भूमिका: हिन्दी बालसाहित्य (विविधा)
हिंदी के बालसाहित्य के बारे में आप धारणा यह है कि वह दोयम दर्जे का है। उसमें स्तरीयता नहीं है वास्तविकता यह है कि इस प्रकार नारे वही देते हैं, जिन्होंने बालसाहित्य को पढ़ा ही नहीं। आज के परिदृश्य में बालसाहित्य का लगभग सभी विधाओं में जितना लेखन हो रहा है, वह उसे साहित्य की मुख्यधारा के समानांतर खड़ा रखने में पूर्ण समर्थ है। बालसाहित्य को हल्के ढंग का रचना-कर्म समझना उनकी मानसिक संकीर्णता को दर्शाता है।
वर्तमान में बालसाहित्य गद्य-पद्य — कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक, लेख, जीवनी, संस्मरण, चुटकुले, यात्रावृत्तांत की कई विधाओं में लिखा जा रहा है। बालसाहित्यकार अपने-अपने ढंग से लेखन में सक्रिय हैं। आज हमारा बालसाहित्य विविध विधाओं में फल-फूल रहा है। सब अपनी-अपनी प्रिय विधा शैशव, बालपन और कैशोर्य आयु के विविध सोपान एवं बालमन और बालमनोविज्ञान के अनुरूप अच्छा साहित्य लिख रहे हैं, जो परिमाण और गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से संतोषजनक है। यह उनके भावों और कल्पनाओं की समझ के साथ लिखा जा रहा है।
आज बालसाहित्य का आधुनिक रूप निखरा है। बालसाहित्य आज बच्चों के जीवन, उनके परिवेश, उनकी अंतर्प्रकृति, उनके मनोविज्ञान, उनके भावजगत, उनके विचार-जगत को लेकर लिखा जा रहा है। वर्तमान में बच्चों के लिए बालसाहित्य का बहुत महत्त्व है। आज उसकी स्वतंत्र पहचान बनाने में बालसाहित्यकारों की निस्संदेह महत्त्वपूर्ण भूमिका है। विषयवस्तु और शैलीगत प्रयोग को लेकर बालसाहित्यकारों ने उसे नया आयाम दिया है। उसे समसामयिक परिवेश से जोड़ा है।
इस पुस्तक को आकार देने में बालसाहित्य-लेखन से जुड़े मेरे आलेखों की मुख्य भूमिका है, जिन्हें मैंने पत्र-पत्रिकाओं के लिए संपादकों के आग्रह पर लिखा। उनमें से इस पुस्तक में संकलित कुछ आलेख हैं — स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी बालकविता, 21वीं सदी के चुनिंदा बालउपन्यास, आलोचना-कर्म में आलोचक का धर्म, हिंदी बालसाहित्य में दिव्यांग विमर्श, हिंदी बालकविता में छिटका वसंत ऋतु का सौंदर्य, हिंदी बालकविता में पावस ऋतु का सौंदर्य, कन्हैयालाल 'मत्त' की कहानी योगेन्द्रदत्त की जुबानी (साक्षात्कार), गोविन्द शर्मा जी से डॉ. शकुन्तला कालरा की भेंटवार्ता, गाँव और नगर की मिश्रित संस्कृति : प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बालकविताएँ, लोकसाहित्य का अंग पहेली विधा में डॉ. अजय जन्मेजय का योगदान और बालकविता में पर्यावरण प्रदूषण की चिंता आदि।
स्वतंत्रता-आंदोलन और हिंदी बालकविता
'स्वतंत्रता-आंदोलन और हिंदी बालकविता' पुस्तक का पहला आलेख है। स्वतंत्रता से पूर्व लिखी कविताओं का प्रमुख विषय देश-प्रेम की शिक्षा था। राष्ट्रीयता का यह स्वर परिस्थिति विशेष में ही नहीं उभरा, वह किसी न किसी रूप या तत्त्व के रूप में सदा अभिव्यक्त होता रहा है। वैदिक साहित्य में राष्ट्रीय विषयों से संबद्ध मंत्रों के अंतर्गत भौगोलिक अखंडता, मातृभूमि की महिमा और राष्ट्र के गौरव का वर्णन हुआ है। बच्चों को बचपन में अपने देश