प्राक्कथन: हिन्दी बालसाहित्य : विधा विवेचन
साहित्य वस्तुतः मानवीय अनुभूतियों एवं संवेदनाओं का शब्द चित्रा है। साहित्यकार अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा द्वारा इसे संस्कारित कर विषयानुसार किसी भी रूप में व्यक्त करता है। यह रूप ही विधा है। कविता, कहानी ----- अनेक नाम। अपने भिन्न-भिन्न रूपों में ये विधाएँ साहित्य में उपस्थित हैं। समय के प्रवाह में रचना और रचाव के आयाम पर भिन्नता लिए आज की अनेक विधाएँ अस्तित्व में आईं ----- नए पातर आए। और इन्हें नए-नए नामों से पुकारा गया। जन्म के साथ नाम की लोक-परंपरा के हाथ। अपने-अपने नाम और अपनी-अपनी पहचान। प्रत्येक का विधागत आकार-प्रकार भी अलग-अलग। कद-काठी-स्वभाव की रेखाएँ और रंग भिन्न-भिन्न - संवेदन के रूप, रूप की छवियाँ अलग-अलग------
रचनाकार जीवन की अनुभूतियों को नई भंगिमा दे कर साहित्य के रूप मे परिणत करता है। वही बात बाल-साहित्य के साथ भी है। अंतर इतना भर है कि बाल-साहित्य की जड़ें बचपन में हैं। बाल-साहित्यकार बालक, बाल-परिवेश एवं बाल-मनोविज्ञान को केंद्र में रखते हुए साहित्य-सृजन करता है। बाल-साहित्य का लक्ष्य बाल पाठक हैं। बाल-साहित्यकार बचपन में उतरता है और फिर उसकी अंतरंग छवियों को उसके अनुरूप अभिव्यक्ति देने के लिए सर्जनात्मक मनःस्थिति में रूपाकार (फार्मेट) की तलाश करता है और ऐसा करते हुए विचार, अनुभूति के संवेग को इच्छित विधा में ढाल देता है।
बिंदु से सिंधु तक यह नदी विस्तार की है। बालसाहित्य केवल किस्से-कहानियों तक ही सीमित नहीं है। इसकी भी लगभग वही विधाएँ हैं, जो प्रौढ़ साहित्य की हैं। जब साहित्यकार हृदय के कोमल भावों को ललित शब्दावली के साथ लयात्मक रूप में प्रस्तुत करता है तो कविता प्रस्फुटित होती है। बाल साहित्य के रूप में काव्य-विधा का विकास सबसे पहले हुआ जो शिशु काव्य, बाल काव्य और किशोर काव्य की त्रिवेणी के रूप में आकार ग्रहण करता है। जब रचनाकार बाल जीवन को उनके स्वप्न-जगत्, उनके जीवन में घटित होने वाले घटना-चक्र एवं बालमन की सूक्ष्म परतों को पात्रााओं के माध्यम से उद्घाटित करता है तो कथा साहित्य आकार धारण करता है। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी आदि विधाएँ इसी कथा साहित्य के अंतर्गत समाहित हैं। काव्य बालक के हृदय में संवेदना पैदा करता है तो कथा साहित्य में नायक के साथ बालपाठक तादात्म्य स्थापित कर उसके निकट आ जाता है। बच्चे नाटक देखकर भी प्रसन्न होते हैं। बच्चों के लिए नाटक और एकांकी अत्यंत सार्थक और उपयोगी विधाएं हैं। हिन्दी में इन दोनों विधाओं का विकास आधुनिक युग की देन है। स्वातन्त्र्योत्तर युग में बाल-पत्रिकाओं ने इन्हें प्रोत्साहन दिया। इसकी गंभीर प्रगति पिछले तीन-चार दशकों से हुई।
कथा है कथा से अलग रूप भी हैं। कुछ विधाएँ कथेतर गद्य-वर्ग के अंतर्गत आती हैं। इस वर्ग में ऐसी साहित्यिक विधाएँ आती हैं जो कथा-मुक्त होती हैं। गद्य की इन विधाओं का विकास आधुनिक युग की देन है। इन्हें पत्रिकाओं के माध्यम से मंच मिला है और वे निरंतर समृद्ध हो रही हैं। पाठक और लेखक दोनों पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हैं। कथेतर गद्यविधाओं में प्रमुख हैं- निबंध और समीक्षा। ये चिंतन-तत्त्व-प्रधान विधाएँ हैं। कुछ विधाएँ वर्णन-तत्त्व-प्रधान हैं। जैसे जीवनीपरक, जिसके अंतर्गत किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के