भूमिका: भँवर (शब्द शब्द)
जीवन लोह की भांति कठोर है जिसमें ओजस्वी मयूर-नृत्य करता है। जीवन की पुर्तसौर कोशिश में आशा का दमन भामे वह उसे ठुकराता है। आदमी की सृजन-धर्मिता को कोई भी भांति लील नहीं सकता। आपदाओं और चुनौतियों के बीच ही वह जन्मी है, पलती और बढ़ती है। कविता शुद्ध आत्म-अभिव्यक्ति है, किंतु निजता कविता का साध्य नहीं हो सकती, क्योंकि अंततः कविता कोई व्यक्ति की वस्तु नहीं। वह समष्टि की है। कवि का आत्म-संघर्ष भी निजी नहीं रहता। वह अभिव्यक्ति पाते ही लोकोन्मुखी हो जाता है। आत्मोन्मुखी संघर्ष अंतर्गुहाओं में कैद होकर नहीं रह पाता। अभिव्यक्ति के बाद वह व्यक्ति का नहीं रहता। वह सबका हो जाता है।
जीवन का पूर्वार्ध यानी बचपन से किशोरावस्था जहां मन गगन तक उड़ान भरने का हौसला लेकर नभ छूने चल देता है। वह कब क्षिप्र गति से बीत गया, पता ही नहीं चला। जीवन का मध्यार्ध भोर से सांझ तक चलना बस चलना। सांसारिक दायित्वों के निर्वाह के साथ कामनाओं-महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में वह बदहवास दौड़ते-दौड़ते कब बीत गया इसका भी पता नहीं चला और अब जीवन का उत्तरार्ध यानी गंतव्य की ओर यात्रा का अंतिम पड़ाव। यात्रा मंजिल की ओर बढ़ रही है। अंतिम गंतव्य की ओर बढ़ी मंथर गति से बढ़ती है। स्वास्थ्य का शैथिल्य शरीर को शिथिल करने लगता है। जीवन का उत्तरार्ध भोग से भोगातीत की ओर, लौकिकता से अलौकिकता की ओर बढ़ती यह यात्रा एक दिन संपन्न होती है। फिर चिर विश्राम। विश्राम की तो अनुभूति बड़ी सुखद होती है। जीवन और मृत्यु दोनों से विश्राम। जीवन-यात्रा में कितनी थकान कितनी क्लांत रही। कभी सपनों और आशाओं की पूर्ति का सुख तो कभी टूट जाने की पीड़ा, किंतु जिजीविषा निरंतर प्रबल बनी रही क्योंकि प्राणी की मूल प्रवृत्ति है।
व्यक्ति जीवन के यथार्थ और समय के यथार्थ से जूझता है और जूझते-जूझते एक दिन निःशेष हो जाता है। इन्हीं क्षणों में कुछ क्षण बड़े खूबसूरत भी मिल जाते हैं। झिलमिलाते सितारों के आंगन, रिमझिम बरसते सावन का सपना जब उसकी जिजीविषा को पुष्ट करता है। अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दुःख, संयोग-वियोग, पतझड़-बहार, धूप-छांव, हार-जीत, विध्वंस-निर्माण और प्रलय-नवसृष्टि परस्पर विरोधी एवं द्वंद्वात्मक प्रकृति की आंख मिचौली की हलचल में कुछ पल ऐसे आ जाते हैं जब मन उद्वेलित होता है, आकुल होता है अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देने के लिए। यह छटपटाहट उसे बेचैन करती है और यही बेचैनी शब्दों में फूट पड़ती है। न्योछावर कविता बन जाते हैं।
इन कविताओं में युगबोध है या नहीं, नहीं जानती लेकिन ये जीवन का आईना जरूर हैं। इनमें तार्किक अनुभवों के दोहन से प्राप्त नवनीत भी हैं और छाछ भी। पुष्ट अनुभव-जन्य कांटों की तीक्ष्ण चुभन भी है और कोमल मधुर-भाव-सुमनों का सुभग संस्पर्श भी। यही तो जीवन की संपूर्णता है।
— शब्द शब्द में जीवन की सारी छटा बिखरी है ।
डॉ. शकुंतला कालरा · डी-लिट्