के प्राचीन गौरव से रागात्मक संबंध जुड़ जाने के संस्कार मिल जाते थे। देश-प्रेम की शिक्षा उसके लिए त्याग करने और बलिदान हो जाने की प्रेरणा वाले गीत साहित्यकारों ने रचकर सदा ही बच्चों को प्रेरित किया है। अंग्रेजी या किसी दूसरी भाषा में शायद ही इतने अधिक देश-प्रेम के बालगीत लिखे गए हों जितने हिंदी में। इसका प्रमुख कारण यही है कि हमारे देश में विदेशी शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता-संग्राम चल रहा था। उस समय बच्चे-बच्चे के मन में देश-प्रेम, स्वतंत्रता की प्राप्ति का जज्बा भरना साहित्यकारों ने अपना परम कर्तव्य ही नहीं वरन् राष्ट्रधर्म समझा। यही कारण है कि राष्ट्रीय भावना की प्रवृत्ति को बलवती करने वाली रचनाएँ लिखी गईं। इस आलेख में साहित्य और राष्ट्रीयता की परस्पर घनिष्ठता का निरूपण किया है।
21वीं सदी के चुनिंदा बालउपन्यास
'21वीं सदी के चुनिंदा बालउपन्यास' आलेख में मैंने कुछ चुनिंदा बालउपन्यासों का विवेचन, विश्लेषण और मूल्यांकन किया है। बाल उपन्यास विधा की मूल प्रेरणा अंग्रेजी बालसाहित्य है। इसका प्रारंभ बीसवीं सदी के साथ-साथ हुआ। गद्य विधाएँ चाहे नाटक हो या उपन्यास स्वातंत्र्योत्तर काल में अधिक विकसित हुईं। 21वीं सदी के आरंभ से ही बड़ी तीव्रता से इस विधा में विकास देखा जा सकता है। बड़ी संख्या में रोचक कथानक, अच्छी साज-सज्जा एवं आकर्षक आवरण पृष्ठ के साथ अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने इस विधा को विकसित किया है। बच्चों की रुचि, उनके मनोविज्ञान उनकी समस्याओं एवं पर्यावरण सुरक्षा को लेकर यद्यपि अनेक अच्छे उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैंने अपने आलेख में 21वीं सदी के कुछ चुनिंदा मौलिक बालउपन्यासों का ही विवेचन, विश्लेषण और मूल्यांकन किया है। इक्कीसवीं सदी में मौलिक उपन्यासों के साथ-साथ अनेक अनुदित बाल उपन्यास भी मिलते हैं, जिन्हें बाल पाठकों ने बहुत पसंद किया है।
आलोचना-कर्म में आलोचक का धर्म
'आलोचना-कर्म में आलोचक का धर्म' इस आलेख में आलोचक के कर्तव्य, आलोचक के गुणों पर प्रकाश डाला है। एक अच्छा समीक्षक किसी भी कृति का उसकी पूर्णता में सांगोपांग अध्ययन करता है। उसे हृदयंगम कर सहानुभूतिपूर्वक उसके गुण-दोष को समझ कर उसका विश्लेषण करता है। एक निष्पक्ष आलोचना लेखक और पाठक दोनों का मार्ग-दर्शन करती है। पाठक के सामने रचना का हर कोण से विश्लेषण-मूल्यांकन करती है और उसे सही परिप्रेक्ष्य में पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करती है। इसके लिए आवश्यक है कि आलोचक का पहले एक अच्छा पाठक बनना।
हिंदी बालसाहित्य में दिव्यांग विमर्श
पुस्तक का अगला अत्यंत महत्त्वपूर्ण आलेख है 'हिंदी बालसाहित्य में दिव्यांग विमर्श'। इक्कीसवीं शताब्दी, जिसे हम उत्तर आधुनिक काल कहते हैं, वह चिंतन की दृष्टि से विविध सवालों/विमर्शों का काल है। साहित्य के नए विमर्शों और नए प्रश्नों पर आज लगातार विचार हो रहा है। समाज का यथार्थ जिसे हम अपने समाज में देखते हैं, भोगते हैं, आज बहुत तरह के विमर्श और सोच की प्रक्रिया चल रही है। लेखक की दृष्टि हर तरफ जा