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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

पुरोवाक · भूमिका

भूमिका : पुरोवाक (हिन्दी बालसाहित्य : आधुनिक परिदृश्य)

बालसाहित्य : स्वरूप, चुनौतियाँ और विस्तार

बच्चों के बौद्धिक और चारित्रिक विकास के लिए उत्तम बालसाहित्य की अनिवार्यता असंदिग्ध है। बालसाहित्य-लेखन अर्थात् बच्चों की भाषा में, बच्चों के बारे में और बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य। बालसाहित्य बड़ों से भिन्न एक सृजन रूप है जो बच्चों की प्रकृति, उनकी कल्पना, उनके सपनों और उनकी आकांक्षाओं को केंद्र में रखकर लिखा जाता है। यह रोचक और प्रेरक होना चाहिए, जिसमें बच्चों की जिज्ञासाएँ शांत और उनकी रुचियाँ परिष्कृत हों।

आज बालसाहित्य का स्वरूप बदला है और साथ ही इसके प्रति लोगों की सोच भी। पहले इसे दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता था और जहाँ बालसाहित्य को साहित्य के मुकाबले में स्थान देने की बारी आती इसके महत्त्व को नकारते हुए उसे बचकाना साहित्य और उसके लेखकों को दूसरे दर्जे का साहित्यकार घोषित कर दिया जाता है। अब स्थिति बदल रही है। उसे वही प्रतिष्ठा दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। आजकल इस पर ध्यान दिया जाने लगा है कि बालसाहित्य भी साहित्य का ही अंग है। साहित्य की मुख्यधारा से वह अलग नहीं।----

पुस्तक में बालसाहित्य और बालसाहित्यकारों से जुड़े कुल 19 आलेख हैं। एक से दस तक आलेख बालसाहित्य के स्वरूप, उसकी चुनौतियों, उसकी दशा-दिशा से जुड़े हैं। 21वीं सदी की बालकविता, बच्चों की आज की चुनौतियाँ, संचार प्रौद्योगिकी आदि समकालीन मुद्दों पर प्रकाश डाला है। अगले सात आलेख कतिपय बालसाहित्यकारों के किसी विशिष्ट क्षेत्र की उपलब्धियों का मूल्यांकन-परक विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। अंतिम तीन आलेख बालसाहित्य के दशा-दिशा के साथ-साथ बालसाहित्यकारों के विशिष्ट प्रदेय पर केंद्रित हैं। साहित्यकार को साहित्यकार बनाने के प्रेरक बिंदु कौन से हैं? व्यक्ति, घटना, परिवेश या दैवी प्रेरणा? उसकी रचना-प्रक्रिया आदि के साथ बालसाहित्य के आधुनिक परिदृश्यों को लेकर कुछ जिज्ञासाओं के समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं डॉ. प्रकाशमनु, डॉ. बानो सरताज और डॉ. सुरेन्द्र विक्रम डॉ. शकुन्तला कालरा के साथ हुई अपनी लंबी भेंटवार्ता में।

प्रथम आलेख ‘बालसाहित्य का स्वरूप और उसकी विकास यात्रा’ का परिचय प्रस्तुत करता है। बालकविता, बालकहानी, बालउपन्यास, बालनाटक, बालजीवनी, यात्रावृत्तांत, बालपत्रकारिता, समीक्षा आदि क्षेत्रों में इसके क्रमबद्ध विकास की रूपरेखा प्रस्तुत की है। दूसरे आलेख ‘राष्ट्रीय एकता और हिंदी बालकहानी’ में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में हिंदी बालकहानी के योगदान का विवेचन किया है। जन-मन में राष्ट्रीय चेतना के भाव भरने के अपने दायित्व को हमारे साहित्यकारों ने बखूबी समझा है और उन्होंने जाति, संप्रदाय, धर्म, भाषा में पारस्परिक सद्भावना और एकात्मकता पर आधारित अनेक सुंदर प्रेरक कहानियाँ दी हैं। देश-प्रेम, भारत-गुणगान, मानवीय प्रगति, समाजवादी चेतना से ओतप्रोत उदात्त मानवीय आस्थाओं वाली ऐसी अनेक कहानियाँ लिखीं जो बच्चों में उत्साह का संचरण करती हैं। भावात्मक एकता को पुष्ट करती हैं। राष्ट्रीय चेतना का संचार करती हैं। देश के विकास और राष्ट्र-निर्माण की कल्पना को साकार करती हैं।

