भूमिका · लोरी एवं प्रभाती (ममता की छाँव में)
लोरी एवं प्रभाती लोकसाहित्य की प्रमुख विधाएँ हैं। ये लोकगीतों का प्रमुख अंग हैं, जिनमें जन-जीवन अभिव्यक्त हुआ है। जब शिशु केवल नाद को समझता है, शब्दों और उसके अर्थ को नहीं तब माँ उसे सुलाने के लिए जो दुलार-भरी छुअन के साथ स्नेहपूर्ण थपकी देती है और सुर-ताल व लय में गाती या गुनगुनाती है वह लोरी है और प्रभात होते ही उसी स्नेहित स्पर्श से उसे जगाती है। वह 'प्रभाती' है।
'लोरी' शब्द संस्कृत के 'लोल' शब्द का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है हिलाना-डुलाना या थपथपाना। जब माँ शिशु को गोदी में लेकर, घुटनों पर या पैरों पर खड़ा कर अथवा कंधे पर डालकर या झूले में लिटाकर थपकी देते हुए गुनगुनाती है तो उसका वात्सल्यभाव से भरा संगीत माधुर्यसिक्त शब्दों के साथ मिलकर उनींदे बालक को पूरी तरह से निद्राभूत कर देता है।
मानव जन्म से ही संगीत-प्रेमी होता है, इस बात का प्रमाण हैं लोरियाँ। मातृकंठ से निःसृत लोरियों के स्वर शिशु को आनंद के महासागर में निमज्जित कर देते हैं। ये लोरियाँ बच्चे को शब्द-ज्ञान कराती हैं। शब्दों से वाक्य बनाने की क्षमता का विकास होता है। बच्चों में आत्मअभिव्यक्ति आदि का गुण विकसित होता है, वे उन्हें कल्पनालोक में ले जाकर उनमें नए-नए सपने जगाती हैं।
माँ की कल्पना का विस्तार अनंत है। शिशु को सुलाने में मानो नारी-चेतनाशक्ति केंद्रित हो जाती है। लोकजीवन की प्रत्येक क्रिया लोरी की लय में बंधकर बच्चे को निद्राभिभूत कर देती है। वात्सल्य में माँ की कल्पना बहुत लंबी उड़ान भरती है; क्योंकि बच्चा माँ की आशा है। पिता की अभिलाषा है। वह समस्त परिवार की उमंगों का केंद्र है। 'लोरी' बच्चे के हृदय में संबंधों की खुशबू जगाती है। उसमें सामाजिकता की मिठास भरती है। 'लोरी' स्नेह का बहता ऐसा झरना है जो बालक को निरंतर भिगोता रहता है जिससे उसका मन आर्द्र रहता है।
लोरियाँ आकार में लघु होती हैं, किंतु अपनी भाव-भंगिमा और लयात्मकता के कारण लोकगीत की किसी भी विधा से अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। गेयता इसका प्रमुख गुण है। मानवीय संगीत का सबसे पहला परिचय उसे लोरी के माध्यम से ही होता है। लोरी में शब्द-ध्वनियों की पुनरावृत्ति होती है। अनुप्रास का ध्वनि-सौंदर्य शिशु-मन को भाता है। यहाँ अर्थगत सौंदर्य की अपेक्षा लय की प्रधानता होती है। स्वर के आरोह-अवरोह से हो संगीत पैदा होता है वह बालक को निद्राभिभूत करता जाता है। बालक शीघ्र ही सपनों के लोक में पहुँच जाता है। लोरी की विशेषताओं के आधार पर यदि लोरी को परिभाषित किया जाए तो कहा जा सकता है—लोरी उनींदे बालक के मन को भाने वाला वह शिशुगीत है या लय की गुनगुनाहट है जिसका ताल और सुर में बंधा संगीत उसे सम्मोहन में बांधकर विश्राम देता है और धीरे-धीरे बालक निद्रालोक में पहुँच जाता है। लोरी के बोल वात्सल्यमयी माता के अंतस् से स्वतः निकलते हैं।
