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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

भूमिका · समकालीन बालसाहित्य : रचनात्मक सर्वेक्षण

भूमिका: समकालीन बालसाहित्य

सृजनात्मक सर्वेक्षण

स्वतंत्रता से पूर्व जो बालसाहित्य लिखा गया, वह अधिकांश स्वतंत्रता-प्राप्ति को ध्यान में रखकर लिखा गया, क्योंकि उस समय सभी साहित्यकारों के साथ बालसाहित्यकारों का प्रमुख उद्देश्य भी देशवासियों में राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय भावना जाग्रत करना था। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद देश की परिस्थितियों में भी परिवर्तन आया और साहित्य की सभी विधाओं की भाँति बालसाहित्य में भी परिवर्तन आया। बालसाहित्य में सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक परिवेश के साथ आज के यथार्थ और आधुनिक भावबोध को भी भरा जाने लगा। समकालीन बालसाहित्य में संपूर्ण बालजगत् समाया है। उनके सपने, उनकी इच्छाएँ, उनकी उलझनें, समस्याएँ, जिज्ञासाएँ, आकांक्षाएँ सब कुछ। जितना बालमनोजगत् का विस्तार है उतना ही बालसाहित्य का विषय-जगत् विस्तृत है।

साहित्य का इस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रूप में शक्तिशाली प्रतिद्वन्द्वी उभर आया है और क्रमशः अपनी शाखाओं-प्रशाखाओं में फैलता जा रहा है। मुद्रित साहित्य धीरे-धीरे हाशिए की ओर बढ़ रहा है। घर-घर पहुँचने वाली बालपत्रिकाओं का बंद हो जाना इस बात की ओर संकेत देता है कि आने वाली पीढ़ियों की रचनात्मकता बाधित हुई है। किन्तु यह स्थिति स्थायी नहीं रहेगी। मीडिया के ज़बर्दस्त दबावों के बीच भी मुद्रित साहित्य के अस्तित्व को कोई ख़तरा नहीं। अंगद के पाँव की तरह वह अपने स्थान पर अडिग रहेगा। उसे मीडिया रूपी रावण के सैनिक, मंत्री हरा नहीं पाएँगे। फ़िल्में और केबिल के विभिन्न चैनल मुद्रित साहित्य को हिला भी नहीं पाएँगे। उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रहेगी। वह बच्चों को दिशा देने वाला होगा।

बालसाहित्य को भी अब पहचान मिल रही है। इक्कीसवीं सदी बालसाहित्य की सदी होगी। साहित्य के केन्द्र में बच्चे होंगे। आने वाले समय में बालसाहित्य में भी नई विधाएँ होंगी। जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्त करने वाली विधाएँ होंगी। बालसाहित्यकार को उसका स्थान मिलेगा। उसके प्रदेय को वही पहचान मिलेगी, जो प्रौढ़ साहित्य की है। बालसाहित्यकार के प्रदेय को जानने का सबसे कारगर साधन है, उसका रचनाकर्म। उसके द्वारा लिखित साहित्य। हमारा सौभाग्य है कि आज हमारे साथ साहित्यकार भी हैं और उनका साहित्य भी। समकालीन बालसाहित्यकारों की लम्बी लिस्ट है। उनमें से अनेक बालसाहित्यकारों के किसी विशिष्ट पक्ष अथवा विशेष विधा को लेकर पिछले कई वर्षों से मैं निरंतर कार्य कर रही हूँ। उनके कृतित्व, उनके प्रदेय पर मैंने आलेख भी लिखे हैं जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ मेरी आलोचना की पुस्तकों में भी प्रकाशित हो चुके हैं। 'हिन्दी बालसाहित्य विचार और चिन्तन', 'हिन्दी बालसाहित्य विविध परिदृश्य', 'हिन्दी बालसाहित्य के अनन्य साधक', 'बालक और बालसाहित्य' आदि पुस्तकों में बालसाहित्यकारों के अवदान को उद्भासित करने का प्रयास किया है। इनके अतिरिक्त मेरे द्वारा लिए गए उनके विस्तृत साक्षात्कारों में भी उनके कृतित्व, रचना प्रक्रिया आदि को रेखांकित करते हुए उनके प्रदेय को जिज्ञासु पाठकों, शोधार्थियों के लिए सुलभ कराया है। साक्षात्कार विधा की मेरी दो पुस्तकें हैं - 'हिन्दी बालसाहित्य विमर्श', 'हिन्दी बालसाहित्य जिज्ञासाएँ और समाधान'। इन पुस्तकों की अगली कड़ी के रूप में मेरी यह पुस्तक है - 'समकालीन बालसाहित्य : रचनात्मक सर्वेक्षण'। इस पुस्तक में मैंने पच्चीस बालसाहित्यकारों के अवदान को उनकी विशिष्ट विधा के रूप में मूल्यांकित करने का प्रयास किया है। इन दिनों बालसाहित्य की सभी विधाओं में स्तरीय लेखन हो रहा है। नाटकों की कमी को भी कुछ हद तक दूर कर लिया गया है। विज्ञान साहित्य भी जिस-जिस साहित्यकार का जो-जो विशिष्ट क्षेत्र है मैंने उसी क्षेत्र के उनके अवदान पर आलेख लिखे हैं। जैसे प्रताप सहगल का क्षेत्र नाटक है। देवेन्द्र मेवाड़ी जी का विज्ञान-लेखन है। जाकिर अली 'रजनीश' की विज्ञान-कथाएँ हैं। सूर्यनाथ सिंह का विशिष्ट क्षेत्र विज्ञान फंतासी है। मैंने उनके उन्हीं विशिष्ट क्षेत्रों को कलमबद्ध किया है।

