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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

भूमिका: यादों की मंजूषा · आत्मकथा

भूमिका: मेरा बचपन - उड़ान की चाह में

बचपन के संस्मरण और साहित्यिक यात्रा का आरंभ

भूमिका क्यों बनी आत्मकथा

बचपन की सरल, सुंदर और अविस्मरणीय छवियां

बरसों पहले शकुंतलाजी का एक संस्मरण पढ़ा था। याद पड़ता है, उत्साही युवा लेखक रमाशंकर ने बाल संस्मरणों की एक पुस्तक संपादित की थी। उसमें और भी बहुत से बाल साहित्यकारों के संस्मरण थे, मन को छूने वाले। पर शकुंतलाजी ने मां को लेकर इतना मार्मिक संस्मरण लिखा था कि पढ़ते हुए मेरी बहुत अजीब हालत हो गई। मैं पढ़ता जाता और रोता जाता। पढ़ता जाता और लगातार टप-टप आंसू बहते जाते। खासकर संस्मरण का आखिरी हिस्सा तो, जिसमें मां की मृत्यु का वर्णन है, पढ़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया। बार-बार आंसू मेरे और किताब के बीच एक धुंधली दीवार बनकर आ जाते और सब कुछ ओट हो जाता।

इससे पहले भी शकुंतला कालरा की बच्चों के लिए लिखी गई बहुत रचनाएं पढ़ी थीं, कविताएं भी, कहानियां भी। पर किसी का मेरे मन पर वह प्रभाव नहीं पड़ा था, जैसा मां पर लिखे गए उनके बहुत-बहुत मर्मस्पर्शी और भावपूर्ण संस्मरण का, जिसे पढ़ते हुए शब्द-शब्द जैसे मेरे भीतर उतरता चला गया। पढ़कर लगा, जैसे मैं उनकी मां से मिल रहा होऊं। उस मां से जो उनकी ही नहीं, मेरी भी मां हैं। हम सबकी मां हैं। एक ऐसी मां, जो घर के बुरे से बुरे और हिम्मत तोड़ देने वाले हालात में भी अपनी जिजीविषा और आत्मशक्ति बचाए रखती है। उम्मीद की टिमटिमाती लौ के सहारे, आंखों में बच्चों की बेहतरी का सपना लिए, वह उनकी बुनियाद पक्की करने में जुटी है।

मां की सारी उम्मीदों का केंद्र इस समय छोटी बच्ची कुमार यानी शकुंतला की पढ़ाई-लिखाई है, जो कि तीनों बहनों में सबसे बड़ी है। हालांकि वह खुद भी तो इस समय कुल पांच बरस की है और नटखट भी कम नहीं है। मां कमजोर है, तन और मन दोनों से कमजोर। पर आशा की एक कांपती डोर उसके मन में है कि यह शकुंतला नाम की बच्ची पढ़ ले तो आगे चलकर शायद अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, घर-परिवार और माता-पिता का नाम ऊंचा करे। वह मानो अपने आप से कहती, तीनों बहनों में कुमार सबसे बड़ी है, पर मुझे इसे बेटी नहीं, बेटा बनाकर पढ़ाना है। मैं इसे इतना पढ़ाऊंगी कि घर में कोई बेटा भी इसके बराबर पढ़ा-लिखा न हो! मां बहुत कमजोर है, बीमार है और हर घड़ी क्षीण रही है। पर हारी नहीं है। वह सोचती है, बच्ची पढ़ ले तो शायद इस घर की तकदीर बदल जाए! बच्ची पढ़ ले तो शायद आज की हारी हुई लड़ाइयां कल जीत ली जाएं! शायद! शायद!

मां की सारी उम्मीद उस बच्ची पर टिकी है और बच्ची है कि उसे बस पढ़ना ही पसंद नहीं है। पढ़ने के अलावा सारी चीजें उसे अच्छी लगती हैं। खूब सारी बातें करना और सुनना उसे पसंद है। नई-नई कहानियां सुनना उसे पसंद है और अपने आसपास की चीजों को खुली आंखों से देखना, उनसे परिचित होना और उनके बारे में बहुत कुछ जानना उसे पसंद है। पर अगर उसे कोई चीज अच्छी नहीं लगती, तो बस पढ़ाई। और पढ़ाई से दूर भागने के वह छुटके ऐसे-ऐसे कमाल के तरीके खोज लेती है कि कहा ही क्या जाए!

उसकी इन सारी शैतानियों का उसकी थकी, नन्हे-दुबले काया वाली मां पर क्या असर पड़ रहा होगा, वह अभी नहीं समझ पा रही। शायद समझने की हालत में ही नहीं है। पर जब मां पढ़ा रही हो तो तरह-तरह की बातों और बहानों में उलझाकर और नई-नई जिदें ठानकर उसे हैरान कर देना बच्ची को अपनी सबसे बड़ी सफलता लगती है।

रोज-रोज मां का उसे पढ़ाने के लिए अपने पास बैठाना और उस जिद्दी, अड़ियल बच्ची का नए-नए तरीकों से उसे तंग करना, और कभी-कभी तो गुस्से में आकर कायदा ही फाड़ देना, यह सब देखकर घर में परदादी समेत बहुतों को लगने लगता है कि पढ़ना इस बच्ची के बस की बात नहीं है। कहीं ऊसर में भी लहलहाती खेती होती है! भला ऐसा सपना देखने से फायदा! पर मां तो मां है, वह अपनी उम्मीदों के बिरवे को भला कैसे मुरझाने दे सकती है!

निरंतर काम-काम और काम। साथ ही हर घड़ी घर-परिवार की चिंताएं। इस सबने मिलकर मां की सेहत को जैसे लील लिया है। मां बुरी तरह क्षीण रही है। अक्सर शरीर बुखार से तपता है और वह चारपाई पकड़ लेती है। तीसरी बेटी के जन्म के बाद तो उसका तन और मन दोनों ही थक चुके हैं। तो भी मन में चिंताओं का चक्र नहीं थमता। एक बड़े घर की जिम्मेदारियां उसके सिर पर हैं। घर की माली हालत सुधारने के लिए वह कभी बटन टांकना तो कभी लिफाफे बनाने जैसा काम। और भी बहुत सारे काम, जिनमें दिन भर लगे रहो तो शाम को बस चार पैसे हाथ में आते हैं।

बहुत मेहनत। बीमारियों से एकदम जर्जर हो चुका थका हुआ शरीर। पति का घर से दूर रहना और महीने-दो महीने में बस दो-एक दिन के लिए घर आ पाना। ऐसे में सुख तो केवल भविष्य की उम्मीदों पर टिक गया है। लिहाज़ा बच्चे ठीक से पल जाएं, पढ़-लिख जाएं, बस यही उस स्त्री की आशाओं का केंद्र है।