लोरी का इतिहास अति प्राचीन है। भारत में लोरियों की परंपरा बहुत पुरानी है। उतनी ही पुरानी, जितना पुराना हमारा लोक साहित्य है। यह मूलतः श्रुति-परंपरा से एक-दूसरे तक पहुँची हैं। 'लोरी' गीत अनादिकाल से उनींदे शिशु को सुलाते आ रहे हैं, अतः लोरी को 'निद्रागीत' या 'शयनगीत' भी कहा जाता है। प्रांत, भाषा और समय के साथ चाहे उनका स्वरूप परिवर्तित होता रहा है, किंतु मूल स्वर सबका एक है। गांवों में स्त्रियाँ मनगढ़ंत लोरी रचकर अपनी ममता बच्चे पर उमड़ती रही हैं।
संस्कृत साहित्य में मदालसा और विदुला अपने बच्चों को झूला देने के साथ-साथ सीख भी देती हैं। मदालसा का उपाख्यान लोरियों की प्राचीनता का प्रभाव है। इसी प्रकार 'विष्णुपुराण' में भी नंद श्रीकृष्ण को सुलाने का उपक्रम करते हुए लोरी के रूप में स्वस्ति-वाचन करते हैं। 'मार्कंडेयपुराण' में माताएँ लोरी सुनाकर उनके जीवन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं। भक्तिकाल में भक्त तुलसीदास की वाणी में और सूरदास की वाणी में माताएँ पालने में बच्चे को झुलाती हुई गीत गाती हैं। निरंकारदेव सेवक के अनुसार हिंदी साहित्य के क्षेत्र में बालगीतों की तरह लोरियों के भी आदिकवि सूरदास ही माने जाते हैं।
आधुनिक खड़ी बोली में अनेक कवियों और कवयित्रियों ने लोरियों की रचना की है। अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', मैथिलीशरण गुप्त ने अपने काव्यों में प्रसंगानुसार लोरियाँ रखी हैं। 'हरिऔध' जी की लोरियों से प्रेरणा पाकर अन्य अनेक कवि भी इस क्षेत्र में आए। डॉ॰ श्रीप्रसाद, बिहार के ब्रजकिशोर नारायण, श्री निरंकारदेव सेवक, कन्हैया लाल मत्त, डॉ॰ प्रकाश मनु, डॉ॰ राष्ट्रबंधु, श्रीनाथ सिंह, दुर्गादत्त शर्मा, शंभुदयाल सक्सेना, विनोदचंद्र पांडेय 'विनोद', भगवती प्रसाद द्विवेदी, कृष्ण शलभ, रमेश तैलंग, मौ॰ साजिद खान, सूर्यकुमार पांडेय, डॉ॰ भैरूलाल गर्ग, डॉ॰ अजय जन्मेजय, नागेश पांडेय 'संजय', नरेंद्र मस्ताना आदि ऐसे अनेक कवि हैं, जिनकी लोरियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। 'लोरी' विधा को जीवंत रखने में इनका योगदान निश्चय ही सराहनीय है।
हिंदी की अनेक कवयित्रियों ने भी लोरियाँ लिखी हैं। महादेवी वर्मा, विद्यावती कोकिल, शकुंतला सिरोठिया, श्रीमती लक्ष्मीदेवी चंद्रिका, श्रीमती सुमित्रा कुमारी सिन्हा, श्रीमती कमला चौधरी के साथ आज की कवयित्रियों में डॉ॰ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, पद्मा सचदेव, डॉ॰ ऊषा यादव, श्रीमती जगदंबा चोला, डॉ॰ शकुंतला कालरा, अनामिका, अलका सिन्हा आदि ऐसे उल्लेखनीय नाम हैं, जिन्होंने अपनी लोरियों में वात्सल्यरस की गागर छलकायी है।
लोरियाँ हिंदी भाषा एवं उसकी बोलियों-उपबोलियों के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में भी लिखी गई हैं। यहाँ भी लोरियों के तत्व समान हैं। उनींदे बालक के लिए नींद का आह्वान, नादतत्व की प्रधानता, शब्दों की आवृत्ति आदि विशेषताएँ हर भाषा में समान रूप से पाई जाती हैं। लोरियाँ सकारात्मक हैं। यहाँ कुछ उदाहरण देकर लोरी के स्वरूप को समझा जा सकता है।
🌙 लोरी के रूप · उदाहरण