डॉ. प्रकाशमनु

डॉ. प्रकाशमनु एक ऐसे समर्थ बालउपन्यासकार हैं जो बाल-जीवन की सच्चाइयों से जुड़कर न केवल बच्चों की आशाओं-आकांक्षाओं, सपनों, इच्छाओं, प्रश्नों-जिज्ञासाओं के प्रामाणिक चित्र अपने उपन्यासों में चित्रित करते हैं वरन् अपनी नवीन सोच तथा गम्भीर चिन्तन को भी वाणी देते हैं। बालमन की गहरी समझ रखने वाले बालसाहित्यकार डॉ. प्रकाशमनु ने बालसमाज की धड़कन को महसूस कर बालजीवन और बालमन के विभिन्न आयामों का चित्रण किया है। एक दूसरे से भिन्न कथाफलक वाला इनका हर उपन्यास पाठकों को बालमानस और बालमनोवृत्तियों का संसंस्पर्श कराता है।

बालस्वरूप राही

स्थापित गीत, गज़लकार बालस्वरूप राही जी ने प्रौढ़ होते हुए भी बालकों की मानसिकता को ग्रहण किया है। उन्होंने शिशु वर्ग, बाल वर्ग और किशोर वर्ग तीनों के लिए उनकी रुचि के अनुकूल मनोरंजक, ज्ञानवर्द्धक, प्रेरक शिशुगीत और बालकविताएँ देकर बालसाहित्य को समृद्ध किया है। बालस्वरूप राही जी की कविताओं में लय-ताल में गूँथा तरन्नुम का वह जादू है, जो इन्हें बच्चों का कंठहार बनाता है।

प्रताप सहगल

बच्चों के लिए खेले गए प्रताप सहगल के नाटक सोद्देश्य भी होते हैं और मनोरंजन को केन्द्र में रखकर भी प्रस्तुत किए जाते हैं। उनका मानना है कि बच्चों के लिए नाटक में एक ऐसे संसार की रचना ज़रूरी है, जहाँ उनकी कल्पना को पंख लग सकें, उनके अंदर बैठा मासूम कलाकार सामने आ सके, पहले से थोड़ा सयाना होकर लौटे, उनके अंदर छिपी प्रतिभा को प्रदर्शन का अवसर मिले।