पर यह बात वह अपनी पांच बरस की नन्ही बेटी को कैसे समझाए! यही बच्ची, जिसका घर का नाम कुमार और स्कूल का नाम शकुंतला है, उसकी बड़ी बेटी है। इससे छोटी दो बेटियां और हैं, इनमें एक नवजात है, दूसरी एकदम अबोध, अल्हड़। इनमें जो बड़ी है और पढ़ सकती है, वह भी तो नहीं पढ़ती। मां इस बात से बहुत दुखी और व्यथित है। पर फिर भी उसने अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी है। वह फिर उसी धैर्य से उसे पढ़ाना शुरू करती है। पर बच्ची की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं है। इसकी बजाए वह कहानियां सुनना चाहती है। गुस्से में आकर वह बार-बार कायदा फाड़ देती है। तेरहवीं बार उसने फिर कायदा फाड़ दिया। मां उसे पकड़ने दौड़ती है तो इस आपाधापी में जमीन पर रखी छोटी बच्ची की दूध की बोतल टूट जाती है। टूटे हुए कांच की किरचें मां के पैरों में चुभ गई हैं, हाथों में भी और धारोधार खून बहने लगता है। जमीन पर बिखरे दूध के साथ ही मां की आंखों से बहते आंसू और ये लहू के कतरे भी आपस में घुल-मिल जाते हैं। मां दुखी और स्तब्ध सी लहूलुहान खड़ी है और समझ नहीं पा रही कि वह करे तो क्या करे! लगता है, पहली बार उसकी आशा की कांपती डोर बुझने लगी है। वह बुरी तरह दुखी और निराश है।

बच्ची का दिल कांप उठता है। वह जिद भले ही कितनी ही करती हो, पर बच्ची मां को बेतहाशा प्यार भी तो करती है। मां अब पस्त सी चारपाई पर पड़ी है। पर फिर भी बच्ची पर उसे जरा भी गुस्सा नहीं आता। एक बार भी उसने बच्ची को डांटा नहीं।

बच्ची के मन में हाहाकार मच जाता है। उफ़, उसकी वजह से आज मां की यह हालत हुई! उसका दिल रोता है। वह मां को आश्वस्त करना चाहती है कि मां मां, अब मैं पढ़ूंगी, मैं पढ़ूंगी मां! मां, अब मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं करूंगी।

नन्ही बच्ची चाहती है, कि वह मां को यह आश्वासन देकर खुश कर ले। पर दीए में तेल अब चुकना ही चाहता है। बच्ची मां की चुकती हुई डोर को जैसे थाम लेना चाहती है। उसे पता है, मां मेरे पढ़ने से खुश होती है। लिहाज़ा वह कायदा खोलकर मां के आगे बैठ जाती है और बताती है, मां मैंने सारे वर्ण याद कर लिए। मां, मैंने संयुक्त अक्षर भी याद कर लिए। मां, मैंने पूरा पाठ याद कर लिया। मां मां मां!!

मां के होंठों पर फीकी मुस्कान है, जैसे दूर से ही वह बेटी को पुचकार रही हो। वह उसे खूब लाड़ करती है, टॉफी के लिए पैसे देती है और फिर एकाएक वह चली जाती है। दूर, बहुत दूर! पल भर में बच्ची का पूरा संसार अंधेरा हो जाता है। उस मातृविहीन बच्ची के लिए अब दुनिया काली सिर्फ काली है। आंसुओं और उदासियों से भरी हुई। उसका हृदय रोता है, पछाड़ें खाता है।

बच्ची को नहीं पता कि मृत्यु क्या होती है। पर बच्ची मां को जानती है। वह पूरे घर में पुकार मचाती है, मां कहां हैं? मां नजर नहीं आ रही! वह बीमार पड़ जाती है और बुखार में बुरी तरह बड़बड़ाने लगती है, मां, मैंने पाठ याद कर लिया है! मां, मैं अब पढ़ूंगी, खूब पढ़ूंगी मां! अब मैं कभी कायदा नहीं फाड़ूंगी और तुम्हें कभी परेशान नहीं करूंगी। हमेशा तुम्हारा कहना मानूंगी मां!!

पर मां अब नहीं है, कहीं नहीं है। हां, पर जिस दुनिया में भी अब वह हो, यह देखकर जरूर खुश हो रही होगी कि उसकी बेटी अब समझदार हो गई है। वह अब बड़ी लगन और मेहनत से अपना पाठ याद करती है। मां शायद इस बात से भी खुश होगी कि पढ़ाई की जो एक छोटी सी लकीर कमजोर हाथों से उसने बच्चे के मन में उकेरी थी, वह लकीर अब लंबी होती जा रही है और जिन वर्णों को बड़ी मेहनत से उसने सिखाया था, वे अब बेटी के पूरे जीवन को आलोकित कर रहे हैं।

मैंने शकुंतला जी का यह संस्मरण पढ़ा तो इस कदर विचलित हुआ कि तत्काल उन्हें फोन लगाया। पर उनका फोन लग ही नहीं रहा था। थोड़ी देर बाद फिर मैंने कोशिश की। पर इस बार भी नहीं लगा तो थोड़ी-थोड़ी देर बाद फिर मैंने दर्जनों बार फोन लगाया। समझ में नहीं आ रहा था कि यह कैसा आंधड़ है मेरे भीतर, जो मुझे चैन नहीं लेने देता। बस, मैं उन्हें बता देना चाहता था कि उनका यह अविस्मरणीय संस्मरण मैंने पढ़ लिया है। और यह इतना सच्चा, इतना मार्मिक और भावपूर्ण है कि जब तक मैं खुद उन्हें यह बात बताऊंगा नहीं, मेरे दिल पर पड़ा बोझ कम नहीं होगा।

काफी देर बाद शकुंतला जी का फोन आया। उन्होंने बताया कि वे हरिद्वार आई हुई हैं और फोन उन्होंने साइलेंट मोड में किया हुआ था। बाद में मेरे कई मिस्डकॉल्स उन्होंने देखे। मैंने उनसे कहा, "शकुंतला जी, आपने रुला दिया। आपने एक ऐसी चीज लिखी है जिसे जीवन भर भूल पाना मेरे लिए कठिन है। मैं जितनी देर पढ़ता रहा, टप-टप आंसू बहते रहे। मां के बारे में आपका यह बचपन का संस्मरण इतने सच्चे मन और अंतःकरण से लिखा गया है कि उसे पढ़कर संवेदनशील मनुष्य तो क्या, कोई पत्थर दिल भी रोने लगेगा। सचमुच यह आंसुओं से आत्मा को निमज्जित करने वाली कृति है।"

उसके बाद भी उनके इस संस्मरण को लेकर कई बार उनसे चर्चा हुई। मैंने आग्रह किया वे अपने बचपन की पूरी कहानी लिखें। इसलिए कि यह कहानी सिर्फ उनकी नहीं, पूरे समय की कहानी होगी। सुनकर उन्हें भी अच्छा लगा।

नवंबर 2012 में 'साहित्य अमृत' के बाल साहित्य विशेषांक की योजना बनी तो मैंने शकुंतला जी से आग्रह किया कि वे अपने बचपन का ही कोई और संस्मरण लिखकर दें। मेरे आग्रह की रक्षा करते हुए, उन्होंने विस्थापन के दर्द से जुड़े अपने अभावग्रस्त बचपन का एक और मार्मिक संस्मरण लिख भेजा। इसमें मां के अलावा उनके पिता, दादा-दादी और बुआ के भी बड़े उज्ज्वल चरित्र थे। साथ ही विभाजन के बाद विस्थापन का हर घड़ी झिंझोड़ता वह दर्द, जिसे वही व्यक्ति समझ सकता है जिसे अपना घर-परिवार छोड़कर बेघर हो जाना पड़ा हो। पग-पग पर विस्थापितों के हिस्से आया दुख और अपमान चुप-चुप पीते हुए कैसे वे कल का सपना बुनते हैं, यह जानना दुख के एक पूरे महाभारत को जानना है। जो लोग अपनी बसी हुई गृहस्थी और सुखी घर-परिवार छोड़कर लहूलुहान शरीर, आंसू और मुरझाया मन लेकर यहां पहुंचे, उन्हें पिछला सब कुछ भूलकर एक नई कहानी लिखनी थी। ऐसी कहानी, जिसमें थिगलियों वाले कपड़े पहनकर गुजारा करना था। अखबारी कागज के लिफाफे बनाकर बच्चों के दूध और नाश्ते का इंतजाम करना था और बात, बिना बात अपमान झेलने थे।