जीवन की वास्तविक घटनाओं को स्मृति अथवा तथ्यों के आधार पर सिलसिलेवार प्रस्तुत किया जाता है। इसके अंतर्गत जीवनी, रेखाचित्रा, संस्मरण, आत्मकथा, पत्र और डायरी आदि विधाएँ समाहित की जा सकती हैं। दूसरे प्रकार की विधाएँ हैं - प्रकृतिपरक, जिसके अंतर्गत यात्राा-वृत्तांत को रखा जा सकता है। क्योंकि ये स्थान विशेष के प्राकृतिक सौंदर्य को अधिक उभारती हैं। यह स्वजीवन से जुड़ा होता है। इसमें लेखक की सूक्ष्म निरीक्षण-दृष्टि और मौलिक चिंतन एवं निजी अनुभूतियों का वर्णन रहता है। साक्षात्कार-परक अर्थात् भेंटवार्ता जिसमें भेंटकर्ता पाठक और उस व्यक्ति विशेष के प्रति सेतु का काम करता है, जिनका साक्षात्कार लिया जा रहा है। बालसाहित्य में यह विधा भी आधुनिक युग की ही देन है। पत्र-पत्रिकाओं में बाल साहित्यकार के साक्षात्कार यत्रा-तत्रा प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में भी यह प्रयास "हिन्दी बाल साहित्य विमर्श" (डॉ॰ शकुन्तला कालरा) के रूप में हो चुका है।
पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के संपादकीय को भी कथेतर गद्य-विधा का ही अंग कहा जाएगा। इसमें स्वयं संपादक द्वारा लिखी हुई सामग्री रहती है जिसमें उसके विचार, दृष्टिकोण और स्थापनाएँ निहित रहती हैं। हर साहित्यिक पत्रिका में साहित्यिक विषय को लेकर लिखी गई 'संपादकीय टिप्पणी' और पुस्तकों की 'भूमिकाएँ' अथवा 'दो शब्द' इसी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। नंदन, बालभारती बालवाणी, बालवाटिका, बाल प्रहरी, देवपुत्रा, बाल साहित्य-समीक्षा आदि के संपादकीय बालक और बाल साहित्य के सरोकारों से जुड़े होते हैं।
परिचर्चा भी कथेतर गद्य-विधा का एक रूप है जिसमें दो या दो से अधिक लोगों के बीच सम्बद्ध विषय पर खुली चर्चा होती है। टी॰वी॰ अथवा रेडियो पर विभिन्न परिचर्चाएँ प्रसारित होती हैं। पत्र-पत्रिकाओं में अनेक लोगों के बीच किसी विषय पर संवाद होता है। हिन्दी बाल साहित्य की संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों में बाल साहित्य के सर्जsidebarात्मक पक्ष और स्थितियों को लेकर खुली चर्चा होती है। इस दिशा में आजकल, भाषा, देवपुत्रा, बालवाटिका, बालप्रहरी के प्रयास स्तुत्य हैं।
मौलिक साहित्य की उपर्युक्त विधाओं के समान अनुवाद के माध्यम से भी पर्याप्त बालसाहित्य प्रकाशित हुआ है। अनुवाद किसी भी विधा का हो सकता है। यह गद्य और पद्य, कथा और कथेतर साहित्य का समन्वित रूप है। एक भाषा में प्राप्त सामग्री का दूसरी भाषा में रूपांतरण अनुवाद कहलाता है। इसका कोषगत अर्थ है - 'प्राप्तस्य पुनः कथने' अर्थात् पहले कहे गए को फिर से कहना। अनुवाद एक भाषा-भाषी को दूसरे भाषा-भाषी से मिलाने का सेतु है। इसका महत्त्व राष्ट्रीय स्तर पर जितना है उतना ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी है। अनुवाद के माध्यम से एक देश दूसरे देश से संप्रेषण स्थापित कर वैश्विक एकता के सूत्र में बंध जाता है।
