हिंदी बाल उपन्यास का अभिनव प्रयोग — गुल्लू और एक सतरंगी
हिंदी में बाल उपन्यास का प्रारंभ लगभग सौ वर्ष पुराना है। इसके व्यवस्थित लेखन का प्रारंभ बीसवीं सदी से माना जा सकता है। स्वतंत्रता पूर्व इनकी गति धीमी ही रही। इसमें अनुवादित उपन्यास प्रकाशित हुए, बाद में मौलिक उपन्यास भी। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बाल उपन्यास यानी 1948-1960 की कालावधि संपूर्ण बाल उपन्यासों को गति दी। तत्कालीन बाल पत्रिकाओं ने— 'बालसखा', 'नंदन', 'पराग', 'किशोर' जैसी बाल पत्रिकाओं के साथ बड़ा की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और चर्चित पत्रिकाओं साप्ताहिक, 'धर्मयुग' ने भी इस विधा के विकास और उन्नयन में योगदान दिया। इसके अतिरिक्त पॉकेट बुक्स प्रकाशन ने न केवल इस विधा का प्रसार किया वरन् उन्हें बच्चों में अत्यंत लोकप्रिय भी बनाया। 1960 की कालावधि में शकुन प्रकाशन का योगदान भी इस दिशा के अंतिम चरण से 21वीं सदी के प्रारंभ के साथ ही नए-नए प्रयोगों के साथ यह विधा गतिशील होकर बालसाहित्य को सतत परिपुष्ट कर रही है। इसमें आधुनिकता भी है और पारंपरिकता भी। यही समकालीन श्रेष्ठ उपन्यासों का प्रतिरूप है और यही इसकी विशेषता भी।
आज बालसाहित्य में प्रतिमान बदले हैं। उनमें बच्चों का नया भावबोध भी अभिव्यक्त हुआ है। बच्चे अब हर वस्तु को समकालीनता के संदर्भ में, उसी अर्थबोध में देखते हैं। संभवतः यही कारण है कि बच्चों के लिए परीकथाओं की मायावी दुनिया की वर्षों सैर कराकर वत्स जी ने समकालीन संदर्भों को केंद्र में रखते हुए प्रस्तुत उपन्यास की रचना की है। इसकी भूमिका में उन्होंने स्वयं इसका स्पष्टीकरण भी किया— "साथ ही यह भी अनुभव कर रहा था कि अब आप राजकुमार या नन्हीं परी से इतर ऐसे नायक की कहानी पढ़ना चाहेंगे, जो आप जैसा सामान्य बच्चा हो। आप जैसे सामान्य परिवार से हो।"
प्रस्तुत उपन्यास बच्चों के हृदय में जड़-चेतन जगत के प्रति करुणा के संस्कार रोपकर उन्हें क्रमशः अंकुरित और पल्लवित करता है। समूचा प्राणिजगत प्रकृति का सुंदर उपहार है। पशु-पक्षी बच्चों के लिए सदा कुतूहल, स्नेह और आकर्षण का केंद्र रहे हैं। जिन लेखकों ने उन्हें केंद्र में रखकर अपनी रचनाएँ लिखी हैं उनका बच्चों के कोमल और निश्चल मन पर विशेष प्रभाव पड़ा। इस कालावधि में पौराणिक, जासूसी उपन्यासों के साथ समसामयिक वातावरण के अनुकूल साहसिक बालउपन्यास भी लिखे गए। वन्यजीवों, पशु-पक्षियों के जीवन पर आधारित उपन्यास बच्चों के आकर्षण का विशेष केंद्र बने। नवें दशक में बाल उपन्यास विधा की स्थिति क्रमशः न केवल मजबूत हुई वरन् विज्ञान-साहित्य के प्रकाशन की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रयास हुए। इसके बाद यानी अगले दो दशकों में लगभग सभी विषयों पर उपन्यास लिखे गए। आज इस विधा को पुष्ट करने में पुरानी पीढ़ी के साथ कई उदीयमान लेखक नए-नए विषयों और अभिनव प्रयोग के साथ इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक प्रवेश कर रहे हैं। बच्चे प्रकृति प्रेमी होते हैं। उन्हें अपने अंतर्जगत की झलक मिलती है। इनसे संबद्ध रचनाएँ उनके मन पर पड़ने वाले प्रभाव को तीव्र करती हैं।
बालसाहित्य-सृजन के पिछले चार दशकों से सतत सक्रिय श्रीनिवास वत्स इस क्षेत्र के उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं। वह एक ऐसे बाल एवं किशोर कथाकार हैं जिनकी सशक्त लेखनी का जादू आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारित एवं हिंदी की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के रूप में देखा जा सकता है। ढेरों बाल कहानियों के रचयिता श्री वत्स का बच्चों के लिए लिखा 'मां का स्वप्न' पहला उपन्यास है जिसे बच्चों ने बेहद पसंद किया। बच्चों की रुचि और उनके मनोविज्ञान को केंद्र में रखते हुए उन्होंने उनके लिए एक दूसरा बाल एवं किशोरोंपयोगी उपन्यास लिखा है— 'गुल्लू और एक सतरंगी' जो किसी भी भारतीय भाषा में लिखा गया प्रथम वृहद् उपन्यास है जो किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली से क्रमशः सात खंडों में प्रकाशित होगा। वृहद् उपन्यासों के क्षेत्र में किया गया यह अभिनव प्रयोग है और संभवतः पहला भी। 159 पृष्ठों के कलेवर में सिमटा यह उपन्यास का प्रथम खंड है। इसके कथानक से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत उपन्यास समसामयिक घटनाओं के साथ वैश्विक घटनाओं को भी जोड़कर चला है जिसके कारण इसका कथानक पर्याप्त रोचक बन गया है।
