स्थापित कर रामकथा का पुनराख्यान किया है। घटनाओं की बौद्धिक व्याख्या की है। अपने देश एवं युग-परिवेश के अनुसार प्राचीन कथा को पुनर्व्यक्त किया है। रामकाव्य-परंपरा का अनुसरण करते हुए युगबोध के प्रभाव से नवीन उद्भावनाएं की हैं, किंतु ऐतिहासिक संदर्भों की कहीं क्षति नहीं होने दी। प्राचीन रामकथा की घटनाएं राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक रूप में विकसित हुई हैं। कहीं भी कवि का इतिहासबोध या मूल स्रोत सृजनात्मकता में छूटता नहीं है। वस्तु, पात्र एवं शिल्प सभी दृष्टियों से साकेत एक नूतन प्रयोग है।

‘वाल्मीकि-रामायण’ में जो रामकथा यथार्थाश्रित थी वह ‘मानस’ में आदर्श प्रधान हो गई। ‘रामचन्द्रिका’ में केशव ने राम को अवतार मानकर उन्हें मानवीय धरातल पर राजाओं के अनुरूप ऐश्वर्यमय रूप में प्रस्तुत किया। ‘साकेत’ में आकर वह आर्य-संस्कृति के प्रतिस्थापन की कथा बन गई। वाल्मीकि के कथानायक राम पुरुषोत्तम राम हुए तो मानस में आकर त्रिदेवों से ऊपर वह पूर्ण परात्पर ब्रह्म के अवतार रूप स्वीकार किए गए। ‘मानस’ में राम स्वयं अपने को सृष्टि का कर्त्ता बताते हैं— ‘मम माया सम्भव संसारा। जीव चराचर विविध प्रकारा।’ मानस के अधिकांश पात्र राम के अलौकिक रूप से परिचित हैं। ‘रामचन्द्रिका’ में राम के लौकिक तथा अलौकिक दोनों रूपों का चित्रण हुआ है यद्यपि यहां केशव ने राम के अवतार को ‘मानस’ जैसा विस्तार नहीं दिया। दरबारी कवि होने के प्रभाव-स्वरूप उन्होंने राम के ऐश्वर्य रूप का अधिक चित्रण किया है। गुप्त जी ने राम में ईश्वरत्व की स्थापना की है। उन्होंने ईश्वर को लीलावतारी मानव न दिखाकर मानव में ही ईश्वरता की शक्ति को प्रस्थापित किया है। इस तरह युगानुरूप दृष्टि सम्पन्न गुप्त जी ने देवत्व के स्थान पर मानव के महत्व को प्रतिष्ठित किया। राम की जीवन-लीला मानव रूप में अनुकरणीय है।

‘साकेत’ पर गांधी विचारधारा का प्रभाव भी पात्रों के माध्यम से स्पष्ट देखा जा सकता है। राम को आर्य-संस्कृति के प्रसारक के रूप में गुप्तजी ने उन्हें प्रस्तुत किया है। गांधी जी भी गुप्त जी के प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। उनके सत्याग्रही स्वभाव में गांधी जी की विचारधारा ही मुखरित हुई है। पात्रों में आत्मोत्सर्ग, स्वावलंबन आदि की प्रकृति गांधी जी के चिंतन का परिणाम है, गुह, कोल, किरात, भील, ऋक्ष, वानर जैसे निम्न वर्गों के प्रति राम-सीता के स्नेह-सम्मान में गांधी जी का अछूतोद्धार का संदेश ध्वनित है।

आर्य सभ्यता के अभ्युदय के लिए सचेष्ट गुप्तजी राम के रूप में मानो स्वयं ही शब्द देते हैं— ‘मैं दूंगा अब आर्यत्व उन्हें निज कर से।’ निशाचरों के वध के बाद साकेत में आर्य-संस्कृति की प्रतिष्ठा से कवि आश्वस्त है— ‘आर्य सभ्यता हुई प्रतिष्ठित, आर्य-धर्म प्रशस्त हुआ।’