पदमा चौगांवकर

बालसाहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपने लेखन के लिए प्रशंसित रचनाकार और अनुवादक पदमा चौगांवकर जी दोनों रूपों में अपने पाठकों में अत्यंत चर्चित एवं बहुपठित लेखिका हैं। इनकी कहानियाँ कौतूहल, कल्पनाशीलता, मनोविज्ञान, मनोरंजन तत्त्व से भरपूर हैं। सहजता एवं स्वाभाविकता से ओतप्रोत ये कहानियाँ मात्र मनोरंजक ही नहीं प्रेरणादायी भी हैं।

रमाशंकर

नई शैली और नए प्रयोग के बाल साहित्यकार चर्चित हस्ताक्षर रमाशंकर हैं, जिनके बालसाहित्य का अपना वैशिष्ट्य है। आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान का क्षितिज अत्यंत व्यापक है। बाल कहानियाँ नानी-दादी की कहानियों से शुरू होकर धीरे-धीरे आज के वैज्ञानिक युग के सन्दर्भ को लेकर चल रही हैं। उन्होंने विज्ञान लेखन द्वारा विज्ञान और हिन्दी का सुंदर मेल कराया है। लेखक ने कहानियों के माध्यम से विज्ञान साहित्य रचा वह अपने आप में स्तुत्य एवं सराहनीय होने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ी के लिए भी प्रेरणादायक है।

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

बहुआयामी साहित्यिक प्रतिभा-सम्पन्न डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं जिनका बालसाहित्य के सृजन और आलोचना दोनों क्षेत्रों में प्रदेय उल्लेखनीय है। 'टेढ़ा पुल' उनका बालमनोविज्ञान पर आधारित बालउपन्यास है जिसका केन्द्रीय पात्र गिजू नामक बालक है जो माता-पिता के आपसी तनावपूर्ण संबंधों की सज़ा भुगतता है। लेखक ने इस सच्चाई की त्रासदी को इस उपन्यास के माध्यम से उजागर किया है।

दिशा ग्रोवर

नवोदित बालसाहित्यकार दिशा ग्रोवर ने अब तक उपेक्षित चली आ रही नाटक विधा को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। 'बाघू के किस्से' शीर्षक से उनका पहला नाटक-संग्रह आया है जिसमें पशु-जगत् के बालमन की रोचक गतिविधियां हैं। संग्रह में अलग-अलग कुल छह नाटक हैं, किन्तु परस्पर इतने संपृक्त हैं कि कृति उपन्यास का आनंद देती है।

डॉ. कामना सिंह

डॉ. कामना सिंह बालउपन्यास क्षेत्र की एक उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं। समकालीन चिन्तनधारा से जुड़े उनके सभी बालउपन्यास कथ्य की नवीनता लिए हुए हैं। हर आयु-वर्ग के बचपन को, उनकी प्रकृति को, उनके मनोविज्ञान को बड़ी खूबसूरती से लेखिका ने चित्रित किया है।

देवेन्द्र मेवाड़ी

बच्चों के प्रिय विज्ञान-लेखक बहुज्ञ एवं बहुपठित देवेन्द्र मेवाड़ी जी साहित्य और विज्ञान लेखन को जोड़कर सृजन की धारा को प्रबल बनाने के पक्षधर हैं। उनका कहना है कि- "मैं साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूँ।" मेवाड़ी जी ने बच्चों को विज्ञान की तरफ आकर्षित करने के लिए हर सम्भव शैली में विज्ञान लिखा। उनके विज्ञान लेखन में हमें विषयों की विविधता के साथ-साथ शैली की भी विविधता मिलती है।

श्याम सुशील

श्याम सुशील जी में कविता को बच्चों के मन से जोड़ने की अद्भुत क्षमता है। इन्होंने बच्चे और बच्चों के भावों जैसी ऐसी सुकोमल कविताएँ लिखी हैं जो बालमन को रिझाने के साथ-साथ उनके सपनों, इच्छाओं, शरारतों, बाल-सुलभ चेष्टाओं के संसार से जोड़ती हैं। इन कविताओं में बच्चों का अंतरंग संसार है। सुशील जी कविता को भाषा की सुघराई और सजावट के साथ इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि वे बच्चों को लुभाती हैं। उनकी कल्पनाशीलता, चंचलता और नयापन बच्चों को आकृष्ट करता है।

