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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

भूमिका · बालसाहित्य की विभूतियाँ

भूमिका · आत्मनिवेदन (हिन्दी बालसाहित्य के अनन्य साधक)

बालसाहित्य की कतिपय विभूतियों की अनन्य साधना

स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात हिंदी बालसाहित्य में अभूतपूर्व प्रगति हुई। 20वीं शताब्दी बालसाहित्य-लेखन में विश्वव्यापी क्रांति लेकर आई। जिन लेखकों ने बच्चों की मनोवृत्ति के अनुकूल उनकी बौद्धिक क्षुधा को शांत करने वाला पौष्टिक साहित्य दिया उनका कार्य प्रशंसित हुआ और उन्हें बच्चों ने भी खूब सराहा। बच्चों की रुचियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन, उनके परिवेश, बौद्धिक विकास आदि का विश्लेषण करते हुए बालसाहित्य की रचना करने में हमारे बालसाहित्यकारों ने महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने बच्चों की मनोभावनाओं और उनकी समस्याओं के साथ उनकी जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत करने वाला बालसाहित्य रचा। बच्चों ने उस साहित्य को पूरे दिल से स्वीकारा और सहर्ष उसके साथ जुड़ गए। उन्होंने मौलिक कल्पना के महत्वपूर्ण विषय उठाए और उनका प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण किया। बच्चों के जीवन और मनोभावों को प्राथमिकता दी। मनोवैज्ञानिक, ज्ञानवर्धक, मनोरंजन एवं लीक से हटकर ऐसा सरस बालसाहित्य दिया जिसमें बालपाठक अपनी ही भाषा में अपने मन की अभिव्यक्ति पाता है। अपने भावजगत एवं मनोजगत से परिचित होता है। वास्तव में किसी भी विधा में बालसाहित्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें बच्चों की रुचि और दृष्टिकोण को लेकर कितना और कैसे कहा गया है। सरल, मुक्त, बहती हुई भाषा में विषय का प्रस्तुतीकरण हो तो सोने में सुहागा। बच्चों की बात उन्हीं के माध्यम से प्रस्तुत करने वाली रचना ही बच्चों को अधिक भाती हैं फिर चाहे वह कविता हो चाहे कहानी या इनसे इतर नाटक, उपन्यास आदि विधाएं। उसमें बच्चों की दुनिया का हर रंग, हर छवि मौजूद होनी चाहिए।

हमारे ख्यातिनाम बालसाहित्यकारों ने अपने बहुआयामी सृजन के द्वारा बालसाहित्य की अनन्य सेवा की है। ऐसे अनन्य साधकों के अवदान का बालसाहित्य और उसके सहृदय पाठक सदा ऋणी रहेंगे। बालसाहित्य के ऐसे आधिकारिक चर्चित हस्ताक्षरों की साहित्यिक संपदा सदा हमारे साथ रहेगी और उन्हें अमरता प्रदान करेगी। बालसाहित्य के पुरोधा, जिन्होंने बच्चों को अनेक प्रेरक रचनाएं दीं, का योगदान अकथ्य और अवर्णनीय है। विविध विधाओं में अपने मौलिक सर्जन और आलोचना के धरातल पर बालसाहित्य को ऊंचाइयां दीं, वे बेजोड़ हैं। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों बालसाहित्य-उन्नयन को समर्पित रहे। समय-समय पर विशिष्ट एवं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के अनुरोध पर ऐसे जिन बालसाहित्यकारों और उनके अवदान को आलेख के माध्यम से उद्भासित करने का विनम्र प्रयास किया वे सभी इस पुस्तक में संकलित हैं।

बालसाहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण साधक और भी हैं जिन पर काम करना शेष है। यह कार्य मैंने योजनाबद्ध तरीके से तारीखों या वय के अनुसार या युग के अनुसार क्रमबद्ध रूप से नहीं किया इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण एवं चर्चित हस्ताक्षर इनमें नहीं हैं। जैसा कि मैंने पूर्व में स्पष्ट किया है कि ये वे आलेख हैं जिन्हें पत्रिकाओं के संपादकों तथा पुस्तकों में संकलन-हेतु उनके संपादकों के आग्रह पर विशेषांक विशेष के लिए लिखा है। ये सभी आलेख पूर्व में जहां-तहां प्रकाशित हैं। बालसाहित्य के मार्गदर्शक एवं ज्योति-स्तंभ इन प्रतिष्ठित रचनाकारों ने बालसाहित्य के विकास के लिए जो कार्य किया उसकी कोई मिसाल नहीं। बालसाहित्य की समृद्धि और उसके उन्नयन में यद्यपि उनका योगदान बहुत बड़ा और बहुमुखी है किंतु इन आलेखों में उनके किसी विशिष्ट पहलू का मात्र कुछ पृष्ठों की सीमा में ही आकलन हो पाया है। इन सभी साहित्यकारों का अवदान विस्तृत शोधपरक मूल्यांकन की अपेक्षा रखता है। इनके प्रदेय के आकलन की आवश्यकता एवं उपयोगिता को मैं अनिवार्य कार्य मानती हूं और ऐसा विश्वास करती हूं जिन्होंने हमें कुछ दिया है उसके योगदान को उजागर करना हमारा दायित्व है। कुछ कार्य हम करें कुछ भावी पीढ़ी संभाले।

प्रस्तुत पुस्तक में कुल 16 आलेख हैं। प्रथम दो आलेख रवीन्द्र टैगोर के बालसाहित्य से जुड़े हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर बांग्ला साहित्य के ऐसे लेखक हैं जो बंगाली मात्र नहीं, भारतीय मात्र नहीं वे अनंत प्रसार लिए विश्व-पटल के कवि हैं। वे विश्व कवि हैं और उनकी प्रतिभा वैश्विक। उन्होंने बांग्ला में लिखा, परंतु उनके काव्य की संवेदना-सुगंधि भारत के कोने-कोने में परिव्याप्त होते हुए पूरे विश्व की हवाओं को सुवासित कर दिया। अपने गीतों के माध्यम से वे पूरे विश्व के साथ जुड़ गए। अनुवाद और भाषांतरण ने पूरे विश्व को उनके गीतों से परिचित कराया। आज रवीन्द्रनाथ का साहित्य भाषा की सभी सीमाएं लांघ कर सही अर्थों में अखिल विश्व का साहित्य हो गया है।

कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर उन साहित्य-सर्जकों में से हैं जिसका साहित्य परिमाण और गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से अद्वितीय है। कवि के साहित्यिक उत्कर्ष की कसौटी उनके बालसाहित्य में देखी जा सकती है। उनका बालसाहित्य अप्रतिम है। वह एक भावना नहीं वरन् विज़न है। उसमें उनके शैशव से लेकर उम्र-पर्यन्त की सुखदुखात्मक अनुभूतियां रूपायित हुई हैं। उनका बालसाहित्य न केवल बच्चों की निधि है वरन् बड़ों के लिए भी आनंदप्रद है। रवीन्द्रनाथ के बालसाहित्य-लेखन का उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहीं वरन् अपने बचपन की खोज है। ऐसा साहित्य जिसे पढ़कर व्यक्ति का बचपन लौट आए और फिर से बच्चा बनने की इच्छा जागृत हो जाए। यथार्थवादी कहानी के लेखक के रूप में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहानियों के विषय जीवन और अनुभव से ग्रहण किए हैं। उनकी कहानियां बालक के निकट हैं। उनके मनोविज्ञान से जुड़ी हैं। इसी तरह उनके बालगीतों में भी मनोविज्ञान की खुशबू है और बालजीवन का स्पर्श है।

तीसरा आलेख भारत की प्राचीन गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा और वैभव का गुणगान करने वाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्य-रचना 'भारत-भारती' पर आधारित है। मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सांस्कृतिक आंदोलन के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। वह जिस काव्य के कारण राष्ट्रकवि कहलाए वह 'भारत-भारती' है। आज से सौ वर्ष पूर्व भारत-भारती का संदेश देश के नवयुवकों एवं किशोरों में न केवल एक राष्ट्रीय चेतना का संचार करता है बल्कि विश्व में मानवतावाद के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।