‘वर्ष 2014 का हिंदी बालसाहित्य’ आलेख इस विश्वास को पुष्ट करता है कि बालसाहित्य-सृजन का कार्य विभिन्न स्तरों पर और विशद स्तर पर हुआ है। बालकविता, बालकहानी, बालनाटक, बालउपन्यास आदि पुरानी विधाओं के साथ-साथ नवीन विधाओं का भी विकास हुआ। साथ ही नवोदित रचनाकार भी इस क्षेत्र में उतर रहे हैं। आज बालसाहित्य बोधकथाओं, पौराणिक कथाओं, राजा-रानियों की कथाओं के घेरे को तोड़कर बहुत आगे निकल चुका है जहाँ संभावनाओं के द्वार उसका भव्य स्वागत कर रहे हैं।

‘21वीं सदी की हिंदी बालकविता : बदलते रंगरूप’ में इसके संक्षिप्त इतिहास के आलोक में क्रमशः आए इसके बदलाव को इसके विविध रंगरूप की सोदाहरण चर्चा है। आज की बालकविता का वैशिष्ट्य यह है कि उसमें हर विषय बड़ी सहजता से समा गया है। वह वैविध्यपूर्ण है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से आज तक इसमें कई रंग उभरे हैं। कई परिवर्तन हुए हैं। बच्चों के परंपरागत प्रिय विषय भी हैं तो दूसरी ओर कंप्यूटर, रोबोट, मोबाइल जैसे उपकरण भी बालकविता के अंग बने हैं। विषय के साथ भाव-विचार-शिल्प एवं प्रस्तुति आदि से जुड़े नए प्रयोग भी हैं जिसने इस विधा को समुन्नत करने और उसे गति प्रदान करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लोरी एवं प्रभाती बालगीतों का ही रूप है। ये लोकसाहित्य की प्रमुख विधाएँ हैं जिनमें जनजीवन अभिव्यक्त हुआ है। ‘संकट में घिरती लोकसाहित्य की प्रमुख विधाएँ लोरी एवं प्रभाती की विरासत’ आलेख में ‘लोरी’ और ‘प्रभाती’ की विरासत पर आए संकट के प्रमुख कारणों पर विचार किया है।

20वीं शताब्दी बालसाहित्य में एक विश्वव्यापी क्रांति लेकर आई। बदलते युग, समाज और जीवन के अनुरूप बालसाहित्य के प्रतिमान बदले। ‘आज के युग में भूत-प्रेत, राक्षस और परीकथाओं की प्रासंगिकता’ आज एक बड़ी बहस का मुद्दा बन चुका है। आज का युग विज्ञान का युग है। आज बच्चा भी वैज्ञानिक सोच रखता है। वह तार्किक है और उसकी सोच विश्लेषणवादी। आज का बालसाहित्य भी कथ्य और शिल्प के पुराने खाँचे को तोड़कर नए मार्गों का संधान करने की ओर अग्रसर है।

‘नैतिक मूल्यों के संवर्धन में बालसाहित्य की भूमिका’ में नई पीढ़ी को श्रेष्ठ, संस्कारवान और विचारशील बनाने में बालसाहित्य की रचनात्मक भूमिका मानी गई है। मनोरंजन बालसाहित्य का प्रथम धर्म है किंतु खेल-खेल में उन्हें मानवीय मूल्य या नैतिक आदर्श देने का भी यह एक सुगम और रोचक माध्यम है। श्रेष्ठ बालसाहित्य नीति की शिक्षा नहीं देता। नीति को उसके मन-मस्तिष्क में इस प्रकार भर देता है कि वह उसकी रक्तनलिकाओं में संचरित होकर उसका चारित्रिक संपोषण करती है।