कहना न होगा, 'साहित्य अमृत' में छपे शकुंतला जी के इस संस्मरण को पाठकों ने बेहद सराहा। उसके बाद तो जब-जब फोन पर उनसे बात होती, मेरा एक ही आग्रह होता, "शकुंतला जी, आप अपने बचपन के बारे में विस्तार से लिख डालिए।"

शकुंतला जी योजनाधर्मी हैं और बहुत सारे काम उनके हाथ में हमेशा रहते हैं। इनमें एक काम बाल साहित्यकारों के इंटरव्यू का तो ऐसा है, जिसके लिए उन्हें बार-बार साधुवाद देने का मन होता है। पर मेरा कहना था, "फ्योक आप सब कुछ छोड़िए और अपने बचपन के बारे में लिखिए। मुझे लगता है, आपके लेखन का वह सर्वश्रेष्ठ होगा।"

शकुंतला जी ने गंभीरता से इस बात को लिया और फिर एक दिन उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने बचपन के बारे में लिखना शुरू कर दिया है। और एक बार शुरू किया तो उनकी कलम रुकी नहीं। एक अच्छी बात यह थी कि जैसे-जैसे वे लिखती गईं, आगे की चीजें उन्हें याद आती गईं। बहुत कुछ लिखा गया, और उसमें लगातार सुधार भी वे करती रहीं। बीच-बीच में उस दौर की बहुत सारी चीजें भी जुड़ती जातीं, जिनका शुरू में उन्हें स्मरण नहीं रहा था। अपने लेखन की प्रगति के बारे में बतातीं तो मुझे अच्छा लगता था। हालांकि विधा को लेकर उनके मन में संशय था कि इन स्मृतियों को वे संस्मरण कहें, आत्मकथा या कि उपन्यास! शायद इसलिए कि जो कुछ लिखा गया, उसमें कमोबेश इसमें तीनों की ही उपस्थिति थी। वे इस संबंध में मेरी राय जानना चाहती थीं।

बाद में पढ़कर मुझे लगा कि यह तो पूरी तरह आत्मकथा ही है, हालांकि इसमें आउपन्यासिक गुण भी कम नहीं है। मैंने उनसे कहा, "शकुंतला जी, मुझे तो लग रहा है, 'मेरा बचपन' आपकी आत्मकथा का पहला खंड है। आप चाहें तो आत्मकथा का अगला खंड भी लिखें। इसे पढ़ने के बाद आत्मकथा के अगले खंड को पढ़ने की उत्सुकता भी बहुत से पाठकों को होगी।"

शकुंतला जी को यह बात पसंद आई। हालांकि अपने लिखे को अभी वे और सुधारना चाहती थीं। कुछ और चीजें भी जोड़ना चाहती थीं। उनका आग्रह था कि यह पुस्तक रूप में आए तो कुछ शब्द मैं भी लिखूं, फ्लैप या फिर भूमिका के रूप में। मैंने कहा, "ठीक है, आप इसे पूरा करके प्रिंट भेजेंगी तो कुछ शब्द मैं भी लिख दूंगा। वैसे तो मैं भूमिकाएं लिखने से बचता हूं, पर आपकी किताब के बारे में कुछ सतरें लिखना मुझे अच्छा लगेगा। जो कि शायद मेरा लिखा भूमिका सरीखा न हो।"

शकुंतला जी ने कहा, "मनु जी, यह तो आपने बिल्कुल मेरे मन की बात कह दी। मैं जल्दी ही इसे पूरा करूंगी और आपके पास भेजूं!"

शकुंतला जी ने फिर से सुधारा। कुछ सुझाव मेरे थे उनके अनुसार कुछ बदलाव किए। और उसके बाद जब अंतिम प्रारूप मेरे पास आया तो लगा, उनसे अपने बचपन की कहानी लिख डालने का मेरा आग्रह निरर्थक न था। वे बहुत बार कहती हैं कि "मनु जी, आपके कारण ही यह लिखा गया।" पर मेरा कहना था कि अगर वे इसे न लिखतीं तो एक सुंदर मर्मस्पर्शी कृति से हम सभी वंचित रह जाते।

शकुंतला जी ने मां की अविस्मरणीय छवियां इस कृति में उकेर दी हैं, पर साथ ही पिता, दादा-दादी, बुआ के भी इतनी आत्मीयता से छल-छल करते चरित्र इसमें उभरे हैं कि मन भावमुग्ध हो जाता है। इससे पता चलता है कि पुराने संयुक्त परिवारों में लोगों को एक-दूसरे का कितना सहारा था और इस सहयात्रा में कितने सुख-दुख मिलकर बांट लिए जाते थे।

एक अच्छी बात यह है शकुंतला जी के भीतर गहरा कृतज्ञता-बोध है। जीवन में किसी से कुछ भी अच्छा ग्रहण किया, या किसी ने थोड़ी भी मदद की, तो वे उसके प्रति खुले हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करके ही सुख पाती हैं। इसी तरह जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के लोग मिलते हैं। पर अपनी आत्मकथा में उन्होंने फोकस उन्हीं पर किया, जो अच्छे हैं और जिन्हें याद करते पर मन स्वतः आलोकित सा होता है, भीतर आस्था की डोर मजबूत होती है।

पुस्तक के सबसे मर्मस्पर्शी पन्ने वे हैं, जिनमें देश विभाजन की भीषण त्रासदी के चित्र हैं। पुस्तक की शुरुआत में ही इस रक्त रंजित इतिहास का एक करुण पन्ना हमारी आंखों के आगे आता है, जिसमें शकुंतला जी के पिता के फुफेरे भाई अपने रिश्ते के एक भाई के साथ छत पर खड़े थे कि अचानक गोलियां चलने लगीं। एक प्राणघातक गोली सीने में लगी और उसके साथ ही उनकी चेतना लुप्त होने लगी। फिर उन्हें झट नीचे लाया गया। नब्ज टटोली गई, पर हंस तो कब का उड़ गया था। एक और प्रसंग उन्होंने अपनी एक सहपाठी का लिखा है। पाकिस्तान में दंगाइयों से बचने के लिए मोहल्ले के सारे हिंदू परिवार एक जगह छिपकर बैठे थे। अचानक एक छोटा बच्चा रोने लगा तो उसे मां की गोद से छीनकर खुद घर-परिवार के लोगों ने ही झट मृत्यु की गोद में सुला दिया गया, ताकि उसके रोने से बाकी सब पर लोगों पर असुरक्षा का साया न मंडराने लगे। पर उस मां के बारे में किसी ने नहीं सोचा, जिसकी गोद के लाल को, दुश्मनों ने नहीं, घर वालों ने ही काल-कवलित कर दिया। ऐसे प्रसंग जिन्हें पढ़कर लहू थरथराता है। रोंगटे खड़े होते हैं।