कोई भी विधा रचनाकार के चिंतन और साधना के संस्पर्श से ऊर्जावान बनती हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक कृति किसी एक विधा या साहित्यिक वर्ग में नहीं रखी जा सकती क्योंकि कुछ विधाओं का परस्पर एक-दूसरे में अंतरण हो जाता है। हर विधा के अपने कुछ विशेष गुण होते हैं जो आचार्यों द्वारा निर्धारित होते हैं। विधाओं का एक तैयार सांचा लेखक को मिलता है, किंतु वह उसे प्रयोगशीलता की राह पर चलकर उसमें कुछ नया जोड़ता हुआ एक नया आयाम भी देता है। समय के साथ साहित्य में निरंतर परिवर्तन घटित हो रहे हैं। लेखक उनसे प्रभावित होता है। उसका परिष्कार करता है उसमें कुछ परिवर्त्तन कर लेता है। कुछ नया ले आता है। साथ ही इस बात का भी सतत् ध्यान रखता है कि किसी भी विधा की परंपरागत पहचान में कोई अवरोध न आए। वह सजगता के साथ एक संतुलन बनाकर चलता है।
साहित्य में विधाओं की अवधारणाएँ परिवर्तित होती रहती हैं। साहित्य की विधाओं का यह वर्गीकरण अंतिम नहीं है। साहित्य निरंतर विकासशील है और विधाएँ भी उसी के अनुरूप गत्यात्मक हैं। देशकालानुसार उनमें परिवर्तन हो जाता है। नई-नई विधाएँ जन्म लेती हैं और अपनी पहचान बनाती हैं। इस तरह विधा-यात्रा प्रवहमान रहती हैं।
कहानी और कविता इन दोनों विधाओं में हिन्दी बाल साहित्य - लेखन की समृद्ध परम्परा भी है और लीक से हटकर नई विषय-वस्तु की ताजगी एवं नई शैली भी है। कुछ विधाएँ आधुनिक युग की देन हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से हिन्दी साहित्य ने आधुनिक युग में पदार्पण किया और उसी के साथ निबंध, नाटक, कहानी आदि विधाओं ने कविता के समानांतर प्रतिष्ठा प्राप्त की। बीसवीं शताब्दी में न केवल इन गद्य-विधाओं के स्वरूप में विविधता आई वरन् अनेक नवीन गद्य-विधाओं का जन्म और विकास हुआ। हिन्दी बाल साहित्य, विषय के अनुसार विविध रूपों में ढलता रहा। सर्वेक्षण हमें आश्वस्त करता है कि बाल साहित्य की समस्त विधाओं में बहुमुखी प्रगति हो रही है। सृजन एवं शोध-समीक्षा क्षेत्र में संलग्न एक से बढ़कर एक सशक्त हस्ताक्षर साहित्य के भंडार को भरने में तत्परता से सन्नद्ध है। बाल साहित्य की सभी विधाओं पर पृथक्-पृथक् रूप से तो काम हुआ है जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होता रहा है किन्तु किसी एक ही पुस्तक में सभी विधाओं का विवेचन - विश्लेषण मुझे दिखाई नहीं दिया। कॉलेज और विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन एवं शोधकार्य करवाते समय यह अभाव जो मुझे सदा मथता रहा कि बड़ों के साहित्य की विधाओं पर तो विविध कोणों से खूब काम हुआ है, किन्तु बाल साहित्य की विधाओं पर विस्तार से कार्य करना अभी शेष है। यह कार्य मैंने आरंभ किया भी, किन्तु अकेले करने में मुझे लंबा समय लगता। कुछ विधाओं पर मैंने कार्य किया लेकिन शीघ्र ही मुझे अनुभव हुआ कि यदि इस कार्य को समग्रता में करना है तो विषय के विशेषज्ञों से सहयोग लेना होगा। उसके बिना इसे पूर्ण करना संभव नहीं होगा। इस कार्य के माध्यम से मेरा लक्ष्य हिन्दी बाल साहित्य की विविध विधाओं में रूपांतरित बाल साहित्य को उसकी समग्रता, जटिलता और बहुलता में उद्भासित करते हुए बाल साहित्य की दशा और दिशा के प्रति चिंताओं और उत्सुकताओं एवं जिज्ञासाओं को रेखांकित करना है।
यह सारा आकाश इसे मुट्ठी में कैसे भर लूँ----- मैं जानती हूँ कि बाल साहित्य की गंभीरता को, उसकी गहराई को और अनंतता को कुछ आलेखों में बांधा नहीं जा सकता, फिर भी एक प्रयास तो किया ही जा सकता है उसके नजदीक पहुँचने का। बस यही सोचकर मैंने बालसाहित्य की प्रमुख विधाओं और कुछ नवीन विधाओं के स्वरूप और उनकी विकास-यात्रा-विषयक विभिन्न विद्वानों के आलेखों को एक पुस्तक के रूप में संपादित करने की इच्छा को कार्यान्वित करने की योजना बनाई। बालसाहित्य-सृजन, शोध