भगवती प्रसाद गौतम

जिनकी कविता में कविताई और संगीत का मणिकांचन योग है, जिनके बालगीत पाठकों को बचपन में ले जाते हैं, ऐसे लेखनी के धनी बालसाहित्यकार भगवती प्रसाद गौतम जी की कविताओं में मनोरंजन ही मनोरंजन है। आनंद ही आनंद है। शरारतें ही शरारतें हैं, जो कल्पनाशक्ति का विकास करती हैं। जिनकी कविताएं बच्चों को भाती हैं। जिन्हें वे गुनगुनाते हैं। गाते हैं।

डॉ. मो. अरशद खान

भावनात्मक जुड़ाव के साथ रची खूबसूरत कहानियों के रचयिता डॉ. मो. अरशद खान जिन्हें एक बार पढ़ने के बाद पाठक कभी भूल नहीं पाते। कौतूहल, कल्पनाशीलता, मनोविज्ञान, मनोरंजन तत्त्व से भरपूर एवं रोचक कथा-शैली में लिखी सोद्देश्यपरक कहानियों की पठनीयता डॉ. अरशद की कहानियों की सबसे बड़ी सफलता और सार्थकता है।

डॉ. विकास दवे

'न फूल चढ़े न दीप जले' विविध आयामी प्रतिभा-सम्पन्न डॉ. विकास दवे की राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कृति है। उन्होंने अपने गहन अध्ययन और गूढ़ ज्ञान के आधार पर क्रांतिकारियों की विश्वसनीय तस्वीर प्रस्तुत की है। स्वभाव से चिन्तनशील और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट आस्था रखने वाले दवे जी ने स्वतंत्रता के इतिहास के उन परिच्छेदों पर प्रकाश डाला है जिनकी स्मृतियों को हमारे इतिहास-लेखकों ने भुला दिया।

डॉ. जाकिर अली 'रजनीश'

बालसाहित्य के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर डॉ. जाकिर अली 'रजनीश' बच्चों के लिए विज्ञान कथाएं लिखने वाले रचनाकारों में एक हैं। उन्होंने वैज्ञानिक जानकारियों को कथानक में गूँथकर बेहद रोचकता के साथ प्रस्तुत किया है ताकि बच्चों को विज्ञान की रहस्यमयी दुनिया की नई-नई जानकारी मिल सके और साथ ही उनकी सोच को भी वैज्ञानिक आयाम मिल सके। विज्ञान जैसे गूढ़ विषय को साहित्य का विषय बनाने के लिए जिस संवेदना की अपेक्षा की जाती है, वह भी 'रजनीश' में भरपूर मात्रा में विद्यमान है।

प्रो. डॉ. साजिद खान

बालमनोविज्ञान को जानने-समझने की अद्भुत क्षमता रखने वाले प्रो. डॉ. साजिद खान की कहानियों का फलक बहुत ही विस्तृत है। पिछले तीन दशकों से सतत प्रवहमान उनकी कथा-यात्रा में विविध विषयों की एक से बढ़कर एक कहानियाँ आई हैं, जो बच्चों को आनंद प्रदान करने के साथ उनका ज्ञानवर्द्धक भी करती हैं। इनकी कहानियाँ बालकों का चरित्र-निर्माण, ज्ञानवर्द्धक और मनोरंजन सब साथ-साथ करती हैं।

शीला पांडे

किसी भी देश के धार्मिक-सांस्कृतिक-चिन्तन और जीवन-दृष्टि को जानने-समझने के लिए लोकसाहित्य सशक्त माध्यम है, जो उसे अपनी जड़ों तक ले जाता है। शीला पांडे ने भिन्न-भिन्न अंचलों की लोककथाओं को बच्चों की भाषा में बड़े सुंदर ढंग से सहेजा है। उन्होंने ऐसी लोककथाएँ लिखी हैं, जिनमें उस अंचल की सुवास है। रीति-रिवाज़ों की गंध है। भाषा की खूबसूरती और कल्पना का सौंदर्य है। लोककथा के क्षेत्र में एक नए ढंग की रचनात्मक प्रस्तुति है।