ऐसे भय के काले साए में सांस लेना मानो आधा जीना और आधा मर जाना था। अपनी जन्मभूमि के पराए हो जाने पर जब ये विपदा के मारे लोग शरणार्थी बनकर भारत आए, तो यहां विस्थापन की पीड़ा और रोज-रोज के दुख-अपमान की एक अलग कहानी शुरू हो गई। एक अच्छे खाते-पीते संपन्न परिवार को किस तरह की तंगहाली में रहना पड़ा, कैसे छोटे-मोटे काम करके गुजारा करना पड़ा, यह एक करुण इतिहास है, जिसके कुछ दुख भरे पन्ने शकुंतला जी के बचपन की कहानी में पढ़े जा सकते हैं। सारे दिन गुब्बारे फुला-फुलाकर उन पर मुहरें लगाना, किसी मशीन की सी तत्परता से दिन भर बटन टांकना, अखबारी कागज के लिफाफे बनाकर बेचना, इस तरह के तमाम काम वे स्त्रियां सारे दिन चलने वाले घरेलू कामों के साथ-साथ किया करती थीं। और इसे करते समय उनकी आंखों में होता था अपने बच्चों के दूध का सपना, उनकी पढ़ाई की फीस और किताबों के इंतजाम की आस और किसी तरह बदहाली में भी इज्जत से जी लेने की एक क्षीण सी आशा।

और बच्चे? वे बहुत तो नहीं जानते थे, पर जितना वे अपनी भोली आंखों से देखते थे, उससे उनके दिल सहम से गए थे। उनके पास खिलौने नहीं थे। ठीक-ठाक कपड़े भी नहीं। मुश्किल से गुजारा होता था, पर इसके बावजूद बुरे वक्त ने उन्हें असमय ही समझदार बना दिया था। उन्होंने हर हाल में खुश रहना सीख लिया था, जिससे उनके माता-पिता को परेशानी न हो। यहां तक कि किसी छोटे-मोटे खिलौने के लिए जिद करके भी वे माता-पिता को दुखी नहीं करना चाहते थे। शकुंतला जी ने अपने बचपन का एक छोटा सा प्रसंग लिखा है। इतना करुण कि मैं उसे भूल नहीं पाया। वे अभी बहुत छोटी थीं और मां के पास बैठी थीं। मां बड़ी तेजी से बटन टांक रही थीं। उन्हें बहुत बटन टांकने थे, इसलिए कि घंटों बटन टांकने पर भी बहुत थोड़े पैसे मिलते थे। पर वे थोड़े पैसे भी उस समय जरूरी थे, जिससे कि घर चलता रहे। जब मां बटन टांकती थीं तो सुई बहुत बार उनकी उंगलियों में चुभ जाती थी। इससे उनकी उंगलियों में कई छेद हो गए थे। मां इनको भूलकर अपने काम में लगी रहती थीं। पर छोटी बच्ची का ध्यान तो उसी पर था। मां को कितना कष्ट हुआ होगा, सोचकर वह बच्ची मां के हाथों को चूम लेती है। और मां? वह बच्ची के प्यार से गोद में लेकर उसका मुंह चूमती है और निहाल हो जाती है।

हालांकि बचपन का आनंद और मस्ती भी बड़ी अजीब चीज है। हर तरह की तकलीफों और बदहाली में भी बच्चे अपनी छोटी-छोटी खुशियां ढूंढ लेते हैं। भले ही बहुत कम साधन हों, पर घोर साधनहीनता में भी खेल तो खेले ही जा सकते थे। गिट्टे, छुपन-छुपाई, अष्टांग वगैरह ऐसे बहुत से खेल हैं, जिन पर कोई पैसा खर्च नहीं होता। बच्चे उन्हीं को खेलकर विभोर होते हैं और बुरे से बुरे हालात में भी अपनी मस्ती कायम रखते हैं। फिर छोटे-बड़े कामों की मस्ती भी क्या कम है। ऐसा ही एक काम है सरकारी नल से पानी भरकर लाना। बड़े लोग घर के कामों में लगे होते थे और बच्चों का काम था साझे सरकारी नल से पानी भरकर लाना। पर बच्चों के लिए यह भी खेल था। वे उसमें भी आनंद खोज लेते। वहां संगी-साथियों से मिलना और बतकही हो जाती और फिर काम का काम।

पर छोटे बच्चों के लिए यह काम किस कदर खतरे से भरा था, यह उनके पड़ोस में रहने वाले मासूम भाई-बहन सलीम और सायरा के साथ घटी दुर्घटना से पता चलता है, जिसे पढ़कर मन सुन्न सा रह जाता है। शकुंतला जी के साथ ही वे मासूम भाई-बहन भी पानी भरकर घर ले जा रहे थे। पर रास्ते में एक तांगे के पहिये की चपेट में आ गए। बारिश में तांगे का पहिया फिसल गया और तांगा उलटकर गिरा तो दोनों बच्चे बुरी तरह घायल हो गए, लहूलुहान। रक्तरंजित सलीम को अस्पताल ले जाया गया तो पूरा मोहल्ला वहां इकट्ठा था। वहां न कोई हिंदू था न मुसलमान। सब हमदर्दी भरे इंसान थे, बस। पर सलीम बचा नहीं और उसका वह भोला चेहरा शकुंतला जी कभी नहीं भूल सकीं।

एक अच्छी बात यह है कि शकुंतला जी की पुस्तक में बचपन के सारे रंग हैं। यहां तक कि उन्होंने बचपन की अपनी शरारतों का भी खुलकर वर्णन किया है। इसकी वजह से माता-पिता और घर के बड़े लोग किस मुसीबत में पड़ जाएंगे, बच्चे नहीं सोच सकते। और अगर सोच सकते होते तो फिर उन्हें बच्चा कौन कहता? हालांकि इसी के बीच बच्चों में खुद-ब-खुद समझदारी भी विकसित होने लगती है कि पढ़ना है, आगे बढ़ना है और जीवन में अपने लिए एक सम्मानजनक जगह बनानी है।

शकुंतला जी ने अपने स्कूल के दिनों, अध्यापिकाओं और सहपाठियों के बारे में भी बहुत खुलकर और बड़े मनोयोग से लिखा है। उनकी सहपाठियों में शकुंतला मेहंदीरत्ता, इंदु, कमलेश, शशि के चेहरे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं तो अध्यापिकाओं में पुष्पा मैम और मिस माथुर के प्यार और हमदर्दी से भरे चेहरे नहीं भूलते। शायद आसानी से भूलेंगे भी नहीं। इसी तरह बी.ए. फाइनल की परीक्षा से एक दिन पहले ही दादा जी का निधन एक ऐसा दुख और शोक से मर्माहत कर देने वाला प्रसंग था कि उन्होंने परीक्षा न देने का दुखद फैसला किया। तब पारिवारिक आत्मीयता से ओतप्रोत हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ. निर्मला जैन का खुद घर पर आकर उन्हें साथ ले जाना और परीक्षा-कक्ष तक छोड़ना, गुजरे दौर के अध्यापकों की एक भावुक तस्वीर मन में अंकित कर देता है। दोनों छोटी बहनों के बारे में भी उन्होंने बहुत मन से लिखा है। खासकर सरोज की बहुत भली और आत्मीय छवियां इस पुस्तक में हैं, जो भुलाए नहीं भूलतीं।