‘अच्छी पत्रिका बालक में रागात्मक वृत्तियों का विकास करती है।’ इस आलेख में बालकों के लिए बालपत्रिकाओं की उपयोगिता पर प्रकाश डाला है। बालसाहित्य बच्चों को पुस्तकों एवं बालपत्रिकाओं दोनों के माध्यम से मिलता है। रंग-बिरंगी रोचक और आकर्षक पत्रिकाएँ बच्चों में पढ़ने की ललक जगाती हैं। कथा-कहानी के रूप में पत्रिका की प्रेरक सामग्री मित्रवत् उनका मार्गदर्शन करती है। गुरुवत् उनमें मूल्यों की स्थापना करती है तो पितृवत् उनकी हर जिज्ञासा का शमन करती है। पत्रिकाएँ बच्चों को रचनात्मक मंच भी प्रदान करती हैं। उनकी सुप्त सृजनात्मक प्रतिभा को जाग्रत भी करती हैं। उनके भाषाज्ञान का विस्तार करती हैं। इन सब गुणों के साथ-साथ ये सबसे बड़ा कार्य करती हैं। साहित्य के माध्यम से बालक में रागात्मक वृत्तियों का विकास।

‘बच्चों की आज की चुनौतियाँ : बालसाहित्य और बालसाहित्यकार की भूमिका’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय है। बच्चों के मन और उनकी मानसिकता को समझ पाना अत्यंत कठिन है। परिवेश के अनुसार दोनों तेज़ी से बदल रहे हैं। युग और समाज के उतार-चढ़ाव का प्रभाव समय के साथ-साथ व्यक्ति की जीवन-शैली पर भी पड़ा है, जो स्वाभाविक है। आज बालमन और प्रौढ़मन दोनों सामाजिक उथल-पुथल का शिकार हो रहे हैं। आज का बच्चा कई प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। हर क्षेत्र में उनके लिए प्रतियोगिता है। उन्हें हम ऐसा साहित्य दें जो उनमें पुरुषार्थ का महत्त्व जगाए। बालसाहित्य वही श्रेष्ठ कहा जायेगा जो बालकों में आत्मविश्वास भर सके। आत्म-विकास के लिए निष्ठा उत्पन्न कर सके क्योंकि बालक हमारे परिवार की हमारे समाज की और हमारे देश की सर्वांगीण तथा संपूर्ण संभावना शक्ति है। अतः साहित्य ऐसा हो जो उनके उज्ज्वल भविष्य की तैयारी करने वाला हो। बालकों का सच्चा मित्र बनकर उन्हें ऐसा साहित्य दे जो उनकी आत्मशक्ति दे तो उनकी आत्मशक्ति को जगाकर उनका दिशानिर्देशन कर सके। उन्हें ऐसा साहित्य मिले जो उन्हें अपनी परिस्थितियों से मुकाबला करना सिखाए। वे स्वयं को आधुनिक जीवन की चुनौतियों के अनुरूप ढालने में भी समर्थ हो सकें। समय की नब्ज को पहचान सकें। युग-सत्य की छवि को परख सकें ताकि प्रवाहशील समय और उसकी धारा की दिशा को समझने की भूल उनसे न हो।

‘21वीं सदी में संचार-प्रौद्योगिकी : बच्चे और बालसाहित्य’ बड़ा गंभीर विषय है। बच्चों के लिए विशेष रूप से किशोरों के लिए संचार माध्यम जहाँ वरदान सिद्ध हुआ है तो वहाँ अभिशाप भी। 21वीं सदी के इस दौर में प्रौद्योगिकी उन्नति के साथ बच्चों का आई-क्यू भी विकसित हुआ है। मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन आदि-आदि से बच्चे बड़ी तेज़ी से परिचित हो रहे हैं। सभी वेबसाइट और टी.वी. चैनलों के माध्यम से मनोरंजन और ज्ञानार्जन दोनों हुए हैं। परिणामतः आज बच्चे अधिक समझदार, जिज्ञासु और जानकारियों से भरपूर हैं किंतु तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। इनके साथ बच्चों का सीधा परिचय कितना अनुपयोगी भी है जो बच्चों के सम्यक् दिशा में विकास, उनके चरित्र, आचरण, स्वभाव, व्यवहार, कार्य-शैली आदि पर अपना दुष्प्रभाव डाल रहा है। यह अत्यंत गंभीर विषय है। आज का बच्चा और किशोर पूरी तरह से संचार प्रौद्योगिकी-जनित साधनों की गिरफ्त में आ चुका है। परिणामतः वह बालसाहित्य से कटता जा रहा है। उनकी बौद्धिक क्षुधा के लिए उन्हें ऐसा साहित्य देना होगा जो उनके मन और बुद्धि का स्वास्थ्यवर्धन कर सके। उनके प्रश्नों का संतोषप्रद उत्तर दे सके।