रही है। चाहे वह दलित विमर्श हो, स्त्री विमर्श हो, राजनीतिक विमर्श हो, आदिवासी विमर्श हो, किन्नर विमर्श हो चाहे दिव्यांग विमर्श। ये आज स्वतंत्र रूप से साहित्यिक विमर्श बन चुके हैं, जिन्हें केंद्र की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। साहित्य में दिव्यांग विमर्श की आवश्यकता समझते हमारे बालसाहित्यकारों द्वारा आज साहित्य में बाल दिव्यांगों की संवेदना को आँक कर उसका आंतरिक विश्लेषण कर उसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण, आत्मकथा आदि विविध विधाओं में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। मेरे आलेख का मुख्य बिंदु केवल कथासाहित्य ही है। उसमें भी कहानी और उपन्यास विधा को लिया है।
हिंदी बालकविता में छिटका वसंत ऋतु का सौंदर्य
'हिंदी बालकविता में छिटका वसंत ऋतु का सौंदर्य' भी पठनीय आलेख है। हमारा देश ऋतुओं का देश है। प्रकृति में हर ऋतु की अपनी महिमा है। लेकिन वसंत एक उत्सव के रूप में आकर धरती का श्रृंगार कर उसे सजाता है। सारा वातावरण मोहक हो उठता है। प्रकृति अपनी मोहकता से साहित्यप्रेमियों को आकृष्ट कर उनके काव्य-प्रस्फुटन की प्रेरणा बनती रही है। वसंत ऋतु उल्लास की ऋतु है। 'उल्लास' अर्थात् प्रसन्नता और हृदय की प्रसन्नता। इस ऋतु में सब प्रसन्न होते हैं। प्रकृति के साथ मन का मौसम भी उल्लासमय हो जाता है। वसंत ऋतु उल्लास की ऋतु है। 'उल्लास' अर्थात् प्रसन्नता और हृदय की प्रसन्नता। इस ऋतु में सब प्रसन्न होते हैं। हमारे बालकवि अपनी प्रसन्नता को कविता में उँड़ेल कर बच्चों के साथ साझा करते हैं। इस दिन का हमारे देश में और किन दृष्टियों से विशेष महत्त्व है यह सब इस आलेख में मिलेगा।
हिंदी बालकविता में पावस ऋतु का सौंदर्य
'हिंदी बालकविता में पावस ऋतु का सौंदर्य' अगला महत्त्वपूर्ण आलेख है, जिसमें संकलित कवियों की कविताएँ बच्चों की सृजनात्मक शक्ति को उभारेंगी। बालसाहित्य का मुख्य लक्ष्य बच्चों में छिपी उनकी रचनात्मक शक्ति को बाहर निकालना है। अच्छे बालसाहित्यकार की रचनाएँ इस उद्देश्य की पूर्ति में सदा सहायक रही हैं। भारतीय परंपरा वर्ष भर में छः ऋतुओं के चक्र को स्वीकार करती है। वर्षा ऋतु तो सबसे विशेष है। 'है वसंत ऋतुओं का राजा वर्षा ऋतु की रानी' भारत देश में वसंत को ऋतुओं का राजा कहते हैं और वर्षा को ऋतु की रानी क्योंकि इसी ऋतु में प्राणदायक अन्न उत्पन्न होते हैं। प्रकृति अपनी मोहकता से साहित्यप्रेमियों को आकृष्ट करती है। बालसाहित्य में बालकवियों ने वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौंदर्य पर ढेरों कविताएं लिखी हैं। हर मौसम की अलग ही छटा है। लेकिन वर्षा के मौसम की तो बात ही निराली है। पूरी प्रकृति कैसे निखर उठती है। चहुँ ओर पूरी धरती में कैसे बहार आ जाती है। वर्षा ऋतु बच्चों को साल का सबसे सुखद और महत्त्वपूर्ण समय लगता है। वर्षा की रिमझिम फुहार जैसे बच्चों को आनंद देती है वैसा ही आनंद उन्हें इन कविताओं को पढ़ कर मिलेगा।
हमारे बालसाहित्यकारों ने बड़ी आत्मीयता के साथ वसंत और पावस ऋतु के वैभव और सौंदर्य का चित्रण किया है। एक से बढ़कर एक अद्वितीय कविताएँ हैं जिनमें उनके प्रकृति के प्रति अतिशय लगाव का परिचय मिलता है।