अलबत्ता शकुंतला जी की आत्मकथा का पहला खंड 'मेरा बचपन' पढ़कर लगता है, हमने कोई पुस्तक नहीं पढ़ी, बल्कि जिंदगी का दीदार किया है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत भी है। फिर एक और अच्छी बात यह है कि यह पुस्तक शकुंतला जी के बचपन और किशोरावस्था के दुख-दर्द और करुण स्थितियों की ही नहीं, बल्कि मन की एक क्षीण सी उम्मीद के धीरे-धीरे सबल और पुष्ट होने की कथा भी है, जिससे एक नन्हा सा बिरवा शक्ति और संभावनाओं से भरा किशोर वृक्ष बन जाता है। निःसंदेह इसमें आशा की वह बलवती डोर भी है, जिसे पकड़े-पकड़े पाठक चलता है तो शकुंतला जी की आत्मकथा में कहीं न कहीं उसे अपनी भी आत्मकथा नजर आने लगती है। शकुंतला जी के दुख-दर्द और संघर्ष में कहीं न कहीं उसे अपने दुख-दर्द और संघर्षों की झांकी भी नजर आने लगती है। इस तरह पुस्तक में बहुत कुछ है, जो पढ़ने वाले किसी संवेदनशील पाठक की अपनी निधि बनता है। बेशक शकुंतला जी ने बचपन की स्मृतियों को लिखने का जो ढंग अपनाया है, उससे यह आत्मकथा केवल उनकी नहीं, पूरे समय की आत्मकथा बन गई है।

यों साफ शब्दों में कहूं तो 'मेरा बचपन' में अभिव्यक्ति और शिल्पगत कच्चापन कम नहीं है। कई जगह भाषा बहुत ढीली-ढाली या कृत्रिम है। बहुत सारी चीजें अव्यवस्थित हैं। कहीं-कहीं भाषा प्राध्यापकीय हो गई है, जिससे इस आत्मकथा की स्वाभाविक खुशबू दब गई सी है। और भी बहुत कुछ है जो मुझे अखरा और हो सकता है कि आपको भी खराब लगे। हो सकता है, शकुंतला जी थोड़ी और मेहनत करतीं तो कहीं अधिक चुस्त और कसी हुई आत्मकथा हमें पढ़ने को मिलती। पर मेरा आग्रह है, आप इन कमियों को भूलकर उन स्थलों में रमें, जहां सचमुच नेकी, प्यार और हमदर्दी के खूबसूरत फूल खिले हैं और मन को लहूलुहान करते कांटों के इर्द-गिर्द भी इंसानियत की खुशबू लिपटी हुई है। पढ़ते ही ये हिस्से हमारे साथ हो लेते हैं और हमारी तपती हुई आत्मा को ठंडक देते हैं।

निःसंदेह शकुंतला जी ने अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद एक सुंदर और अविस्मरणीय आत्मकथा लिखी है, जिसे पढ़ते हुए मन आज की तन गई जिंदगी की बेहिसाब आकांक्षाओं, ईर्ष्या और वैमनस्य के दलदल से थोड़ा ऊपर उठता है और आप एक आम इंसान की भी मोतियों सरीखी चमकती हुई आत्मा को देख पाते हैं। और यह सफलता बेशक कुछ कम नहीं है।

पिछले दिनों सुस गुरु जी की बड़ी सुंदर और भावपूर्ण आउपन्यासिक पुस्तक 'श्याम की मां' पढ़ रहा था, जो उनकी मराठी पुस्तक 'श्यामची आई' का अनुवाद है। इसे पढ़ते हुए मन की बहुत अजीब हालत हो गई। मैं पढ़ता जा रहा था और रोता जा रहा था। रोता जा रहा था और पढ़ता जा रहा था। न पढ़ने से मैं अपने आपको विरत कर सकता था और न रोना थम रहा था। ओह, मां का कैसा गंगा, यमुना और सरस्वती सरीखा निर्मल चरित्र! बच्चे के लिए, परिवार के लिए, पति के लिए- और यहां तक कि अड़ोसियों-पड़ोसियों के लिए, हर दुखी, हर वंचित के लिए कैसा झर-झर झरता प्रेम! जीवन भर खुद को बलिदान करते हुए कैसे वह तिल-तिल करके जीती और मरती है और अंत में क्षीणती हुई वह स्त्री परिवार की मर्यादा बचाए रखने के लिए खुद को कठिन से कठिन कामों में उलझा देती है, जबकि शरीर काम का नहीं रह गया और रह-रहकर बुखार उसे पस्त कर देता है। श्याम की मां के अपरिमित स्नेह, अपरिमित त्याग की गाथा पढ़कर और बड़े-बड़े ज्ञानियों से बढ़कर उसके तपते हुए अंतःकरण से निकली बातें खुद सुस गुरु जी के मुंह से सुनकर बार-बार मुझे सत्यार्थी जी की बात याद आ रही थी कि ईश्वर ने मांएं बनाईं, क्योंकि वह हर जगह उपस्थित नहीं रह सकता था! मुझे लगता है, मां है, यही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ईश्वर है। मां से बढ़कर ईश्वर की कोई और सूरत हो नहीं सकती।

सुस गुरु जी की पुस्तक 'श्याम की मां' पढ़ते हुए बार-बार मन में आ रहा था कि हिंदी में तो ऐसी कोई पुस्तक नहीं है, जिसे 'श्यामची आई' के समकक्ष रखा जा सके। 'श्याम की मां' ऐसी आत्मकथात्मक कृति है, जिसे सुस गुरु जी के शब्दों में कहें तो वह पत्थर को भी पिघला सकती है। इसे पढ़ते हुए आप लगातार आंसुओं से अपनी आत्मा को निमज्जित करते हैं। श्यामची आई एक तरह का 'मातृपुराण' है। पर अफसोस, हिंदी में तो मां के उज्ज्वल चरित्र को लेकर लिखी गई ऐसी कोई पुस्तक नहीं है। हां, शकुंतला कालरा की पुस्तक 'मेरा बचपन' के कुछ पन्ने जरूर उसी तरह भावुक कर देने वाले हैं। पढ़ते हुए पाठक सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ सुंदरता के सामने खुद को पाता है, जो मां है और सचमुच शकुंतला जी की आत्मकथा के इन कुछ पन्नों को पढ़ते हुए भी मन की वही हालत होती है। आंसू थमते नहीं हैं और आप पढ़ने से भी खुद को रोक नहीं पाते।