'पराग' पत्रिका के यशस्वी संपादक आनंदप्रकाश जैन का कथा संसार पुस्तक का अगला आलेख है। बच्चों की रुचियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन, उनके परिवेश, बौद्धिक विकास आदि का विश्लेषण करते हुए बालसाहित्य की रचना करने में जिन्होंने महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई उन साहित्यकारों में आनंदप्रकाश जैन भी प्रमुख हस्ताक्षर हैं। वह परंपरागत भावभूमि से अलग हटकर नयी ज़मीन की तलाश करते नज़र आते हैं। उन्होंने बच्चों की रुचि के अनुकूल प्रभावशाली कथानक लेकर अलग-अलग विषयों पर केन्द्रित ज्ञानवर्धक और मनोरंजक कहानियां दी हैं। उन्होंने ऐसी कहानियां लिखीं जिनमें बच्चों के जीवन और मनोभावों को प्राथमिकता दी गई। उनकी कहानियां बदलते बालसमाज की स्थितियों का आईना हैं। उनके पास अनंत विषय हैं और उनके अनुरूप समर्थ भाषाशैली भी।

'प्रौढ़ साहित्य के ख्यातिनाम साहित्यकार विष्णु प्रभाकर की बालकहानियां' शीर्षक का अगला आलेख साहित्य की खेमेबाजी से अलग रहकर विभिन्न विधाओं में लिखने वाले बालसाहित्य विष्णु प्रभाकर के बालकहानी-जगत से जुड़ा है। हिंदी साहित्य को पूर्णभावेन समर्पित शब्द-शिल्पी विष्णु जी ने प्रौढ़ साहित्य और बालसाहित्य दोनों में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है। बालक के बचपन को जीते हुए इन्होंने अनेक विधाओं - नाटक, जीवनी, एकांकी और कहानी आदि में बालसाहित्य की रचना की। विष्णु जी की ख्याति एक कहानीकार के रूप में सर्वाधिक है। चाहे वह बड़ों की कहानियां हों चाहे बच्चों की। कथामनीषी बालकहानीकार के रूप में विष्णु जी ने 180 से भी अधिक कहानियां बच्चों को दीं जो अपनी गुणवत्ता और वैशिष्ट्य के कारण पाठकों में अत्यंत प्रिय हैं।

'लोक-संस्कृति में लोरी और शकुंतला सिरोठिया का लोरी-संसार' नामक आलेख में लोरी साम्राज्ञी श्रीमती शकुंतला सिरोठिया की विविध भावभूमियों और रंग-बिरंगी छवियों की लोरियों का विवेचन है। मातृ-हृदय से निःसृत ये मीठी लोरियां कवयित्री की भाव प्रवणता और अतिशय वत्सलता को दर्शाती हैं। संगीत-तत्त्व से भरपूर इनकी लोरियां अपनी जादुई लय, भावों की मार्मिकता और रंगीन कल्पना के कारण अपने आप में अद्वितीय हैं।

पुस्तक का सातवां आलेख 'सदाबहार बालगीतों के रचयिता सीताराम गुप्त' पर केन्द्रित है। इनकी सदाबहार कविताएं व गीत अपनी ताज़गी में पाठकों को लुभाते हैं। सरल भाषा और सहज शिल्प-सौष्ठव द्वारा भावों की लयात्मक प्रस्तुति ने इनके गीतों को सर्व-संप्रेषणीय बनाया है।

'डॉ. देवसरे की दृष्टि में बालसाहित्य और बालकथा-साहित्य की प्रमुख विधाएं : विचार और चिंतन' शीर्षक का आलेख डॉ. देवसरे पर केन्द्रित है जिन्होंने अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम से बालसाहित्य में नई चेतना, नई स्फूर्ति भरी। इस आलेख में उनके बालसाहित्य-विषयक विचार हैं। बालसाहित्य का स्वरूप के साथ बालकथा-साहित्य की महत्वपूर्ण विधाओं - कहानी, नाटक और उपन्यास के विषय में उनकी अवधारणा को स्पष्ट किया है।

'हिंदी बालसाहित्य के विविध आयाम एवं डॉ. बालशौरि रेड्डी का चिंतन' मौलिक लेखन के साथ अनुवाद के क्षेत्र में समान रूप से सक्रिय डॉ. बालशौरि रेड्डी के बालसाहित्य-विषयक-चिंतन पर केन्द्रित है। इसमें बालसाहित्य की दशा और दिशा, उसके भविष्य, उसकी चुनौतियों पर उनके अभिमत जानने का प्रयास किया है।