लोरी साम्राज्ञी श्रीमती शकुंतला सिरोठिया की लोरियों में ये सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं। वह आज़ादी से पहले की कवयित्री हैं। डॉ॰ निरंकारदेव सेवक के अनुसार लोरियाँ लिखकर हिंदी में जिन्होंने सबसे अधिक यश कमाया, वह श्रीमती शकुंतला सिरोठिया हैं। वे उन्हें सर्वश्रेष्ठ लोरी-लेखिका मानते हैं। उनकी लोरियों में माँ की ममता के साथ लय और भाषा की मस्ती है। भाषा-लालित्य और भाव का मणिकांचन योग देखिए—
सूरज भी सो गया, पंछी भी सो गए,
डालों की गोद में फूल सभी सो गए
तू भी चुप सो जा, झुलाऊँ तुझे पालना, सो जा मेरे लालना।”
ऐसी ही एक सुंदर लोरी डॉ॰ राष्ट्रबंधु की है। लोकगीतों की धुन पर रचित उनकी निम्न लोरी में लोक संस्कृति की मिठास देखने योग्य है—
यह चंदा हलवाहा है, नीले-नीले खेत में
बिल्कुल सैंत-मैंत में, रत्नों भरे खेत में
किधर भागता लइयाँ-पइयाँ, दर्द थैयाँ घुनुँ मनैयाँ।”
कृष्ण शलभ की एक लोरी में माँ नींद से क्या-क्या कहती है—
मेरी रानी सोने को है, आकर इसे सुला जा
चिड़िया इसे बनाना, फिर दोनों उड़ जाना
मेरी रानी खूब उड़ेगी, इसके पंख लगा जा”
ये लोरियाँ सकारात्मक संवेगों को जन्म देती हैं। ऐसे शिशुओं का व्यक्तित्व भी सकारात्मक रूप में विकसित होता है। आज बच्चों में असुरक्षा और अवसाद की भावना के साथ जो नकारात्मक सोच बढ़ती जा रही है, उसका कारण बच्चों का अकेलापन है। अतः आज लोरियों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। लोरियाँ बाल मन की ऐसी सुखद अनुभूतियाँ हैं, जिनसे एक सकारात्मक, ओजस्वी, आत्मविश्वासी व्यक्तित्व की संरचना होती है। नई पीढ़ी के माता-पिता के लिए आज लोरियों के महत्व को जानने की अधिक आवश्यकता है।
🌅 प्रभाती — जागरण का गीत
लोरियों की भांति प्रभातियाँ लोक संस्कृति का ही अंग हैं। दोनों में माँ की ममता निहित है। दोनों में माँ और बच्चों का भावात्मक लगाव जुड़ा है। इनमें प्रधान अंतर यही है कि लोरियाँ बच्चों को सुलाने और प्रभातियाँ उन्हें जगाने के लिए गाई जाती हैं। इसलिए प्रभातियों को जागरण गीत भी कहते हैं।
दूसरा अंतर यह भी है कि बच्चों को जगाते समय प्रभातियाँ गाने का उतना रिवाज नहीं है, जितना सुलाने समय लोरियाँ गाने का। मात्रा की दृष्टि से प्रभाती गीत लोरियों की तुलना में कम नहीं लिखे गए। भिन्न-भिन्न स्वरों लयों और राग-रागिनियों में आबद्ध विविध भावाश्रित अनेक प्रभातियाँ हिंदी में लिखी गई हैं। प्रभातियों के आदि कवि सूरदास माने जाते हैं। प्रातःकाल की सुंदर छवि, स्फूर्ति और उमंग से भरा वातावरण पक्षियों की चहचहाहट स्वतः जागरण की प्रेरणा देती है किंतु बालक कब सोए और कब जागे यह तो उसकी मौज है। प्रातःकाल सूर्य की सुनहरी किरणें जब पूरे वातावरण को एक उजले प्रकाश से भर देती हैं। पूरी प्रकृति आलस्य का परित्याग कर प्रफुल्लित हो उठती है। कलियाँ पंखुड़ियों के घूंघट खोल लेती हैं। पक्षी कलरव करते नीड़ों से बाहर आते हैं और उन्मुक्त गगन में उड़ते जाते हैं। ऐसे में माताएँ भी अपने लाडले को अपने स्नेहित स्पर्श से गाकर जगाती