भूमिका: बच्चे और आप
पोलक ने कहा है — "बच्चे स्वर्ग के देवताओं की अमूल्य भेंट हैं।" इस अमूल्य भेंट की देखभाल हमें पूरे मनोयोग से करनी है। बच्चों की उन्नति में पूरे राष्ट्र की समृद्धि छिपी है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति ही नहीं वरन् उनका अस्तित्व भी बाल-शक्ति के प्रभावशाली उपयोग में निहित है। हर पत्थर में सुन्दर मूर्ति छिपी है, जिसे शिल्पी की आंख देख पाती है। वह उसे तराश कर सुन्दर मूर्ति में बदल सकता है। क्योंकि मूर्ति पहले से ही पत्थर में मौजूद होती है, शिल्पी तो बस उस फालतू पत्थर को, जिससे मूर्ति ढकी होती है, एक तरफ कर देता है और सुन्दर मूर्ति प्रकट हो जाती है। माता-पिता और शिक्षक बालक को इसी प्रकार संवार कर तराश कर खूबसूरत व्यक्तित्व प्रदान करते हैं।
एक अभिभावक के रूप में बच्चों के लालन-पालन में हमसे कहीं कोई चूक हो जाती है। कहीं हम उन्हें अति सुरक्षा प्रदान कर उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक बन जाते हैं तो कहीं ज़रा-ज़रा सी गलती पर उन्हें अपमानित, दंडित और प्रताड़ित कर उनके आत्मविश्वास को खंडित करने की भूल कर जाते हैं। उनकी रचनात्मक क्षमताओं को पहचानने की चेष्टा करने के स्थान पर अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और सपनों को उन पर थोपने की भारी गलती कर बैठते हैं। उनके विचारों एवं रुचियों को सम्मान नहीं देते। बाल-मनोविज्ञान को नहीं समझते।
बालक के विकास के लिए माता-पिता, शिक्षक की संयुक्त भूमिका है। परिवार यानी माता-पिता बच्चे के व्यक्तित्व-निर्माण की पहली पाठशाला है। शिक्षालय के वातावरण का भी बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। शिक्षण एक पुनीत कार्य है। शिक्षक का पहला और अन्तिम कर्तव्य यही है कि वे बालकों के श्रेय के लिए निष्ठा से काम करें। शिक्षण का कार्य एक समर्पण है। इसे केवल नौकरी समझना भूल है। शिक्षक को बाल-हृदय तक पहुँचना है। उनकी हित-चिंता उसका महत्त्वपूर्ण कार्य-भार है। वह ऐसा वातावरण बनाए, विद्यालय घर बन जाए। जहाँ भय न हो। सौहार्द हो। शिक्षक को भावुक, धैर्यशील एवं बच्चों की भावनाओं को समझने वाला होना चाहिए, न कि हमेशा रौब में रहने वाला कठोर तानाशाह शिक्षक।
कुछ शिक्षक बच्चों की शिकायतें प्रिंसिपल या उनके अभिभावकों को कर देते हैं। देखने में आता है पी.टी.ए. मीटिंग में बच्चे डरे-डरे स्कूल जाते हैं। अध्यापक उन्हें डराते हैं कि वे उनकी शिकायत उनके माता-पिता से करेंगे और इधर माता-पिता धमकाते हैं कि वे उनकी शिकायत उनके अध्यापक से करेंगे। परिणामतः 'पी.टी.ए. मीटिंग' का दिन बच्चों को बहुत बड़ा हौवा लगता है। दोहरे डर से सिकुड़ा बच्चा तनावग्रस्त होकर आत्मविश्वास खोने लगता है। जो बच्चा हमेशा दूसरों से शासित होता है, अथवा जिसे हर समय दंड का भय बना रहता है, उसमें हीनता मनोग्रंथि विकसित हो सकती है। वह प्रतियोगिता की सारी भावना खोने लगता है। इसमें बच्चे के आत्मसम्मान की भावना को बहुत क्षति पहुँचती है। हमें चाहिए हम बालकों के मनोविज्ञान को समझें।
बच्चे अभिभावक के लिए उसकी सबसे बड़ी पूंजी हैं। सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं। कोई भी बच्चा यदि माता-पिता के प्रेम से बचपन में ही वंचित रह जाता है या उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की जाती तो बड़े होकर उसके व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो पाता। फलस्वरूप, असुरक्षा, दमन, निराशा और पराजय जैसे भाव उनमें पनपने लगते हैं। माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चे को समय और स्नेह दें। अपना पूरा प्यार दें।
बच्चे को प्यार करने का मतलब यह कदापि नहीं कि उसे मनमानी करने दी जाए। उसे ऐसा कोई भी काम करने की छूट नहीं देनी चाहिए जिससे उसका या परिवार का कोई नुकसान हो। उसे केवल उन्हीं कामों को करने की छूट दी जानी चाहिए जो सबके लिए उपयोगी हों। परिवार के साथ, पूरे समाज और देश के लिए भी उपयोगी हों। वह जो काम करे उसमें उसे आनंद आना चाहिए। हम बच्चों को बताएं कि वे समय की कीमत को समझें। जो समय की कीमत करता है समय उसकी कीमत करता है। जो समय का अपव्यय करता है समय उसके सम्पूर्ण जीवन को निष्फल बना देता है। 'बेंजामिन फ्रैंकलिन' ने कहा है — "समय मुद्रा है" और सैकड़ों वर्षों के बाद आज भी यह उक्ति अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है। आप समय से मुद्रा प्राप्त कर सकते हैं। नई मुद्रा कमा सकते हैं। नष्ट धन पुनः प्राप्त कर सकते हैं किन्तु धन के द्वारा आप नष्ट समय को पुनः प्राप्त नहीं कर सकते।
बालक श्रेष्ठ आत्माएं हैं जो ईश्वर ने धरती पर भेजी हैं और जिनका दायित्व हमें सौंपा है। उनकी सही परवरिश, उनके व्यक्तित्व का चतुर्दिक विकास, उनके चरित्र का निर्माण हमारा पावन कर्तव्य है। उन्हें भरपूर प्यार दें। उन्हें मान्यता दें, उनके विचारों को मान्यता दें क्योंकि हम जिन्हें प्यार करते हैं उनसे मिली स्वीकृति हमारी प्रेरक शक्ति बनती है। वह हमारी सबसे बड़ी ऊर्जा है। बच्चे कभी-कभी हमसे ज़्यादा अच्छा सोच लेते हैं। इसलिए वे जब कभी हमारे किसी काम में दखल दें या सुझाव दें तो उस पर ध्यान अवश्य दें और अगर ठीक लगे तो उस पर अमल भी करें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को सही प्रेरणा, सही मार्ग-दर्शन व सही परामर्श के साथ स्वस्थ पारिवारिक एवं सामाजिक वातावरण मिले। शिक्षा-संस्थाओं की भी यह ज़िम्मेदारी है कि वे बालकों और किशोरों की ऊर्जा व क्षमता को सही रचनात्मक दिशा दें। ताकि वे भौतिक व आत्मिक विकास में संतुलन बनाने की कला सीख सकें।
“बच्चे को अपना समय और स्नेह दें” — यही सबसे बड़ी शिक्षा है।