अपनी ओर से: डॉ. दर्शन सिंह आष्ट और उनका बाल साहित्य
बालसाहित्य आज के सर्जनात्मक साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु उपेक्षित विधा है। साहित्य के इतिहास में बालसाहित्य का कहीं कोई स्थान नहीं क्योंकि उसे साहित्य की मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं किया गया। हालांकि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के शीर्षस्थ लेखकों ने उत्कृष्ट बालसुलभ रचनाएं लिखी हैं फिर भी हमारे विद्वानों, अकादमियों तथा प्रौढ़ साहित्य के लेखकों ने भी इसे दूसरे दर्जे का साहित्य ही माना है किंतु आज ऐसा नहीं है। बालसाहित्य के द्रुत गति से बढ़ते कदम हमें आश्वस्त करते हैं कि बालसाहित्य का भविष्य उज्ज्वल है ।
देशभर में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की लगभग दो सौ साहित्यिक पत्रिकाएं मासिक, द्विमासिक अथवा त्रैमासिक रूप में छप रही हैं। केंद्रीय हिंदी निदेशालय से प्रकाशित ‘वार्षिकी’ में भी हर वर्ष की बालसाहित्य की विकास यात्रा पर लेख प्रकाशित होते हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में बालसाहित्य के महत्व एवं उपादेयताविषयक अनेक लेख इस बात का प्रमाण हैं कि आज बालसाहित्य हाशिए पर नहीं है। बालसाहित्य पर अनेक विश्वविद्यालयों में एम.फिल. और पी-एच.डी. की डिग्री हेतु शोधकार्य निरंतर हो रहे हैं। दोयम दर्जे का उपेक्षित विषय नहीं रहा। हिंदी साहित्य के इतिहासलेखकों के लिए इसके महत्व को अब अस्वीकार करना संभव नहीं होगा। हिंदी बालसाहित्य का अपना एक इतिहास होगा। इधर प्रकाशक भी अब इसे छापना घाटे का सौदा नहीं मान रहे और विभिन्न राज्यों की अकादमियां, सरकारी तथा स्वैच्छिक संस्थाएं भी प्रौढ़ साहित्य के समान ही पुरस्कार एवं सम्मान के माध्यम से इसे मान्यता दे रही हैं ।
इधर हिंदी बालसाहित्य पर कुछ करने के लिए मैं लंबे समय से बालसाहित्यकारों के साहित्यिक अवदान का मंथन करती आ रही हूं। बालसाहित्य और बालसाहित्यकार एक दूसरे से जुड़े हैं। बालसाहित्यकार की गरिमा से बालसाहित्य गौरवान्वित होगा और बालसाहित्य की प्रतिष्ठा से बालसाहित्यकार स्वतः प्रतिष्ठित होगा। दोनों एक-दूसरे की पहचान हैं। हिंदी बालसाहित्य को सम्मानित दर्जा दिलाने में विद्याभूषण विभु, स्वर्ण सहोदर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, दामोदर अग्रवाल, निरंकारदेव सेवक, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, सोहनलाल द्विवेदी आदि ने स्वयं को समर्पित कर दिया ।
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बालसाहित्य निरंतर अपने विकासपथ पर अग्रसर हो रहा है। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और, प्रेरणादायी महापुरुषों की जीवनियां आदि विभिन्न विधाओं में अपने ऊर्जापूर्ण अवदान से इसे आगे बढ़ाया है। आज हिंदी बालसाहित्य अन्य किसी भी भाषा के बालसाहित्य से होड़ लेने में पूरी तरह सक्षम है। वह आज के तीक्ष्ण आई.क्यू. वाले बालकों के तेवर के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहा है। उसमें विज्ञान, टेक्नोलॉजी सब समाहित है। अब वह केवल किस्से कहानियों तक ही सीमित नहीं रह गया है। विष्णु प्रभाकर, डॉ. देवसरे, डॉ. श्रीप्रसाद, डॉ. प्रकाश मनु, डॉ. जयप्रकाश भारती, डॉ. राष्ट्रबंधु, डॉ. क्षमा शर्मा, डॉ. ऊषा यादव, देवेंद्र कुमार, रमेश तैलंग, कृष्ण शलभ, भैरुं लाल गर्ग, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’, डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, डॉ. दिविक रमेश, डॉ. शकुंतला कालरा, डॉ. सुरेंद्र विक्रम, हूंदराज बलवाणी आदि ने इसे अपने अमूल्य देय से समृद्ध किया है। हिंदी बाल कविता के उल्लेखनीय हस्ताक्षरों में शेरजंग गर्ग, बालस्वरूप राही, सूर्य कुमार पांडेय, सूरज भान गुप्त आदि हैं जिन्होंने हिंदी बाल कविता को विकास के उच्च शिखर पर पहुंचाया है। ये सभी बालसाहित्य के गौरव हैं ।
पंजाबी और हिंदी की लगभग तीन दर्जन पुस्तकों के रचयिता डॉ. दर्शन सिंह आशट लंबे समय से बालसाहित्य लिख रहे हैं। उनकी रचनाओं ने बच्चों में अपना अलग स्थान बनाया है। उन्होंने बच्चों के लिए कहानियां भी लिखी हैं और कविताएं भी। कुछ शोधपरक आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। इनके अतिरिक्त वह एक अच्छे अनुवादक भी हैं। आशट जी में कविता की संवेदना भी है जिसके कारण उन्होंने काव्यानुवाद में विशेष सफलता पाई है। हिंदी से पंजाबी और पंजाबी से हिंदी में उन्होंने अनेक रचनाओं के सफल अनुवाद किए हैं। एक संपादक के रूप में भी उन्होंने कार्य किया है। शिशुगीत के दो संकलन उन्होंने संपादित किए हैं। इस तरह वे बच्चों के भाव-संसार से बहुत करीब से जुड़े हैं। यह पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं के समर्थ रचनाकार हैं। पाकिस्तान के पंजाबी रचनाकारों में भी इनकी विशेष पहचान है। गुरमुखी व शाहमुखी दोनों लिपियों पर उनका समान अधिकार है। ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. दर्शन सिंह जी के हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं के समग्र साहित्य का जब मैंने अध्ययन किया तो मुझे लगा कि इनके साहित्यिक अवदान का बालसाहित्य अध्येताओं द्वारा मनन-मूल्यांकन होना चाहिए ।