हैं। उसके हृदय के ममता से भीगे कोमल भाव ही 'प्रभाती' है। इसमें माता के हृदय का वात्सल्य ही नहीं प्रभात का वर्णन भी होता है। प्रभाती की मूल प्रेरणा माता की बच्चे के प्रति सद्भावना है। प्रकृति के जगाने के साथ-साथ वह अपने पुत्र को भी जगाती है। सुनहरी किरणों के साथ उन्हें सुनहरे सपने दिखाती हैं। उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। प्रभातियों का भाव-क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। लोरी की भांति इसमें वीरता, साहस भी समाहित है। यहाँ भी माँ बालक में उत्तम संस्कार रोपती जाती है। कुछ प्रभातियों में राष्ट्रीय चेतना भी जाग्रत की गई है। जैसे सोहन लाल द्विवेदी के निम्न 'प्रभाती' गीत में है।
देखो झाँकी भारत माँ की।
जय-जय बोलो, उठो-उठो।”
प्रभातियों का उत्स भी हमें संस्कृत काव्यों में मिलता है राजा-महाराजा को जगाने के लिए चारण और भाट जो गीत गाते थे वह भी प्रभाती कहलाते हैं। हिंदी में प्रभाती लिखने वाले कवियों में अब्दुल रहमान सागरी, शंभुदयाल सक्सेना, लाला जगदलपुरी, निरंकारदेव सेवक, प्रो॰ मनोरंजन, एम॰ ए॰ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, डॉ॰ अजय जन्मेजय आदि हैं।
'लोरी' की भांति ही संगीतात्मकता प्रभाती का विशेष गुण है। माँ की लयपूर्ण गुनगुनाहट जैसे बच्चे को निद्रालोक में पहुँचा देती है वैसे ही ममता भरा स्पर्श उसे जगा देता है और वह माँ का मुख देखते ही पुलकित हो उठता है उसे पास पाकर सुरक्षा के भाव से उसका चेहरा चमक उठता है। भावों की कोमलता जैसी लोरी में है वैसे ही प्रभाती में है।
आधुनिकता की अंधी दौड़ ने लोरियों और प्रभातियों की विरासत को संकट में डाल दिया है। आधुनिक जमाने की कोई भी माँ 'लोरी' सुनाती नज़र नहीं आती और न ही 'प्रभाती' गाकर उसे जगाती नज़र आती है। इतना ही नहीं आज गाँव की महिलाएँ भी लोरियों की अपेक्षा स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली कविताओं को गाती हैं। अगर यही स्थिति रही तो लोकगीतों का यह भंडार विलुप्त हो जाएगा।
आज हमारे पास सुविधाएँ हैं, पर हमारी कोमल कल्पनाएँ सो गई हैं। संयुक्त परिवार खंडित हो रहे हैं। बालक दादी-नानी की गोद में ही नहीं आता तो 'लोरी' और 'प्रभाती' कौन सुनाए। 'धाय' और 'आया' की गोद या 'क्रेच' में पलते-बढ़ते बच्चे के लिए 'लोरी' एवं 'प्रभाती' आकाश-कुसुम बनती जा रही है। निश्चय ही 'लोरी' का सृजन मातृहृदय माँगता है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बाजारवाद की संस्कृति में उसकी बलि दी जा रही है। लोरियों एवं प्रभातियों के माध्यम से आज भी लोक का यह उल्लास, कथा-रस-धारा लौट सकती है यदि हम ईश्वर के अनुपम वरदान शिशु की किलकारियों में प्राप्त होने वाले आनंद को प्राथमिकता दें।
इस संग्रह में कुछ 'लोरियाँ' और 'प्रभातियाँ' संगृहीत हैं जिनमें बच्चों का परिवेश उनकी भाषा और उनका रूप लाने का मेरा भरपूर प्रयास रहा है। कैसी लगीं ये रचनाएँ? इस पर पाठकों की प्रतिक्रिया की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।