विशेष ध्यातव्य है कि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘साकेत’ में ही रामकथा का नवीनीकरण नहीं किया ‘पंचवटी’, ‘प्रदक्षिणा’, ‘लीला’ में भी गुप्त जी की यही आधुनिक दृष्टि दिखाई देती है। ‘पंचवटी’ के चिरपरिचित शूर्पणखा-आख्यान को नवीन सांचे में ढालकर मौलिक रूप में प्रस्तुत किया है पर कथा का मूल स्रोत ‘मानस’ जैसा है। स्वाभाविकता लाने के लिए कवि ने यहां समय बदल दिया हैं। ‘रामचरितमानस’ में शूर्पणखा दिन में आती है, किंतु पंचवटी में उसका आगमन रात्रि के तीसरे पहर में होता है। असत् पक्ष की प्रबलता दिखाने-हेतु गुप्तजी ने रात्रि का वातावरण रखा है। यहां गुप्त जी ने मनोवैज्ञानिक धरातल को आधार बनाया है। इस प्रस्ताव के लिए यही वातावरण उपयुक्त था। ‘प्रदक्षिणा’ रामकथा पर आधारित गुप्तजी का एक दूसरा विवरणात्मक काव्य है। जिसमें रामजन्म से लेकर राज्याभिषेक तक की कथा का अत्यंत संक्षेप में वर्णन है। इसमें गुप्त जी की दास्यभक्ति को अभिव्यक्ति मिली है। तुलसीदास की भांति गुप्तजी ने भी इस काव्य ग्रंथ में राम के चरणों में अपनी भक्ति व्यक्त की है। इसका समस्त घटनाक्रम भी ‘मानस’ अनुवर्ती है, ‘साकेत’ का नहीं। एक अन्य गीतिनाट्य ‘लीला’ भी गुप्तजी की रामकथा से संबद्ध रचना है जिसमें ‘मानस’ के बालकांड की घटनाओं का संक्षेप में चित्रण है। इस प्रकार गुप्त जी के रामकाव्यों के आधार-ग्रंथ ‘वाल्मीकि रामायण’ और तुलसी के ‘रामचरितमानस’ रहे हैं। हां, कथा के विकास के लिए कवि ने भवभूति के ‘उत्तररामचरित’ एवं कालिदास के ‘रघुवंश’ को भी अपनाया है।

तुलसीदास और गुप्तजी की एक सामान्य विशेषता यह है कि वे दोनों समन्वयवादी कवि हैं। रामभक्त होते हुए भी दोनों ने कृष्णकाव्य का प्रणयन किया है। तुलसीदास के गीतिकाव्य ‘श्रीकृष्णगीतावली’ और गुप्त जी के द्वापर में दोनों ने स्फुट रूप से कृष्ण का चरित्र एवं उनसे सम्बद्ध घटनाओं को काव्यबद्ध किया है। गुप्त जी की रचनात्मकता हिंदी की जातीय परंपरा को सर्वत्र साथ लेकर चलती है, लेकिन परंपरा कहीं कवि की बेड़ियाँ नहीं बनतीं। उन्होंने बिल्कुल नवीन और मौलिक उद्भावनाएं भी की हैं। उनका काव्य एक ओर परंपरा के अजस्त्र स्रोत से जीवन-रसधारा ग्रहण करता है तो दूसरी ओर प्रयोगों के नवोन्मेष का द्योतक भी हैं, प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः गुप्तजी तुलसीदास के रामकाव्य के साथ कृष्णकाव्य से भी अनेक प्रभावों और प्रेरणाओं के वाहक रहे हैं। तुलसीदास की प्रतिपाद्य वस्तु एवं चरित्र-चित्रण का प्रभाव गुप्त जी के रचनाकार व्यक्तित्व पर विशेष रूप से दृष्टिगत होता है, जो उनकी रचनाओं में स्थान-स्थान पर उभर कर आया है। इसके साथ स्थान-स्थान पर उन्होंने अपनी मौलिकता द्वारा उसे नया अर्थ भी दिया है।