साहित्यकारों की विशिष्ट उपलब्धियों पर केंद्रित पुस्तक का ग्यारहवां आलेख अपने प्रशासनिक काल में बालसाहित्य और बालसाहित्यकारों को उनका प्रतिष्ठित स्थान दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सहृदय कवि एवं आलोचक विनोदचंद्र पांडेय ‘विनोद’ पर है। यह आलेख बालकविता के विविध पक्षों के अध्येता के रूप में उनके योगदान को उजागर करेगा।

प्रौढ़-साहित्य के मूर्धन्य लेखक पद्मश्री श्यामसिंह ‘शशि’ ने अपने प्रशासकीय करियर में साहित्य की जो सेवा की है वह वंदनीय है। डॉ. श्यामसिंह ‘शशि’ का बालसाहित्य भी उनके प्रौढ़-साहित्य की भांति बहुआयामी है। बालसाहित्य से जुड़ी लगभग सभी विधाओं में यद्यपि उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है किंतु बालकहानी उनकी प्रिय विधा है जो शिल्प एवं वस्तु दोनों के स्तर पर अपने प्रतिमान स्थापित करती है। इसी प्रकार उन्होंने बालमन की गहराई तक उतरकर बालमनोविज्ञान पर बुनी अनेक सुंदर मनभावन बालकविताएं भी लिखी हैं।

‘बालसाहित्य की बहुआयामी रचनाकार डॉ. उषा यादव’ अग्रिम पंक्ति की कहानीकारों में हैं जिन्होंने हिंदी बालकहानी को एक समृद्ध पृष्ठभूमि प्रदान की है। सरल, प्रवाहमयी, विषयानुकूल, भावमयी भाषा में लिखी उनकी कहानियों के कथानक जीवंत हैं। अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और सहज अभिव्यक्ति से ये पाठकों को बाँधती हैं। हर कहानी बच्चों से कुछ कहती है। उन्हें कुछ अर्थ दे जाती है। लेखिका को कुछ कहना नहीं पड़ता।

‘एक शिशुमन जो कागज़ पर उतर कर कविता बन गया’ आलेख दिविक रमेश की बालकविताओं से जुड़ा है। उन्होंने जिस अहसास के साथ बड़ों के लिए लिखा है वैसी ही ईमानदारी और शिद्दत के साथ बालसाहित्य भी लिखा है। बौद्धिक और चिंतनशील व्यक्तित्व के धनी दिविक जी, किंतु उनकी बालकविताओं में एक सरल अबोध शिशु एवं सहज निष्कपट मुस्कराता बचपन झिलमिलाता है। दिविक जी का कविता-संसार विषय और शिल्प दोनों दृष्टियों से नवीनता लिए है। इनकी अभिव्यक्ति का ढंग इतना आकर्षक और रोचक है कि बच्चे इन्हें सदा गुनगुनाते रहते हैं। पिटी-पिटाई पुरानी कल्पनाओं से हटकर अछूते विषयों को छूकर कवि ने नई कल्पनाओं से सँवारा है। बाल मनोवैज्ञानिक और शिक्षा-शास्त्री की तरह मनोरंजन का पुट दिया है जिससे बच्चे बिना श्रम ज्ञान अर्जित कर लेते हैं। दिविक जी की कविताएँ बच्चों में ताजगी भरती हैं। परिष्कृत मनोभावनाओं वाला स्वस्थ मन प्रदान करती हैं।