अब तक मैंने डॉ. जयप्रकाश भारती और डॉ. राष्ट्र बंधु के बालसाहित्य पर पुस्तकें संपादित की हैं। विभिन्न विद्वानों द्वारा आकलन के बाद अनेक महत्वपूर्ण लेख उस पुस्तक में संपादित हुए हैं। इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए बालसाहित्यकार डॉ. दर्शन सिंह आशट के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक पुस्तक संपादन की योजना बनी। विद्वान लेखकों ने सहयोग दिया और पुस्तक तैयार हो गई। मैं मानती हूं कि इन लेखकों में दर्शन सिंह आशट और उनके बालसाहित्य की सटीक और सम्यक विवेचना हुई है। व्यक्तित्व-विषयक लेखों में उनके मित्रों द्वारा उनके दृढ़ता, गरिमा, साहस, संकल्प आदि विशिष्ट गुणों की चर्चा है जिन्होंने उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचाने में सफलता प्रदान की है। कृतित्वविषयक लेखों में उनके हिंदी बालसाहित्य का विवेचन-विश्लेषण है। डॉ. आशट जी की रचनाओं को पढ़कर मुझे लगा कि वह बालकहानी-लेखन में बेजोड़ हैं। कहानीकार आशट जी का वैशिष्ट्य इस बात में निहित है कि वह जीवन-मूल्यों पर बच्चों को व्याख्यान नहीं देते ।
बच्चों के मन-मस्तिष्क का गहन अध्ययन करके उनकी भोली बातों एवं शरारतों में से कोई विषय चुनकर अपनी कल्पना-शक्ति से उसे कहानी का रूप दे देते हैं। बच्चे के मनोजगत को वह भलीभांति समझते हैं। बच्चा क्या सोचता है, उसकी रुचि, पसंद क्या है, उसकी जरूरत क्या है आदि बातों एवं मानसिक जगत के क्रिया-कलापों को सूक्ष्म दृष्टि से परख कर उसका विश्लेषण करते हैं, डॉ. आशट के पास बच्चे की हर जिज्ञासा का समाधान है। वह बच्चों के मानसिक धरातल पर आए आरोह-अवरोहों के साथ उनके तनावों और उनकी दुनिया की समस्याओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण करते हैं। दर्शन सिंह आशट बच्चों के प्रिय कहानीकार हैं। उनकी कहानियां बच्चों का सहज एवं स्वस्थ मनोरंजन करने में समर्थ हैं क्योंकि वे बच्चों की प्रिय और जानी-पहचानी भावभूमि को स्वयं मानसिक स्तर पर बच्चा बनकर आत्मसात करके लिखते हैं। दर्शन सिंह के पास बच्चों का सा निष्कपट उन्मुक्त होकर हंसने-खेलने वाला मन है। उनमें बालमन की कोमलता, निश्चलता, भोलापन, सरलता आदि गुण हैं। उनकी कहानियों में सरल बचपन बालानुरूप सरल भाषा में अभिव्यक्ति पाता है ।
वह कहानी की भाषा में सरलता और सहजता के पक्षधर हैं। उनकी वर्णन शैली भी सीधी-सादी है। वे ऐसा घटना व्यापार नहीं रचते जिसमें जटिलता हो। बालमनोविज्ञान पर आधारित उनकी कहानियां सांस्कृतिक तथा नैतिकता का सहज प्रभाव छोड़ती हैं। पंजाबी तथा हिंदी भाषा के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को साहित्य की धरोहर देने का नैतिक कार्य किया है ताकि बच्चे अपनी विरासत और परंपराओं को भुला न सकें। वे बच्चों में नई सोच विकसित करने वाले साहित्यकार हैं। हिंदी बालसाहित्य को गौरवपूर्ण विशिष्ट साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने में उनका योगदान उल्लेखनीय है ।
समग्रतः डॉ. दर्शन सिंह आशट का बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व बालसाहित्य के विकास के प्रति गहरी संभावना प्रकट करता है। अपने मौलिक सृजन तथा पंजाबी से हिंदी और हिंदी से पंजाबी में अनुवाद कर उन्होंने क्षेत्रीय भाषा को हिंदी से जोड़ने का स्तुत्य कार्य किया है आशा है अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक भी उनसे प्रेरणा प्राप्त करेंगे ।
बालसाहित्यकारों से जुड़ी मेरी यह स्मृतियाँ पुस्तक में छपी संस्मरण हो गई। लगभग तीन दशकों के सुदीर्घ अंतराल बहुत सी घटनाएँ स्मृति से उतर चुकने की स्थिति में हैं। जीवन-यात्रा के पथ में मिले कई महत्वपूर्ण चेहरे अब धुंधले भी पड़ने लगे हैं। बचपन में मिले कई महत्वपूर्ण परिचय अब आयु के वार्धक्य की परतों में दबते जा रहे हैं। कुछ स्नेहमयी आँखें अभी भी इन धुंधली आँखों में बसी हुई हैं। मेरा प्रयास रहेगा कि उन चित्रों को भी कागज़ पर उतार लूँ ताकि वे स्मृतियाँ भी संस्मरण बन जाएँ।