बेशक 'मेरा बचपन' के लिए शकुंतला जी बधाई की हकदार हैं। वे अपनी कथा का आगे का हिस्सा लिखें। हम सभी व्यग्रता से उसकी प्रतीक्षा करेंगे। अभी तक बड़ों की आत्मकथाएं हमने बहुत पढ़ी हैं, पर एक मामूली आदमी की कथा में उसके मामूलीपन के बावजूद कितनी दिव्य और सुंदर छटाएं विद्यमान हैं, यह इस आत्मकथा को पढ़कर जाना जा सकेगा। इसे पढ़कर यह अहसास भी मन में पैदा होता है कि अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद यह दुनिया सचमुच सुंदर और जीने लायक है। शकुंतला जी की सीधी-सादी भाषा में लिखी गई इस आत्मकथा को पढ़कर बहुत से पाठक जाने-अनजाने ही जीने के मायने समझेंगे और उनकी आस्था की कांपती डोर मजबूत होगी। यह भी किसी कृति की कोई छोटी सार्थकता नहीं है।

प्रकाश मनु · 545, सेक्टर-29 फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008 · 91-9810602327


आत्मकथ्य

हम जिंदगी अकेले नहीं जीते। आयु का चाहे कोई भी पड़ाव हो। कई लोग हमसे जुड़े होते हैं। जब हम अपनी जिंदगी की किताब का कोई अध्याय खोलते हैं तो उसके सभी परिच्छेद हमारे साथ-साथ अन्य लोगों से भी जुड़े होते हैं जिनके साथ हमने वे लम्हे जिए। गम और खुशी बांटी। वे लम्हे केवल समय मात्र नहीं हैं हमारी पूरी जिंदगी हैं। भाग्यवश इसमें मुझे कुछ ऐसे निःस्वार्थ प्रेम करने वाले आत्मीयजन मिले जिन्होंने जीवन में फूल बिखेरे और कांटे अपने हाथों से चुन लिए। चाहे उनके अपने हाथ छिल गए, लहूलुहान भी हुए। उन्होंने मेरी जीवन-यात्रा के हर पड़ाव में खुशियों के सारे रंग सजा दिए और उसे महका दिया। इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने चुन-चुन कर हर राह में कांटे बिखेरे। नन्हे कदमों को कई जख्म दिए ताकि कदम रुक जाएं, राहें मुश्किल हो जाएं। लेकिन मैं डरी नहीं, रुकी नहीं। जानते थी आगे जीत है। मुस्कुराती मंजिल है। ऐसे लोग अपने प्रयासों से निरंतर नकारात्मक विचारों की ऊर्जा भरते रहे किंत उनसे भी डिगी नहीं। गिरी नहीं। वरन् इरादे और मजबूत हुए। जीवन में ऐसे लोगों ने मुझे अपने आसपास की छिपी साजिशों से सदा सजग रखा। इसलिए मैं सदा उनकी आभारी रहूंगी। मैंने उन लोगों को जीवन में बिल्कुल भूल दिया। अपनी स्मृतियों से हमेशा के लिए मिटा दिया। मेरे मन में उनके लिए कोई द्वेष नहीं है। मैंने केवल उन्हीं को याद रखा जिन्होंने मुझे सुखद संबल दिया। सच, विस्मृति में बड़ा सुख है। प्रसाद ने तभी तो कहा है - 'विस्मृति व अवसाद घेर ले।' मेरे इन संस्मरणों में भी केवल वही लोग हैं जिन्होंने मुझमें सकारात्मक ऊर्जा को भरा और मुझे जीवन-पथ पर सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

मेरे लिए अपने बचपन को याद करने का अर्थ है उस समय के पूरे बचपन को याद करना। बचपन जीवन-यात्रा का सबसे खूबसूरत पड़ाव होता है। जिसे उस आयु में मां की ममतामयी गोद, पिता का प्यार, अप्रतिम जुड़ाव से भरा संरक्षण, दादा-दादी का आशीर्वाद यानी भरपूर खुशहाल परिवार मिल जाता है तब रिश्तों की यह मिठास बड़े होने तक उसका भरण-पोषण करती है। बचपन की मधुर यादें उसकी पूंजी बन जाती हैं। बड़े होकर फिर उसे हर स्नेह-बंधन से बंधना आ जाता है। बचपन के साथ सबका गहरा लगाव होता है। व्यक्ति का मन करता है कि काश वह बचपन में लौट सके। लेकिन अपनी जन्मभूमि से विस्थापित शरणार्थी-परिवारों के बच्चों ने उस बचपन को एक दुःस्वप्न की तरह जिया है जिसकी आवृत्ति की इच्छा उन्हें कभी नहीं होगी। उनका बसेरा छिन गया था। उनके संगी-साथी बिछड़ गए। कहीं बसेरे के साथ बच्चों ने माता-पिता खो दिए थे, तो कहीं माता-पिता ने बच्चा। भूख से बेहाल अपने बचपन को ढोते हुए वे बच्चे अनजान गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे थे। कहां बची थी चपलता की चेतनाधारा जो बच्चों को और उनके बचपन को भोली और मीठी शरारतों से भर देती है।

बचपन जो मानव का निर्माण-काल है और वह निर्माण उसके आसपास का वातावरण करता है। सफल आदमी बनने के लिए आपसी-सौहार्दपूर्ण, स्नेहिल एवं सकारात्मक ऊर्जा से भरा स्वस्थ वातावरण चाहिए। विभाजन की त्रासदी ने असंख्य बच्चों के बचपन को अपने ही घर-परिवार में उपेक्षित कर दिया था। पहले घर के बड़े-बूढ़े शिशु और बालक को गोद में लेकर उसे बाहर घुमाकर आते थे तब बच्चा तो बहलता ही था, बुजुर्गों का भी मन बहल जाता था। अब दोनों ही इस सुख से वंचित थे। तीन-तीन पीढ़ियां रोटी की जुगाड़ में लग गई थीं। कहां मिल पा रहा था सान्निध्य-सुख? कहां मिल पाया दादा-दादी की गोद और बाहों का झूला? उनकी आंखों में ममता और हृदय में वात्सल्य का अहसास तो बच्चे पल-पल करते ही थे पर उसकी अभिव्यक्ति के लिए न उनके पास पैसा था न समय। कितने मजबूर थे सब! रिश्तों की मिठास को सूंघकर ही प्रसन्न हो लेते थे।

मानव जीवन की सबसे कीमती सौगात बचपन है किंतु जो बच्चों को मिली थी अंतर्व्यथा और कसक के रूप में। विस्थापित परिवारों के बच्चों के लिए अपने विचलित, विपत्तिग्रस्त वर्तमान में सुंदर-सार्थक भविष्य की सोच ही अकल्पनीय थी। सैंकड़ों बच्चे होटलों/ढाबों में बाल-मजदूरी भुगतने के लिए विवश थे। आजादी की इस लड़ाई ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया था। नए भारत का प्रगतिशील सपना देखने वाले 'चाचा नेहरू' कभी इन बच्चों से नहीं मिले, न किसी राजनेता ने नजदीक जाकर बच्चों से जुड़ी उनकी चिंताओं को जानने की कोशिश की और न यह समझने का प्रयास किया कि उनकी महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ में कहीं बच्चे कुचले तो नहीं गए। जिस परिवार के मुखिया दंगों की भेंट चढ़ गए थे, उस परिवार के बच्चों को वक्त ने उम्र से पहले ही अपने पांव पर खड़े होना सिखा दिया था। ऐसा नहीं था कि वे लड़खड़ाए नहीं या कांपकर गिरे नहीं या गिर-गिर कर चोटें नहीं खाई। गिरकर, चोटें खाकर फिर संभल गए। खाने और पढ़ने की उम्र में वक्त ने उन्हें बाल मजदूर बना दिया था। घर में विधवा मां और बूढ़ी दादी तथा जवान बहन की जिम्मेदारी का भार उठाना नन्हे कंधों ने सीख लिया था। संघर्ष और चुनौतियों के बीच मंजिल की ओर न केवल बढ़ना सीख लिया था वरन् अपनी हिम्मत से मंजिल तक भी जा पहुंचे थे।