सूर्यनाथ सिंह

रचनात्मक विज्ञान-लेखन का सर्वाधिक सशक्त रूप है विज्ञान-कथाएँ एवं विज्ञान-फंतासी। विज्ञान-कथाओं का आधार वैज्ञानिक सत्य होते हैं। विज्ञान-फंतासी का आधार भी वैज्ञानिक तथ्य होते हैं। फंतासी का अर्थ है किसी वस्तु को जो अदृश्य है, दृष्टव्य बना दिया जाए। जिसमें कल्पना अतिरंजित तो हो सकती है पर असंभव नहीं। सूर्यनाथ सिंह जो इस विधा के ऐसे समर्थ कथाकार हैं, जिन्होंने वैज्ञानिक परिवेश और नवीन कल्पना के साथ उपन्यास लिखे हैं, जो हमें संभावित नए-नए लोकों की सैर कराते हुए विज्ञान की आने वाली अनोखी दुनिया और ग्रहों की जानकारी देते हैं। उनमें ऐसा कथारस भरते हैं कि पाठक उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं।

दामोदर अग्रवाल

अपनी रचनात्मक उपलब्धियों से हिन्दी बालकविता को गौरवान्वित करने वाले अंग्रेजी के प्रोफेसर दामोदर अग्रवाल जी ने हिन्दी में बच्चों के लिए खूब लिखा है। उन्होंने बच्चों के मूड और चाहतों की मनभावन कविताएँ लिखी हैं। इनकी कविताएँ बच्चों को उस आनंद के महासागर में ले जाती हैं, जहाँ बच्चे डूबे रहना चाहते हैं। दामोदर अग्रवाल की कविताओं के चाहे कहीं-कहीं चिर-परिचित विषय हैं, किन्तु उनमें अर्थ नया भरने की अद्भुत सामर्थ्य है। यही सामर्थ्य उनकी कविता को सबसे अलग हटकर नया सौंदर्य प्रदान करती है।

श्री कृष्ण 'शलभ'

श्री कृष्ण 'शलभ' का बालसाहित्य सृजन, आलोचना एवं संपादन की दिशा में प्रशंस्य स्थान निर्मित किया है। एक संपादक के रूप में उनका स्थान अद्वितीय है। उनके संपादकीय मात्र भूमिका नहीं हैं, आलेख मात्र नहीं हैं। उनमें सर्वत्र लेखक की अनुसंधानपरक प्रकृति दिखाई देती है। बालकविता के मर्मज्ञ के रूप में उन्होंने श्रेष्ठ बालकविता के जो सूत्र बीच-बीच में दिए हैं वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी सामग्री है। 'बचपन एक समंदर' की भूमिका मात्र कुछ पृष्ठों की नहीं - वह एक लघु पुस्तिका है जिसमें बालकविता के स्वरूप, उसका आकार, विषय और उसकी परंपरा का यानी पूरा सौ वर्षों का इतिहास अंकित है।

डॉ. रत्नलाल शर्मा

डॉ. रत्नलाल शर्मा ने बाल कविता के प्रतिमान परिभाषित करते हुए बाल कविता का स्वरूप ऐसी कविता से माना है, जो बच्चों के लिए लिखी जाए यानी जिसके पाठक बच्चे हों। जो बच्चों को केंद्र में रखकर लिखी जाए। जिसमें बाल-जीवन अंकित हो, उनकी अनुभूतियां, उनके क्रियाकलाप, बाल सुलभ राग-द्वेष आदि चित्रित हों यानी कविता के केंद्र में केवल बालक हों और उनका संसार हो। बच्चों के संसार से अभिप्राय उनका बाह्य जगत् और अंतर्जगत् दोनों हैं, अंतर्जगत् से यही अभिप्राय उनके भीतरी मनोवेगों का प्रतिबिंब है। भले ही उस कविता का रचयिता स्वयं बालक, किशोर या प्रौढ़ कोई भी हो सकता है।