वस्तु एवं चरित्र-चित्रण में तुलसीदास और गुप्त जी दोनों में अधिकाधिक समतुल्यता दिखाई देती है। संवेदनशील कवि गुप्त जी की संवेदना और कौशल से न केवल पुराने कथावृत्त नई दीप्ति से चमक उठे वरन् विस्मृत और उपेक्षित चरित्र भी जीवंत हो उठे हैं। उर्मिला हो या कैकेयी कवि की सहानुभूति पाकर न केवल काव्य में महत्वपूर्ण स्थान पर आ विराजती हैं वरन् पाठकों के हृदय में भी चुपके-चुपके अपनी जगह बना लेती हैं। प्रमुख पात्रों के समान ही गुप्त जी ने गौण पात्रों को भी अपनी संवेदना की दीप्ति से आभाबंडलित किया है। ‘शबरी’ मानस की गौण पात्र होते हुए भी आभाबंडलित प्रमुख पात्रों से कम नहीं। राम की प्रतीक्षा में उसका धैर्य उल्लेखनीय है। गुरु के प्रति उसकी अपार श्रद्धा है। उसे पूर्ण विश्वास है कि राम आएंगे। वह अपनी राम के प्रति भक्ति के दीप को संशय की हर हवा से बचाकर रखती है। राम उसकी सर्वाधिक पात्रता को जानकर ही उसे नवधाभक्ति का उपदेश देते हैं। शबरी के बेर उसकी भक्ति है। बेर शबरी का और शबरी बेर का पर्याय है। वह राम को बेर भेंट करती है। निम्नवर्ग की होते हुए भी वह सवर्णों से भी ऊंची उठ जाती है। प्रमुख पात्र हो या गौण, पुरुष पात्र हो या स्त्री पात्र सभी को गुप्त जी ने मानवीय धरातल पर चित्रित किया है। यही स्थिति ‘यशोधरा’, ‘विष्णुप्रिया’, ‘शकुंतला’, ‘रत्नावली’ आदि गुप्त जी के दूसरे काव्यों के नारी-चरित्रों की है जो कवि की संवेदना की आंच में तप कर कुंदन बन गए। इन पात्रों के माध्यम से कवि ने नारी-संवेदना और नारी-मनोविज्ञान को दिखाया है। नारी के दर्द को वाणी दी है।

गुप्त जी की काव्य-चेतना में वस्तु एवं पात्र-परिकल्पना युगानुरूप परिवर्तित, परिवर्धित एवं परिमार्जित होती रही है। ‘रामचरितमानस’ में ‘राम’ का वृत्त इस महाकाव्य का प्रमुख प्रतिपाद्य है और आधिकारिक कथा भी। जबकि ‘साकेत’ की प्रेरणा कवि को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के निबंध— ‘कवियों की उर्मिला-विषयक उदासीनता’ से ही मिली और यही कारण है इसमें उर्मिला और उसके चरित्र को प्रधानता दी गई है। साकेत चरित्र-प्रधान महाकाव्य है। इसमें घटित घटनाएं चरित्र-विकास में सहायक होती हैं। इसकी प्रत्येक घटना प्रमुख पात्र उर्मिला के चरित्र-विकास में सहायक बनी है। उर्मिला के चरित्र द्वारा गुप्तजी ने नारी-प्रतिष्ठा और नारी-गरिमा की स्थापना की है। यह भी सत्य है कि गुप्त जी के आराध्य राम थे और ‘रामायण’ तथा ‘रामचरितमानस’ उनके उपजीव्य ग्रंथ थे फिर भी ‘साकेत’ विद्वानों के बीच रामकाव्य के रूप में ही चर्चित है। राम की कथा भी उर्मिला-लक्ष्मण की काव्य-धारा के साथ-साथ आगे बढ़ती है। मुख्य पृष्ठ पर राम के प्रति प्रणति-निवेदन कर रामभक्त गुप्तजी ने उन्हें मुख्यकथा का अधिनायक बना दिया है— ‘राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है।’ इस प्रकार पौराणिक संवेदनाओं को आत्मसात् करते हुए कवि ने युगानुरूप प्रस्तुति की है। इसमें न केवल रामकथा सर्वथा नवीन एवं मौलिक ढंग से प्रस्तुत की गई है वरन् राम को भी नए रूप में चित्रित किया है।