इस उपन्यास का प्रमुख उद्देश्य लेखक द्वारा बालनायक गुल्लू के अत्यंत मानवीय एवं कारुणिक पक्ष को उजागर करना है। उपभोक्तावादी संस्कृति में पलते-बढ़ते बच्चों में लुप्त होती संवेदना की धारा आज भी कुछ हृदयों में प्रवाहित हो रही है। लेखक का उद्देश्य इसी सुप्त मानवीय करुणा को अपने भीतर जागृत करना है। यह करुणा न केवल मानवों के प्रति, वरन् मानवेतर जगत यानी समस्त प्राणिजगत के प्रति है। पक्षी के प्रति इसी करुणा ने डाकू वाल्मीकि को महाकवि बनाया और उन्होंने 'रामायण' महाकाव्य की रचना की। मनुष्यों में यह संवेदना यदि बचपन में ही जागृत हो जाए तो बड़े होने पर वह सबके प्रति संवेदनशील बनता है। न केवल अपनों के प्रति वरन् संपूर्ण सृष्टि के प्रति उनका मन वही दर्द महसूस करता है। यही सहृदयता गुल्लू के चरित्र की प्रमुख विशेषता है जो लेखक जो उसे अग्रिम स्थान पर रेखांकित करने के लिए प्रेरित करती है। पूरे कथानक में उपन्यास का प्रमुख पात्र और बालनायक यूँ तो गुल्लू है पर उपन्यास का पूरी कथा और घटनाएं पीताम्बर जैसे पंखों तथा गरुड़ के रंग जैसी गर्दन वाले अद्भुत पक्षी सतरंगी के आसपास ही घूमती है। वह न केवल मनुष्य की भाषा समझ और बोल लेता है वरन् वैसी सोच भी रखता है।
प्रस्तुत उपन्यास में प्रकृति के सहचर रूप को भी लेखक ने अनेक प्रकरणों के माध्यम से दिखाया है। उपन्यासकार का उद्देश्य पेड़-पौधों और दुर्लभ वनस्पतियों के संरक्षण के दायित्व को समझाना है। अपनी पीढ़ी को पैतृक संपत्ति के रूप में वृक्ष-धन दे जाना हर पीढ़ी का कर्त्तव्य है। यहाँ लेखक का लक्ष्य यह बताना है कि पूरी प्रकृति हमारी मददगार है। वह हमारे लिए न केवल जीवनोपयोगी है, वरन् जीविका का स्रोत भी है। स्वयं अपने लिए ही हमें प्रकृति की रक्षा करनी है। थोड़े से व्यापारिक मुनाफे के लिए जल स्रोतों को नष्ट करते जाना किसी जघन्य अपराध से किसी भी तरह कम नहीं। प्रकृति को दुर्बल जानकर मनुष्य उसका दोहन करता है। प्रकृति हमारी पोषक है, हमारी मित्र है, शुभ-चिंतक है, हमारी रक्षक है। इसका संरक्षण हमारा परम धर्म है।
आधुनिक युग में वैज्ञानिक विकास के कारण बाल साहित्य स्वरूप परिवर्तित हुआ है। आज साहित्य युगानुरूप बालमन की अनुभूतियों के निकट आ गया है। वह बालमनोविज्ञान को प्रतिबिंबित करता है। ऐसा साहित्य ही बच्चे रस लेकर पढ़ते हैं और बार-बार पढ़ते हैं। अतः बाल साहित्यकार को इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि बच्चों को जादू-टोना या भूत-प्रेत से संबंधित साहित्य न दें क्योंकि बालमन अत्यंत कोमल और सहज विश्वासी होता है। वह ऐसा साहित्य पढ़कर डरने लगता है। कहीं भी अकेले जाने में घबराने लगता है। पर्यावरण की वैश्विक समस्या के साथ लेखन ने भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, ओझा, झाड़-फूँक आदि अंधविश्वासों के इंद्रजाल में ग्रस्त भोले ग्रामवासियों को भी वैज्ञानिक सोच प्रदान करने का प्रयास किया है।
श्रेष्ठ साहित्य हमारी अनुभूतियों को समृद्ध करता है। हमारी चित्त-वृत्तियों का परिष्कार करता है। इसकी सबसे बड़ी कसौटी है कि वह मानव में मानव के प्रति ही नहीं पशु-पक्षियों के प्रति, पेड़-पौधों के प्रति और संपूर्ण प्रकृति के प्रति संवेदना जगाने में समर्थ हो। प्रस्तुत उपन्यास का पूरा कथानक प्रकृति और उसके सहचर पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता बहाल करना है। यही लेखकीय उद्देश्य है। उपन्यास की पूरी कथा इसी संदेश के आसपास घूमती है।
'गुल्लू और एक सतरंगी' उपन्यास विधा का ऐसा अभिनव प्रयोग है जिसमें इतिहास, विज्ञान, मनोविज्ञान, आयुर्वेद का ज्ञान, पर्यावरण, हमारा समाज, हमारी संस्कृति विशेष रूप से ग्रामीण संस्कृति सब कुछ समाहित है। इसी बहुआयामी उद्देश्य को लेकर चलता इसका तदनुरूप कथानक, सहज-सरल, प्रभावशाली भाषा, अभिव्यक्ति-कौशल, कथन की भंगिमा और कथा को आगे बढ़ाती और पात्रों के चरित्र को प्रकाशित करती चुस्त संवाद योजना आदि प्रस्तुत उपन्यास की कतिपय ऐसी विशेषताएँ हैं जिनसे वह पाठकों के बीच अपनी खास जगह बनाने में सफल होगा।