पुस्तक का अगला आलेख श्रीवत्स कृत किशोरोपयोगी वृहद् उपन्यास गुल्लु और एक सतरंगी के प्रथम खंड पर केन्द्रित है। ‘प्रकृति और उसके सहचर पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता बहाल करता वृहद् उपन्यास ‘गुल्लु और एक सतरंगी’ शीर्षक के इस आलेख में लेखक का प्रमुख उद्देश्य उपभोक्तावादी संस्कृति में पलते-बढ़ते बच्चों में लुप्त होती संवेदना की धारा को जागृत करना है, जो आज भी कुछ हृदयों में प्रवाहित हो रह है। लेखक का उद्देश्य इसी सुप्त मानवीय करुणा को अपने भीतर जागृत करना है। यह करुणा न केवल मानवों के प्रति, वरन् मानवेतर जगत् यानी समस्त प्राणीजगत् के प्रति है। बालक में यह संवेदना यदि बचपन में ही जागृत हो जाए तो बड़े होने पर वह सबके प्रति संवेदनशील बनता है। पूरा उपन्यास लेखकीय संवेदना का विस्तार है, जिसकी दिशा मानवतावाद है। मूल स्वर करुणा है और केन्द्रीय भाव प्रकृति-प्रेम है। लेखक ने पर्यावरण के संकट को भी बहुत गहराई से देखा है और महसूस किया है। पशु-पक्षियों को प्यार करने वाला विश्व भी यहाँ मोजूद है।

हिंदी बालसाहित्य के विशाल वटवृक्ष के सृजन क्षेत्र में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, साक्षात्कार, यात्रा-वृत्तांत आदि विविध शाखाओं के साथ-साथ बालसाहित्य-आलोचना विधा भी अपनी पूरी गरिमा के साथ विकसित हो रही है। नई दृष्टि के साथ युगानुरूप बालसाहित्य-लेखन की भूमिका आलोचना द्वारा ही निर्मित होगी। यह एक अच्छे आलोचक का काम है कि वह अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए उत्तम बालसाहित्य की कसौटी को उसके प्रतिमानों को व्याख्यायित करे। यह कार्य किया है बालसाहित्य के प्रतिष्ठित एवं चर्चित युवा आलोचक डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ ने। प्रस्तुत आलेख ‘डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ का आलोचनात्मक साहित्य और उनकी आलोचकीय दृष्टि’ उनके इस क्षेत्र के विशिष्ट योगदान पर केन्द्रित है। नागेश पांडेय के आलोचनात्मक आलेखों में अन्वेषण की नई मौलिकता है। उसमें सतहीपन नहीं है, गंभीरता है। वह रूढ़िबद्ध नहीं ताज़ापन लिए है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नागेश सृजनात्मक प्रतिभा सम्पन्न भी हैं और उनमें आलोचनावृत्ति भी है। सर्जक होते हुए भी उनका मिज़ाज़ आलोचनात्मक है।

ध्यातव्य है कतिपय विशिष्ट बिंदुओं को लेकर तैयार किए गए पुस्तक में संकलित सभी आलेख स्वतंत्र हैं जो बालसाहित्य के आधुनिक परिदृश्यों पर आधारित हैं तथा अलग-अलग समय पर लिखे गए हैं। बालसाहित्यकारों के साक्षात्कार भी बालसाहित्य के दशा-दिशा पर प्रकाश डालते हैं। उसके वर्तमान और भविष्य के स्वरूप की संभावित तस्वीर प्रस्तुत करते है। इन साक्षात्कारों में आपको साहित्यकार के व्यक्तित्व-कृतित्व के साथ बालसाहित्य के स्वरूप, उसकी दशा और दिशा, उसका भविष्य, समसामयिक विषय और उसकी चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श मिलेगा। बालसाहित्य से जुड़े ऐसे विचार-बिंदु मिलेंगे जो बालसाहित्यानुरागियों एवं बालसाहित्य के अध्येयताओं के साथ-साथ शोधार्थियों और अनुसंधित्सुओं के लिए अत्यंत लाभप्रद होंगे एवं भावी इतिहास-लेखकों के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होंगे। पुस्तक रूप में सबकी समन्वित प्रस्तुति बालसाहित्य के अध्येयताओं, शोधार्थियों एवम् अनुसंधित्सुओं के लिए निश्चय ही लाभप्रद होगी। ऐसा मेरा विश्वास है।

— डॉ. शकुन्तला कालरा


Dr. Shakuntla Kalra, डी-लिट्.
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: एन-डी-57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034 मो: 8287479455 लैंडलाइन: 011-41677475
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