'सफल जीवनीकार मनोहर वर्मा और विश्व इतिहास की गौरवमयी नारियां' शीर्षक का आलेख पुस्तक का दसवां आलेख है जिसमें कतिपय उन विश्व प्रसिद्ध महिलाओं पर केन्द्रित जीवनियों पर प्रकाश डाला गया है, जो अपनी अलग पहचान रखती हैं तथा जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। वर्मा जी के साहित्यिक मन ने इन प्रतिभाशाली महिलाओं के व्यक्तित्व के उन मूल प्रेरक बिंदुओं को संवेदना की गहराई के साथ उद्घाटित किया है, जो उन्हें सामान्य से विशिष्ट बनाते हैं। उनकी सकारात्मक सोच, कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय के सामने कठिनाइयां खत्म होती गईं और कामयाबी इनके चरण चूमने लगी।

'बालसाहित्य की उज्ज्वल विभूति डॉ. राष्ट्रबंधु के व्यक्तित्व और कृतित्व की विविध छवियां' नामक आलेख में तन-मन-धन से समर्पित एक ऐसे साधक के व्यक्तित्व-कृतित्व के विशिष्ट पहलुओं पर प्रकाश डाला है जिनकी सतत साहित्य-साधना और कर्त्तव्य-निष्ठा निश्चय ही सराहनीय है। डॉ. राष्ट्रबंधु के सरल, अहंकार-शून्य, पारदर्शी व्यक्तित्व ने जहां सदा सबको प्रभावित और सम्मोहित किया वहां बालसाहित्य-लेखन, बालपत्रिका-संपादन एवं बालसाहित्य के प्रचार-प्रसार में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बालसाहित्य-सृजन उनकी दृष्टि में देश-निर्माण का काम है।

'जयप्रकाश भारती : लघुकहानियां - बड़े संदेश' पुस्तक का अगला महत्वपूर्ण आलेख है। चार दशकों से भी अधिक 'नंदन' के संपादक रहे जयप्रकाश भारती जी ने अपने 'संपादकीय' के रूप में पुराण, इतिहास, समाज, विज्ञान के विविध प्रसंगों को आधार बनाकर अनेक लघुकहानियां लिखी हैं। इनमें जीवन के अंतरंग का विश्लेषण है। इन लघुकहानियों में बड़े संदेश निहित हैं। मौलिक दृष्टि एवं सरल भाषा-शैली में इनका कथ्य अनेक प्रेरणा-बिंदु छोड़ जाता है। ये कहानियां ज्ञान की बोझिलता से परे हैं। इनमें भारती जी का जीवन-अनुभव, प्रकृति-ज्ञान, श्रुत-ज्ञान एवं समकालीन बोध अपनी प्रखरता के साथ आया है। इनमें बालकों की रुचि के तत्त्व भी भरपूर हैं, तभी तो वे उन्हें रस लेकर पढ़ते हैं।

'धर्म-संस्कृति की उज्ज्वल परंपरा के पथ-प्रदर्शक : डॉ. शोभनाथ लाल का बाल-पर्यटन साहित्य' नामक आलेख में श्रद्धा और आस्था से पुष्ट भक्तहृदय लेखक का अनुभव जगत प्रकाशित हुआ है। बालकों एवं किशोरों के लिए लिखे ये यात्रापरक निबंध भारतीय संस्कृति के पथ-प्रदर्शक हैं। अन्य विधाओं की भांति यात्रापरक निबंधों का भी अपना महत्व है। देशाटन मनुष्य की आदिम यायावरी प्रवृत्ति का विस्तार है। यात्रा से प्राप्त अनुभव से मनुष्य के ज्ञान का विस्तार होता है। पर्यटन-प्रेमियों के चित्त को आह्लादित करने की भरपूर शक्ति समेटे लेखकीय ज्ञान के अक्षयकोष डॉ. शोभनाथ लाल के निबंध पर्यटन-साहित्य के ज्ञानदीप हैं।