एवं आलोचना में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले विद्वानों से संपर्क स्थापित किया और बाल साहित्य की विभिन्न पत्रिकाओं में इसकी विज्ञप्ति दी। तदनन्तर दूरभाष, पत्र-व्यवहार और मुलाकात द्वारा संवाद बना। विचार-विनिमय हुआ। उन्हें अपनी योजना से अवगत कराया। उनमें से कुछ ने तो अपनी स्वीकृति तत्काल दे दी, किन्तु कुछ विद्वानों ने अपनी-अपनी व्यस्तताओं का हवाला दिया। बात भी सही थी, जो जितना बड़ा लेखक है वह उतना व्यस्त भी है। कार्य शुरू हो गया। मेरे पास आलेख आने लगे। धीरे-धीरे मेरे आग्रह को सबने स्वीकार कर लिया। डॉ॰ हरिकृष्ण देवसरे के बालसाहित्य के क्षेत्र में अप्रतिम अवदान से बालसाहित्य-जगत् भली-भांति अवगत है। बालसाहित्य की विभिन्न गोष्ठियों में मुलाकात होती रही एक जिज्ञासु श्रोता के रूप में मैंने उन्हें अनेक बार मंच से सुना। उन्होंने अपनी नवीन और वैज्ञानिक सोच से मुझे सदा प्रभावित किया। बाल साहित्य सृजन, आलोचना एवं अनुसंधान में उनकी एक विशिष्ट पहचान है। बाल भवन की एक संगोष्ठी में लंच के समय उनसे जब इस योजना पर बातचीत हुई तो बड़ी उदारता पूर्वक अपने दो आलेख देने की स्वीकृति दी। मैं बड़ी कृतज्ञता से भर उठी। मैंने उनसे पूछा कि क्या वह इन आलेखों में कुछ परिवर्तन या परिवर्धन करना चाहेंगे तो उन्होंने कहा कि सभी आलेख पूर्ण हैं। निश्चय ही उनके इस बहुमूल्य अवदान से बालसाहित्य के पाठक एवं शोधार्थी लाभान्वित होंगे।
डॉ॰ श्री प्रसाद का मैं आदरपूर्वक स्मरण करती हूँ जिनके अमूल्य सुझावों ने मेरा समय-समय पर मार्गदर्शन किया। पुस्तक के नामकरण का श्रेय उन्हीं को जाता है। एक दिन फोन पर पुस्तक के शीर्षक को लेकर उनसे लंबी बातचीत हुई। मैंने कुछ शीर्षक जो सोच रखे थे उन्हें बताए किन्तु उनसे वे संतुष्ट नहीं हुए। उन्हीं शीर्षकों को संशोधित करते हुए अत्यंत स्पष्ट और आकार में लघुशीर्षक देकर उन्होंने इस पुस्तक के लिए अपने योगदान को मेरे लिए अविस्मरणीय बना दिया। 'हिन्दी बाल-साहित्य : विधा-विवेचन' शीर्षक उन्हीं की देन है। उनकी इस आत्मीयता और स्नेह को यहाँ मैं विशेष रूप से रेखांकित करना चाहूँगी। स्मृति शेष डॉ॰ श्री प्रसाद जी को मैं अपने हृदय के श्रद्धा-सुमन अर्पित करती हूँ।
वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्रद्धेय डॉ॰ श्री कृष्णचन्द्र तिवारी 'राष्ट्रबंधु' जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को मैं विशेष रूप से नमन करती हूँ, जिनका स्नेहाशीष एवं मार्गदर्शन सदा मेरा पाथेय रहा है।
डॉ॰ प्रकाश मनु की साफ-स्पष्ट और सुलझी हुई दृष्टि ने मुझे सदैव प्रभावित किया है। उन्होंने किसी भी विधा में अपने आलेख दे देने की न केवल उदारता दिखाई वरन् हर कार्य में हमेशा उत्साह-वर्धन भी किया। उनका यह अवदान बालसाहित्य की अमूल्य निधि सिद्ध होगा। उनके प्रति मैं सदा अनुगृहीत रहूँगी।
बालसाहित्य के प्रति पूर्णतः समर्पित खोजी प्रवृत्ति के धनी कृष्ण शलभ जी से पुस्तक की रूपरेखा से निष्पादन तक निरंतर विचार-विमर्श होता रहा। साथ ही बाल साहित्य के समर्थ लेखक एवं कवि रमेश तैलंग जी से भी पुस्तक के स्वरूप पर विस्तृत चर्चा हुई। इन दोनों के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ।