कन्हैयालाल 'मत्त' की कहानी योगेन्द्रदत्त की जुबानी (साक्षात्कार)
पुस्तक में आलेखों के साथ बालसाहित्यकारों के अवदान पर प्रकाश डालते दो साक्षात्कार भी हैं। 'कन्हैयालाल 'मत्त' की कहानी योगेन्द्रदत्त की जुबानी (साक्षात्कार)' यानी पिता की कहानी पुत्र की जुबानी है। कन्हैयालाल 'मत्त' बालसाहित्य में मील के पत्थर हैं जिन पर हमारे बालसाहित्य की भव्य इमारत खड़ी है। अपने समय में देश की हर पत्रिका में आदरपूर्वक छपने वाले कन्हैयालाल 'मत्त' जी ने बच्चों के लिए ढेरों कविताएँ लिखी हैं। उन कविताओं में अलग-अलग मूड के शेड्स हैं। इनकी कविताएँ सरस हैं। इनमें हल्का-फुल्का रोचक हास्य विद्यमान हैं। कुछ कविताओं में चुटीला व्यंग्य भी है। इनकी कविताएँ बच्चों के मनोविज्ञान के निकट हैं यही कारण है कि बच्चे इन्हें बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं। मत्त जी ने कविताओं के अतिरिक्त कुछ पद्यबद्ध लघुकथाएँ भी लिखी हैं जिनकी भाषा अत्यंत सरस है। और शैली व्यंग्यात्मक जो पाठकों का विनोद करने में पूर्ण समर्थ है। कन्हैया जी ने कुछ प्रयाण-गीत भी लिखे हैं जो बच्चों के हृदय में राष्ट्रीय भावना गुड्डे-गुड़ियों के गीत भी लिखे हैं। कविताओं के अतिरिक्त मत्त जी ने बच्चों के लिए कहानी और नाटक भी लिखे हैं। इस साक्षात्कार में उनके सुपुत्र ने बड़े आत्मीयता और सम्मान के...
गोविन्द शर्मा जी से डॉ. शकुन्तला कालरा का साक्षात्कार
'गोविन्द शर्मा जी से डॉ. शकुन्तला कालरा का साक्षात्कार' साहित्य जगत में बालसाहित्यकार बालकथाकार, लघुकथाकार और एक व्यंग्यकार के रूप में चर्चित और प्रशंसित गोविन्द शर्मा के प्रदेय ने कैसे साहित्य को समृद्ध किया है। उसमें भी उनका सबसे सशक्त रूप है बालसाहित्यकार का। प्रस्तुत साक्षात्कार में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
गाँव और नगर की मिश्रित संस्कृति : प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बालकविताएँ
'गाँव और नगर की मिश्रित संस्कृति : प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बालकविताएँ' नामक आलेख में प्रभुदयाल जी के काव्य-जगत से गुजरना अत्यंत सुखदानुभूति का रहा। बालमन के अत्यंत करीब उनकी कविताओं को पढ़कर हृदय आह्लादित हो उठा। विषय को गौरवान्वित करने वाली गतिशील, देशज और लोकभाषा से ये कविताएं और भी प्राणवान हो उठी हैं। कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से प्रभुदयाल जी ऐसे दमदार कवि हैं जिनकी कविताओं का अपना रंग-ढंग है। कई-कई रंगों के शेड्स हैं। बालमनोविज्ञान से एकदम सटकर चलती दिलचस्प, मनोरंजक और रसपूर्ण ऐसी कविताएँ हैं जिनके बच्चे मुरीद हो जाते हैं। नयेपन और ताज़गी से भरपूर ये कविताएँ बच्चों के हृदय में ऐसा स्पंदन भर देती हैं कि बच्चे उन्हें पढ़कर उस आनंद को कभी भूलेंगे नहीं। यही कवि और कृति दोनों की सार्थकता है। निश्चय ही इस आलेख से शोधार्थी अत्यंत लाभान्वित होंगे।
डॉ. अजय जन्मेजय के पहेली गीत