गुप्त जी ने सभी पौराणिक पात्रों को मानवीय रूप में चित्रित किया है। राम और सीता दैवी पात्र हैं किंतु साकेतकार ने उन्हें मानवीय पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है। एक मानवी की तरह सीता कोल-किरात भील-बालिकाओं को कातना-बुनना सिखाती हैं। राम जंगली जातियों को आर्यत्व प्रदान करने के लिए संकल्पबद्ध हैं। इसी प्रकार लक्ष्मण शेषनाग के अवतार न होकर राम के आदर्श अनुज, उर्मिला के प्रेमी और विश्वकल्याण के प्रति समर्पित चरित्र के रूप में चित्रात्र हुए हैं। परिहासप्रियता उनके सरल व्यक्तित्व को दर्शाती है। इसी तरह धर्म के साक्षात् विग्रह भरत की आदर्श कर्मवीरता और शत्रुहंता एवं भरतानुगामी शत्रुघ्न की व्यवहार-कुशलता को कवि ने साकार रूप दिया है। राम की भांति इनकी भी स्वतंत्र गरिमा है। इसी प्रकार प्रतिनायक रावण एक ओर मानवता का उत्पीड़क है तो दूसरी ओर भ्रातृप्रेमी रूप में उसकी सहृदयता, परिजनों के प्रति संवेदनशीलता प्रशंसनीय है। गुप्त जी ने उर्मिला को तो उल्लेखनीय स्थान दिया है। उसे कला, सौंदर्यप्रियता, क्षात्रतेज, स्वाभिमान, अनुराग, धैर्य एवं त्याग आदि गुणों से महिमा-मंडित किया है। कर्तव्यपरायणता, सेवापरायणता जिसके प्रमुख आदर्श हैं। उर्मिला के साथ-साथ मांडवी, श्रुतकीर्ति, अहल्या आदि भी सर्वथा नवीन सृष्टियां हैं। कौशल्या का वात्सल्य परंपरागत है, किंतु सुमित्रा का दृढ़तापूर्ण क्षत्राणी रूप नया है। इन ऐतिहासिक, पौराणिक पात्रों को कवि ने नया व्यक्तित्व दिया है। अपने जीवनआदर्श को आधुनिक एवं पुरातनता के ताने-बाने के साथ बुना है। गुप्त जी के रामकाव्यों की कथावस्तु और चरित्रों में जो परिवर्तन आया है, वह नवीन भी है कलात्मक भी। उनके पास सृजनात्मक काव्यबोध और विचारबोध की ऐसी दृष्टि थी जो उन्हें नए रूप में प्रस्तुत करने की अद्भुत सामर्थ्य प्रदान करती है।

यहाँ अत्यंत ध्यातव्य बात यह है कि मैथिलीशरण गुप्त पर तुलसीदास के प्रभाव का अर्थ उनकी मौलिकता को कम करना नहीं है क्योंकि यह प्रभाव अनुकरण नहीं ‘प्रेरणा’ माना जाएगा। पूर्व प्रतिपादित विषय पर आधारित काव्य में किसी भी कवि की कला उभरती है। प्रतिभा का प्रशंस्य बिंदु उसकी कला है। किसी विषय को खूबसूरती के साथ प्रतिपादित करना कला है जैसे चित्रकार चित्र बनाता है। साहित्य और विज्ञान कई बिंदुओं पर एक दूसरे के निकट हैं किंतु दोनों के प्रयोग अलग-अलग हैं। विज्ञान में अन्वेषण होता है। वहां तर्कशीलता होती है और वैज्ञानिक प्रयोगों के द्वारा नई चीजें ढूंढता है। कला में अन्वेषण नहीं होता है। जिसका अस्तित्व होता है, उसी को खूबसूरती के साथ कलाकार प्रकट करता है। पत्थर पहले से ही है, उसमें मूर्ति को प्रकट करना कला है। गुप्त जी ने यही किया है। रामकथा ‘धरोहर’ के रूप में कवि के पास विद्यमान थी। उनकी रचनात्मकता उस परंपरा की ‘वाहक’ है। उन्होंने एक ओर परंपरा के अजस्त्र स्रोत से रसधारा ग्रहण कर ‘साकेत’ का पोषण किया है तो दूसरी ओर प्रयोगों के नवोन्मेष के साथ नवीन और मौलिक उद्भावनाएं की हैं। मार्मिक स्थलों को अपनी संवेदना से सींचा है।

समग्रतः गुप्त जी का रामकाव्य विशेष रूप से ‘साकेत’ उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का पुनर्सृजन है, वह पूर्व प्रतिपादित रामकाव्य के अनेक प्रभाव-प्रेरणा का संयोग है, जो उनके कथ्य और पात्रों के चरित्र-चित्रण में उभर कर आया है।

महाशिवरात्रि, 2017


— डॉ. शकुन्तला कालरा, डी-लिट्.
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: एन-डी-57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034 मो: 8287479455 लैंडलाइन: 011-41677475

✧ यह आलेख ‘भूमिका’ शैली में प्रस्तुत है — तुलसीदास एवं गुप्त जी के रामकाव्य की तुलनात्मक दृष्टि ।

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