नया सवेरा (बालिका केन्द्रित बालकहानियाँ)
मेरी ओर से बालक हो या बालिका दोनों बच्चे हैं और ईश्वर का अमूल्य वरदान हैं। दोनों समाज का महत्त्वपूर्ण अंग भी। पर दुःख की बात यह है कि आज भी दोनों में भेद किया जाता है। हालांकि आज समाज की, माता-पिता की धारणा बदली है। पुरानी रूढ़ियाँ धीरे-धीरे टूट रही हैं, लेकिन पूरा बदलाव आना अभी शेष है।
मेरी कुछ कहानियाँ बालिका-विमर्श की कहानियाँ हैं। इसलिए ये कहानियाँ लंबी हो गई हैं। बालिकाएं आज अपनी योग्यता से हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। ज्ञान-विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी में निपुणता हासिल कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। हर क्षेत्र में वह अपना योगदान दे रही हैं लेकिन यह स्थिति सर्वत्र नहीं है। जो हमारा निम्न वर्ग है वह आज भी अभावों की ज़िंदगी जीने को मजबूर है। वह स्वाधीन नहीं है। वहाँ आज भी शिक्षा का अभाव है। बाल मज़दूरी आज भी है।
बालिकाओं से जुड़े इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कुछ कहानियाँ हैं और मैं चाहती हूँ हर बालिका को शिक्षा मिले जो उनका बुनियादी अधिकार है। ये कहानियाँ बच्चों का मनोरंजन भी करेंगी और कुछ संदेश भी देंगी जो उनका अंधेरी राह में आलोक स्तंभ होगा।
बालिकाओं का सवेरा – यही मेरी कामना है। हर कहानी में एक उम्मीद है, एक पहल है। आपके विचार मेरे लिए मूल्यवान हैं।
— सादर, डॉ० शकुंतला कालरा