फिनवाई मां कब लोरी सुनाकर बच्चे को कल्पनालोक की सैर कराती? थकी-हारी जब वह लोरी गुनगुनाना शुरू ही करती थी कि खुद ही बिना बिछौने की चारपाई पर लुढ़क जाती थी। हां, बिल्कुल यही बचपन था उस समय का। छोटे-छोटे एक-एक कमरे के मकान थे। आंगन ही नहीं था तो दादी गौरैया को दाना चुगने कहां बुलाती? आसपास पूरे मोहल्ले में ही कोई कहीं पेड़ तक नहीं होता था कि चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे। जब कभी आंखें मूंदकर बचपन के गलियारों में प्रवेश करती हूं तो मीलों दूर कोई बाग-बगीचा या हरियाली कहीं दिखाई नहीं देती। पुरानी दिल्ली के हर इलाके में मोहल्ले थे, कहीं किसी मोहल्ले के पास बच्चों के खेलने के लिए कोई पार्क नहीं था। सब बच्चे बस अपनी ही गली में खेलते थे। हम बच्चे प्रकृति के समीप नहीं थे या कहें प्रकृति कहीं हमारे समीप नहीं थी। गली में से आगे गली निकलती- फिर आगे जाकर दाएं-बाएं और गली निकलती जाती। यों कहें हम ईंटों के जंगल में रहते थे। कंक्रीट बस कंक्रीट। सुबह-सुबह शुद्ध ताजी हवा की जगह हर घर में अंगीठी के जलने का धुआं आसमान की तरफ उड़ता दिखाई देता। हमारी पीढ़ी के किसी भी शरणार्थी परिवार के बच्चों को बचपन में प्रकृति का मनोरम तथा स्वस्थ परिवेश नहीं मिला इसलिए बहुत से बच्चे बीमार भी हुए, कुपोषणग्रस्त भी हुए। बच्चे उतने तंदुरुस्त नहीं थे, जितने होने चाहिए। भीड़-भाड़ वाली तंग गलियां ही दाएं-बाएं दिखाई देती थीं। न हरियाली मन के भीतर थी न बाहर। बाहर-भीतर घुटन और सीलन ही सीलन।

हां यही बचपन था हमारा जिसमें मेरे साथ उन हजारों, लाखों बच्चों के अतीत की रूठी उदास शामें हैं। रात का दमघोंटू अंधेरा है। असुरक्षित, आतंकित भविष्य का बेरहम मकड़जाल है, जिनमें कैद हैं वे और उनका अस्तित्व और उनकी कामनाएं साथ ही उड़ान की छटपटाहट। मेरे बचपन की कहानी उस समय के शरणार्थी समाज की दस्तावेज है, जिसमें उनकी गरीबी, मजबूरी, भुखमरी और लाचारी है, के दुख-दर्द को सच्चाई के साथ मैंने उकेरने की ईमानदार कोशिश की है। यह उन बच्चों की कहानी है, जिनके सपनों और सोच को कुपोषण और भुखमरी से उत्पन्न अनेक रोगों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। यह कहानी अपने बसेरे से उखड़े उन तमाम बच्चों की है, जिनके दिल और दिमाग ने जो अनुभव और चोटें आयु के उस सुंतरे पड़ाव में हासिल की जब उन्हें तितलियों के साथ खेलना और उनके पीछे भागना था। जिस उम्र में आंखों में चमक होती है उस उम्र में वहां नियति ने उन्हें निराशा-दर्द और आंसू दिए। ये वे परिंदे हैं जब उन्हें चहकना था उनसे उनका आशियाना छिन गया और वे चल पड़े एक अज्ञात-यात्रा, अनजान सफर की ओर।

नन्हे और मासूम बच्चों का कोमल बचपन नहीं झेल पाया तूफानों को। इसमें से अनेक बीच में उद्वेलित लहरों में तिनकों की तरह बह गए। कहीं आकाश की तमतमाती बिजली गिरी और अनेक दीए बुझ गए। गरीबी और भुखमरी के पाले से कई खिले फूल असमय ही डालियों पर ही पंखुड़ी-पंखुड़ी होकर मुरझा गए। अनगिनत कलियां बिना खिले ही सूख गईं। कुछ किसलय टूटकर पीले पत्तों की तरह वक्त के बवंडर में उड़ गए। कुछ किसलय टूटकर पीले पत्तों की तरह वक्त के बवंडर में उड़ गए।

चलिये, ले चलती हूं आपको भी अपने साथ उन गलियारों में जहां विभाजन की त्रासदी को भोगता उदास बचपन भी खिला-खिला मिलेगा। दुख और अभाव में भी सुख ढूंढता बचपन मिलेगा। रोते-रोते हंसता हुआ बचपन मिलेगा। सुख-सुविधा के अभाव में भी अपने ढंग से अपने खेल से खुश रहते बच्चे मिलेंगे। गलियों में गिट्टे, कंचे खेलकर और अष्टांग, कोकला-छपकी से मन बहलाते बच्चे मिलेंगे। कभी रस्सी टाप कर दुखों को टापते और गिनते कि कौन कितना जल्दी-जल्दी टाप सकता है। दीवार पर गेंद फेंककर अपने दुख-दर्द फेंक देते बच्चे मिलेंगे। इन्हीं सभी खेलों में बिना इनाम की फर्स्ट-सेकंड आने की प्रतियोगिता रखते बच्चे मिलेंगे। स्कूल से आते ही बस्ते का बोझ फेंककर सब बच्चे अपनी गली में आ कर जी भर खेलते। यही तो उनका मनोरंजन था। दुख-अभाव को भूलने का एकमात्र साधन।

फिर रोज रात को खाना खाकर दोबारा इकट्ठे होते। घर में उदासी को उतारकर आते। अंताक्षरी खेलते। रात की इस महफिल में रोज हर चेहरा बुझा-बुझा यहां आकर थोड़ी देर के लिए ही सही, खिल जाता। मिलकर कहानी भी सुनी-सुनाई जाती। जो अपने दादा-दादी से कहानी सुनता या पढ़कर आता वह सबको कहानी सुनाता। इसकी भी बारी होती। एक दिन पहले ही बता दिया जाता कि कल इसकी बारी है। रोज स्कूल की बातें होतीं। सहेलियों की बातें होतीं। सबको एक-दूसरे की सहेली का नाम सहित पूरा इतिहास पता होता। टीचर्स की बातें होतीं। टीचर की नकल भी उतारते। पर कहीं किसी के प्रति अनादर-भाव नहीं होता। कुल मिलाकर सब खूब मस्ती करते। यही तो हमारी दुनिया थी। हम बच्चे अपनी बनाई इस छोटी सी दुनिया में ही डूबे रहते। एक आशा की नई किरण के साथ सुनहरे सपने सबकी आंखों में तैरते। समय की मार और अतीत की त्रासदी को भूलकर अपने आजाद भारत के विशिष्ट नागरिक बनने के लिए संकल्प के साथ हम नन्हे राही उड़ान की चाह में अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाते। अपनी-अपनी मशाल हाथ में लेकर समय को चुनौती देते हुए-----