मेरे आग्रह एवं अनुरोध पर इस पुस्तक से जुड़े अपने-अपने विषय के पारखी विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञ विद्वान लेखक हैं - देवेन्द्र कुमार 'देवेश', डॉ॰ प्रकाश मनु, कृष्ण शलभ, निरंकार देव सेवक, डॉ॰ रोहितश्व अस्थाना, सूर्यकुमार पाण्डेय, डॉ॰ अनिल कुमार, डॉ॰ राष्ट्र बंधु, डॉ॰ हून्दराज बलवाणी, डॉ॰ विजय राव राघव, डॉ॰ ऊषा यादव, डॉ॰ राजकिशोर सिंह, डॉ॰ अनिल शर्मा, डॉ॰ माया जाधव, श्री रमेश तैलंग, श्री भालचन्द्र सेतिया, डॉ॰ नागेश पाण्डेय 'संजय', डॉ॰ हरिकृष्ण देवसरे, डॉ॰ चक्रधर 'नलिन', डॉ॰ विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद', डॉ॰ सुरेन्द्र विक्रम, डॉ॰ श्रीप्रसाद, डॉ॰ दिविक रमेश, डॉ॰ कामना सिंह आदि। आलेखों का अनुक्रम विद्वानों की वरिष्ठता या श्रेष्ठता-क्रम में बिल्कुल नहीं है। यहाँ विधा की प्रमुखता के क्रम से उन्हें रखा गया है। इन सभी सहयोगी लेखकों का धन्यवाद करती हूँ। मुझे प्रसन्नता है कि अपनी-अपनी व्यस्तताओं के बावजूद इन बालसाहित्यकारों, विद्वान लेखकों, अनुसंधानकर्ताओं ने अत्यंत गंभीरता, तल्लीनता से लिखकर अपना रचनात्मक सहयोग दिया। उन सभी के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापित करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। हाँ, यह बात मैं अवश्य स्वपीकार (स्वीकार) करना चाहूँगी कि संपादन का कार्य लेखन से अधिक कठिन और अपेक्षाकृत अधिक श्रम एवं समय साध्य होता है। साथ ही आपके सृजन को भी प्रभावित करता है। संपादक को अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हस्तलिखित आलेखों को टंकित करते समय टंकणकर्ता को अलग-अलग लेखकों के हस्तलेख से परिचित होने और समझने में दिक्कत आती है। इसलिए बार-बार मुझे कई प्रूफ देखने पड़े। जिसमें मेरा और प्रकाशक दोनों का कहीं-कहीं धैर्य घुटने (छूटने) लगता, अगर टंकित आलेख आए तो फॉन्ट की समस्या खड़ी हो गई। इस वजह से भी प्रूफ बार-बार देखने पड़े। मेरी समस्या यह है कि मैं अपनी हर पुस्तक के सारे प्रूफ स्वयं देखती हूँ। पिछले लंबे समय से मेरी सारी रचनात्मक ऊर्जा इसी पुस्तक के संपादन कार्य में खपती रही और इस बीच कोई भी महत्त्वपूर्ण सृजन नहीं हो पाया संभवतः यही कारण है कि लेखक 'संपादन' कार्य से बचते हैं। दीर्घ अवधि की प्रतीक्षा के बाद यह कार्य संपन्न हो पाया है। फिर भी यदि यह कहूँ कि इस पुस्तक के आकार ग्रहण करने और इसे पूर्णता प्रदान करने का श्रेय इन्हीं विद्वानों को है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक प्रकार से उन्हीं के परिश्रम, विद्वता और विचारशीलता का फल है यह।
यहाँ मैं यह बताना ज़रूरी समझती हूँ कि पुस्तक में संपादित आलेखों में लेखकों के अपने विचार हैं, उनसे संपादक अथवा प्रकाशक का सहमत होना आवश्यक नहीं है।
यह ग्रंथ हिन्दी बालसाहित्य की समृद्धि में सहायक हो। रचनाकारों, शोधकर्ताओं और जिज्ञासु पाठकों को चिंतन के लिए प्रेरित करे तो यह श्रम सार्थक होगा। इस प्रयास में मैं कहां तक सफल रही हूँ, इसका निर्णय प्रबुद्ध पाठक स्वयं करेंगे।
अंत में मैं श्री नितिन गर्ग जी का विशेष रूप से धन्यवाद करना चाहूँगी, जिन्होंने इसे यथाशीघ्र अत्यंत सुंदर ढंग से पुस्तक रूप में पाठकों को सुलभ करा कर बालसाहित्य को नव-वर्ष का उपयोगी उपहार दिया।
पाठकों की प्रतिक्रियाओं और बालसाहित्य की प्रगति के लिए उनके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।
इसी कामना के साथ शकुन्तला कालरा
— यह प्राक्कथन ‘हिन्दी बाल-साहित्य : विधा-विवेचन’ के लिए लिखा गया था।