'कृष्ण शलभ की काव्य-यात्रा : गीत, गज़ल से बालकविता तक' की कवि की यात्रा बहुत लंबी है। कृष्ण शलभ की दृष्टि में बालकविता बचपन का प्रतिरूप है। प्रस्तुत आलेख में उनके कविता-संग्रहों की कविताओं के आधार पर उनके वैशिष्ट्य को रेखांकित किया है। उन्होंने बालकविता को नया रूप और नया रंग दिया है। कवि की बालकविताएं उनके हृदय की स्निग्ध अनुभूतियां हैं। इसी आलेख में उनकी संपादन-कला के उत्कृष्ट नमूने 'बचपन एक समंदर' पर भी विस्तार से विश्लेषणात्मक मूल्यांकन किया है। पिछले सौ साल की चुनी हुई प्रतिनिधि कविताएं का यह संकलन बालसाहित्य का ऐतिहासिक दस्तावेज है। यह संकलन इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण शलभ न केवल बच्चों के प्रिय कवि हैं, बल्कि हिंदी बालकविता के बड़े संवेदनशील पारखी भी हैं।

'चन्द्रपालसिंह यादव 'मयंक' की बालकविता का प्रवृत्तिपरक सौंदर्य' नामक आलेख में प्रकृत्या कवि श्री 'मयंक' जी की बालकविताओं की चर्चा है जिनमें बालमन की रंग-बिरंगी इन्द्रधनुषी छवियों का अद्भुत संसार है। सरस भाषाशैली के शिल्प में ढली 'मयंक' जी की कविताओं की ताज़गी, सहजता, जीवंतता, मिठास के साथ उनकी सबसे बड़ी खूबी लयात्मकता अपने जादू से बच्चों को आकृष्ट करती है।

पुस्तक का अंतिम आलेख बालवाटिका के विशेषांकों (वर्ष 2012-2017) पर केन्द्रित है जिनमें बालसाहित्य के अनन्य-सेवी रचनाकारों के प्रदेय को निरूपित किया है जिनसे हिंदी बालसाहित्य उद्भासित है। 'बालवाटिका' बालसाहित्य को पूर्णतः समर्पित पत्रकार डॉ. भैरूंलाल गर्ग की बालविमर्श की अपने आप में अकेली एवं अनूठी मासिक पत्रिका है। इसके विशेषांक बालसाहित्य के ख्यातिनाम दिवंगत रचनाकारों के कालजयी प्रदेय को प्रकाश में लाने वाले आलोक-स्तंभ हैं।

विशेषांकों की इस श्रृंखला में मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती, डॉ. श्रीप्रसाद, सीताराम गुप्त, डॉ. कृष्णचन्द्र तिवारी 'राष्ट्रबंधु', शकुंतला सिरोठिया, आनंदप्रकाश जैन, रामानुज त्रिपाठी, मनोहर वर्मा, ठाकुर श्रीनाथ सिंह आदि बालसाहित्यकार हैं जिनके साहित्य पर केन्द्रित ये विशेषांक बालसाहित्य में चर्चित ही नहीं रहे अपितु इससे बालसाहित्य उन्नयन को भी बड़ा बल मिला है। इन विशेषांकों के माध्यम से जिन लोगों ने बालसाहित्य के लिए अपना जीवन लगा लिया उनका स्मरण ही नहीं किया गया बल्कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रकाश में लाने का अभिनव कार्य भी हुआ है। यह इस बात का प्रतीक है कि बालसाहित्य-जगत न उन्हें भूला है न उनके प्रदेय को।

प्रस्तुत पुस्तक 'बालसाहित्य की कतिपय विभूतियों की अनन्य साहित्य साधना' को कुछ अंशों तक भी यदि उद्भासित कर पाए तो मेरा श्रम सार्थक होगा और एक अपूर्व संतोष भी। बालसाहित्य की और भी अनेक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित हस्तियां हैं निश्चित ही उनका प्रदेय भी शोध और अनुसंधान की अपेक्षा रखता है। किंतु यह भी सत्य है कि समय और सामर्थ्य की सीमा हर व्यक्ति के साथ हैं। मैं चाहूंगी निकट भविष्य में और कुछ विशिष्ट बालसाहित्यकारों के रचनात्मक सहयोग को प्रकाशित कर सकूं जिन्होंने बालसाहित्य को नई भंगिमा दी। इसी आशा और विश्वास के साथ-----


डॉ. शकुन्तला कालरा (D.Litt.)
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: एन-डी-57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034 मो: 8287479455 लैंडलाइन: 011-41677475

🌼 संस्मरण विधा की शैली से परिचित कराने का श्रेय मनु जी को है।

— डॉ. शकुन्तला कालरा

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