अलग-अलग चार भागों में विभक्त 'डॉ. अजय जन्मेजय के पहेली गीत' उनकी नवीनतम कृतियाँ हैं। प्रत्येक भाग में कुल 14 पहेली गीत हैं। कविता मानव मन की अभिव्यक्ति की कला है। भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा के अनुसार काव्य की विधाओं को बंध के आधार पर दो वर्गों में रखा गया है — प्रबंध और मुक्तक। काव्य में कथा का समावेश होने से वह प्रबंधकाव्य कहलाता है। मुक्तक कविता की परिभाषा दी गई है — एक छंद में पूर्ण छंद, और चमत्कार प्रकट करने वाली अनिबद्ध काव्य मुक्तक कहलाता है। गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहा, माहिया इस दृष्टि से मुक्तक कविता है। पहेली विधा भी इसी अर्थ में मुक्तक कविता के अंतर्गत मानी जाएगी। पहेली अपने आप में चाहे वह चार पंक्तियों या छः पंक्तियों से अधिक की भी हो संपूर्ण और स्वतंत्र होती है। अगर पहेली गीत है तो यह अधिक पंक्तियों का भी हो सकता है। डॉ. अजय जन्मेजय की पहेलियाँ 24 पंक्तियों की हैं जो बच्चे की कल्पना-शक्ति को तो उभारती हैं साथ में उनसे बौद्धिक व्यायाम भी कराती हैं। उनकी बौद्धिक क्षमता को बढ़ाती भी हैं। उनके ज्ञान का वर्धन करती हैं। उनकी आई.क्यू. को तीव्रता प्रदान करती हैं। पहेली बूझकर बच्चे जो आनंद पाते हैं वह अनूठा है।
हिंदी बालकविताओं में पर्यावरण प्रदूषण की चिंता
पुस्तक का अंतिम आलेख है 'हिंदी बालकविताओं में पर्यावरण प्रदूषण की चिंता'। पर्यावरण और मनुष्य के बीच घनिष्ठ संबंध है। हमारी परंपराएँ प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने में विश्वास रखने की रही हैं किंतु आज मानव बुद्धि और विज्ञान के बल पर प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहता है परंतु यह मनुष्य की भूल है क्योंकि प्रकृति सदा से ही दुर्जेय रही है।
जीवन के पोषण के लिए प्रकृति द्वारा प्राणी मात्र को दिए उपहारों में से सबसे महत्त्वपूर्ण है पर्यावरण। हमारे कवियों ने पर्यावरण और प्रकृति को अपने काव्य का विषय बनाया है। कविता मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। बालकविताओं में पर्यावरण के नष्ट होने की चिंता है तो दूसरी ओर उसके संरक्षण के लिए बच्चों को सचेत करने का पुनीत दायित्व-बोध भी है। नष्ट होते पर्यावरण को बचाने के लिए जहाँ पूरा विश्व चिंतित है, वहाँ हमारे बालसाहित्यकार भी जागरूक हैं। उन्होंने बच्चों को अपनी कविताओं के माध्यम से पर्यावरण के खतरों से आगाह कराया है और बताया है कि कैसे हम हमारी आने वाली पीढ़ी के भविष्य को असुरक्षित बना रहे हैं। ये सब प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से हुआ है। ओजोन की परत में छेद हो गया है। वायु प्रदूषित हो चुकी है। नदियाँ सूख रही हैं। पर्वतों का स्खलन हो रहा है। तापमान बढ़ रहा है। अनेक बालकवियों ने विनष्ट होते पर्यावरण की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है और हमें हमारे दायित्वों का भी स्मरण कराया है कि आप अपने लिए पर्यावरण की रक्षा कीजिए। पर्यावरण सुरक्षित तो आप भी सुरक्षित हैं।
✧ यह आलेख-संग्रह हिंदी बालसाहित्य की विविध विधाओं, विमर्शों और योगदान को रेखांकित करता है। सभी नाम (notranslate) के साथ सुरक्षित हैं।