डॉ. श्रीप्रसाद

बालकविता के शलाका पुरुष डॉ. श्रीप्रसाद जी का कविता-संसार अत्यंत वैविध्यपूर्ण है। बालमनोजगत् के जितने भाव, जितने मूड्स हैं वे सब इनकी कविताओं में विद्यमान हैं। इनमें बालक्रीड़ाएँ हैं, बालसुलभ नटखटपन है, गुदगुदाने वाला हास्यविनोद है। पूरा बालमनोविज्ञान उनकी कविताओं में समा गया है। उन्होंने बालमन को रिझाने वाली उसके सपनों, बालसुलभ शैतानियों, इच्छाओं, आकांक्षाओं, नटखटपन, कुतूहल, उत्साह से भरी कविताएँ लिखीं। गुणवत्ता और परिमाण दोनों दृष्टियों से उनकी कविताएँ चर्चित और बड़ी प्रशंसित रही हैं।

शांति अग्रवाल

शांति अग्रवाल जी बालकविता के आरंभिक दौर की कवयित्री हैं जिन्होंने बच्चों के लिए अत्यंत मोहक कविताएँ लिखी हैं। विषय-वैविध्य शांति अग्रवाल की कविताओं का प्रमुख गुण है। कुछ विषय चाहे परंपरागत हैं, लेकिन छंदों की ताल-लय में निबद्ध इन कविताओं की मोहक प्रस्तुति के कारण बच्चे इन्हें सुनकर गुनगुनाते रहते हैं। वे बच्चों को सहज ही कंठस्थ हो जाती हैं। ये कविताएँ केवल गाने-गुनगुनाने के लिए नहीं हैं, ज्ञानवर्द्धक भी हैं। बच्चों को विभिन्न जानकारियाँ भी खेल-खेल में दे दी जाती हैं।

प्रयाग शुक्ल

लय-ताल में निबद्ध अपनी रसीली कविताओं और छोटे-छोटे शिशुगीतों से विशिष्ट पहचान बनाने वाले प्रयाग शुक्ल जी बच्चों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं। उनके काव्यजगत् में पशु-पक्षियों का संसार, घर-परिवार, संबंध, मित्रता, नानी-दादी सब समाया हुआ है। प्रयाग जी की बालकविताओं के जादुई प्रभाव पर बच्चे ही नहीं, बड़े भी मुग्ध हैं।

डॉ. क्षमा शर्मा

साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ. क्षमा शर्मा की बालकहानियों के अद्भुत पिटारे में एक से बढ़कर एक सुंदर बालमनप्रिय कहानियों का अद्भुत खज़ाना है। इन कहानियों की विशेषता है कि उनमें कहीं भी उपदेश की बोझिलता अथवा भाषा की क्लिष्टता नहीं है। हर कहानी स्वयं कुछ कहती है, लेकिन लेखक नहीं। क्षमा जी में बालमनोविज्ञान को जानने-समझने की अद्भुत क्षमता है। वे उनका मनोरंजन करती हैं। बच्चा स्वतः उससे संदेश ग्रहण करता है।

प्रो. उषा यादव

प्रो. उषा यादव मेधा-सम्पन्न उन प्रतिभाशाली दिग्गज साहित्यकारों में हैं जिन्होंने प्रौढ़ साहित्य के साथ-साथ बालसाहित्य को भी विविध विधाओं से समृद्ध किया है। उनकी कविताओं में कल का बच्चा भी है। कुछ भाव, शरारतें शाश्वत हैं। कल भी सब वही था आज भी वही है। उषा यादव के बालकाव्य का कोई रूप हो - लोरी, शिशु गीत, बाल कविता या किशोर कविता सबमें बाल परिवेश है। बालमन है और बालोपयोगी भाषा है। सरलता, सरसता इनका गुण है। सुघड़पन इन कविताओं की प्रमुख विशेषता है।

जैसा कि मैंने पूर्व में कहा है कि समकालीन बालसाहित्यकारों की लम्बी लिस्ट है। पुस्तक की स्थान-सीमा को देखते हुए इस बार इतना ही।


डॉ. शकुंतला कालरा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: एन.डी.-57, पीतमपुरा दिल्ली-110034 मो: 8287479455, 9958455392 लैंड लाइन: 011-27318835
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