हां, एक बात और! मैंने बचपन के इन संस्मरणों के अंत में एक संस्मरण अत्यंत संक्षेप में अपनी किशोरावस्था का भी जोड़ दिया है ताकि पाठक जान सकें कि बचपन के वे संघर्ष व्यर्थ न गए। मंजिल की तरफ कुछ कदम ही सही हम बढ़े हैं। अपने पंखों को श्रम से चमकाया है, जिन्होंने उड़ान की चाह को और हवा दी। आगे की बातें फिर कभी।

बचपन के इन आत्मकथात्मक संस्मरणों ने पुस्तक रूप में आकार कैसे ग्रहण किया यह भी अत्यंत दिलचस्प घटना है। इसका बीज रखा था बालसाहित्यकार रमाशंकर ने, जिन्होंने 'बालसाहित्यकारों के बचपन के संस्मरण' की पुस्तक संपादित करते वक्त मुझसे मेरे बचपन के संस्मरण को मांगा। उनके बार-बार पत्र और फोन पर प्रतिस्मरण कराते हुए भी नहीं लिख पाई। पुस्तक के फाइनल प्रूफ भी आ गए और रमाशंकर ने पुनः आग्रह करते हुए कहा कि 'आपके बिना पुस्तक प्रेस में नहीं जाएगी।' बस उस अनुनय भरे आग्रह को टालने की मैं धृष्टता नहीं कर पाई। कागज पैन लिया और तीन-चार घंटे लगातार अपने आंगन की एक सीढ़ी पर बैठकर दूसरी सीढ़ी को मेज बनाकर संस्मरण लिख डाला- जिसका शीर्षक था 'पन्ने-पन्ने में झांकता एक चेहरा।' नहीं जानती वह संस्मरण कैसे एक ही सिटिंग में फाइनल रूप में लिखा गया जबकि मेरा कभी कुछ भी फाइनल नहीं होता। भाषा, वाक्य तो शुद्ध करती ही हूं, परिवर्तन-परिवर्धन भी करती रहती हूं। मैंने उसी दिन शाम को ही रमाशंकर को संस्मरण भेज दिया। पुस्तक छप गई। डॉ. प्रकाश मनु का संस्मरण भी उसमें था उन्होंने मेरा संस्मरण पढ़ा और मुझे फोन किया कि यह संस्मरण इतना मार्मिक था कि इसने मुझे और सुनीता को रुला दिया। ऐसे संस्मरण और लिखिए। बात आई-गई हो गई। तीन-चार वर्षों बाद महेशचंद्र सक्सेना ने भोपाल से छपने वाले पत्र 'अपना बचपन' के लिए 'मेरा बचपन और मेरी शरारतें' स्तंभ के लिए मुझसे मेरे बचपन के संस्मरण मांगे जिन्हें वह कड़ियों में छापना चाहते थे। मैंने लिखना शुरू किया और नियमित रूप से भेजने लगी। आठ-नौ तो भेजे फिर अनियमित होती गई। कभी लिखती कभी नहीं। उनमें कोई कथा का तारतम्य तो था नहीं बस अतीत की चं स्मृतियां थीं जो छोटे-छोटे जुगनुओं के रूप में दिल-दिमाग के जंगल में टिमटिमाने लगी थीं। उनमें कोई पूर्वापर संबंध नहीं था। बाद की कोई स्मृति पहले याद आ जाती और पहले की यादें बाद में रोशन होने लगतीं। परत-दर-परत प्याज के छिलकों की तरह यादें खुलने लगीं। उन्हें शब्दों में आकार देना शुरू किया लेकिन बारह किश्तों से आगे नहीं बढ़ पाई। और उनसे क्षमा मांग ली। बीज के बाद 'अपना बचपन' ने अंकुरण का काम किया! फिर वर्षों का अंतराल। 'साहित्य अमृत' (प्रभात प्रकाशन) में 'किताब बचपन की' (नव. 2014) 'आत्मसंस्तन' के रूप में मेरा यह आत्मकथात्मक संस्मरण छपा तो डॉ. प्रकाश मनु ने फिर आग्रह किया कि मैं ये सारी स्मृतियां लिख डालूं। पाठकों ने भी उसे पसंद किया। प्रकाश मनु जी के आग्रह और सुझाव ने इन संस्मरणों के लेखन के बीज को पल्लवित और पुष्पित करने का काम किया। बस यह 'आबीती' फलित होकर आपके सामने है। मैं इन तीनों के प्रति कृतज्ञ हूं विशेष रूप से डॉ. प्रकाश मनु की, जिन्होंने इसे मंजिल तक पहुंचाया और सभी स्मृतियों को पुस्तक रूप में एक साथ रखने के लिए निरंतर प्रोत्साहित किया। अपनी अस्वस्थता के बावजूद पूरी पांडुलिपि पढ़ डाली और अपने अमूल्य सुझावों से इसे संवारा। आदरणीय रमेश तैलग ने अपने व्यस्त जीवन में न केवल इसे आद्योपांत पढ़ा वरन् अपनी महत्वपूर्ण एवं विस्तृत टिप्पणी देकर मुझे कृतार्थ भी किया। इन सबके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करती हूं।

और हां, अपने पाठकों से मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि मूल प्रेरणा के बाद इस लेखन की समूची ताकत मैंने अपने ही जिए गए जीवन से पाई है और उसकी पुनर्रचना की है। कहीं-कहीं संस्मरणों में सूचनात्मक आवृत्ति भी मिलेगी क्योंकि सब अलग-अलग समय पर लिखे गए संस्मरण हैं जो स्वतंत्र भी हैं और अपने आप में पूर्ण भी। वे यदा-कदा विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं जिनके लिए पूर्वापर संबंध बताना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

और अंत में -- मुझे इसकी विधा तय करना मुश्किल लग रहा है। यह जिम्मेदारी है अब पाठकों की वे इसे किसी भी तरह से पढ़ें। यह तो बस आपसे मेरी सीधी बातचीत है। मैंने तो आबीती कह दी। जो स्मृतियों के कई गहरे तहखानों में परत-दर-परत बरसों से छिपी हुई थी। जिसमें मैं अकेली नहीं हूं। मेरे साथ ही अपनी धरती से उखड़े मुझ जैसा ही दर्द भोगते मेरे अंतरंग बालमित्र और बाल-सखियां भी हैं।

आइए, पढ़ते हैं अतीत के कुछ पन्ने जिनमें मेरा शैशव, बचपन और कैशौर्य समाहित है।


डॉ. शकुंतला कालरा, डी.लिट.
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्री कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: एन.डी.-57, पीतमपुरा दिल्ली-110034 मो: 8287479455 लैंडलाइन: 011-41677475

आत्मकथ्य · बचपन की सरल, सुंदर और अविस्मरणीय छवियां

— प्रकाश मनु द्वारा भूमिका · पुस्तक 'मेरा बचपन' के लिए

यह पाठ शकुंतला कालरा की आत्मकथा 'मेरा बचपन' की भूमिका है, जिसे प्रकाश मनु ने लिखा है।

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