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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

मिट्ठी की चिट्ठी · चाँद के नाम

प्राक्कथन / निवेदन: मिट्ठी की चिट्ठी चाँद के नाम

बीते समय की यादें · माँ के नाम चिट्ठियाँ

बीता समय कभी वापस नहीं आता। शेष रह जाती हैं उसकी यादें। बीते समय की तरह वे लोग भी वापस नहीं आते जो इस दुनिया से चले जाते हैं। शेष रह जाते हैं उनके साथ बिताए पल-पल के अहसास। मिट्ठी की माँ आज इस संसार में नहीं हैं। वह बहुत कम समय मिट्ठी की जिंदगी में रहीं लेकिन उसकी यादों में वह आज भी जिंदा है। माँ से जुड़ा हर अहसास उसके दिल में, उसकी आँखों की गहराई में कैद है। जब आपका कोई भी प्रियजन आपके साथ रहता है तब आप उसके प्यार की तरफ ध्यान नहीं देते। उसे सहज प्राप्य वस्तु समझकर उसके महत्त्व की ओर ध्यान ही नहीं देते है। उसकी छोटी-छोटी बात पर नाराज हो जाते हैं। उससे रूठ जाते हैं। मनाने पर भी नहीं मानते। उन्हें भावनात्मक ब्लैकमेल करते हैं। न कभी किसी बात का धन्यवाद करते हैं और न आभार प्रकट करते हैं। न कहीं सॉरी महसूस करते हैं। यही बाल-स्वभाव है और यही मानव स्वभाव भी है।

किंतु जब वही प्रियजन बिछुड़ जाता है तो आपको उन तमाम मधुर क्षणों की याद आती है जो आपने उनके साथ बिताए थे। वे क्षण कितने मूल्यवान थे, उसका अहसास आपको तब होता है जब वे दुर्लभ बन जाते हैं। इसी तरह वे पल भी अविस्मरणीय बन जाते हैं। जब हम उनसे रूठकर, हठकर, मनमानी कर उन्हें दुःख पहुँचाते हैं। हम उनसे क्षमा माँगना चाहते हैं पर अब वे हमारे लिए अगम्य बन चुके होते हैं। यही स्थिति मिट्ठी की है। अपनी माँ की मृत्यु के बाद एकाकीपन उसे बहुत सालता है। वह कल्पनालोक में माँ के साथ ऐसे संवाद करती है जैसे माँ उसके साथ उसके पास बैठी है। उसकी हर बात सुन रही है। उसके हर प्रश्न का जवाब दे रही है। अपने अकेलेपन को वह माँ के साथ बाँटती है। माँ उसे अकारण ही याद आती रहती है। खेलते वक्त चोट लगने पर जब आँसू रुकने का नाम ही नहीं लेते। टीचर कभी डाँट देती है तो रुआँसी होकर उसे याद करती है। रात को जब नींद नहीं आती तो माँ का दुपट्टा माथे पर रखकर उसके कोमल मर्मांतक स्पर्श को याद करती-करती कब सपनों में खो जाती है जहाँ माँ उसे लोरी गाकर सुला रही है। मिट्ठी महसूस करती है कि उस दुपट्टे में उसे माँ के आँचल का वही सुख मिल रहा है।

अहसासों को, यादों को चंद शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता पर — मिट्ठी माँ को चिट्ठियाँ लिखकर अपने अहसासों को उनके साथ साझा करती हैं। वैसे तो माँ की यादों से जुड़ा हर दिन मिट्ठी के लिए अब 'खास' बन चुका है पर कोई-कोई दिन तो अति विशिष्ट बनकर मिट्ठी की जिंदगी में रच-बस गया है। हृदय पर अमिट रूप से अंकित वे पल इन चिट्ठियों में आपको झाँकते मिलेंगे। सभी चिट्ठियाँ मिट्ठी के बचपन की स्मृतियों का प्रतिबिंब हैं। मातृस्नेह-वंचित मिट्ठी परिवार के स्नेहिजनों के बीच भी अपने को अकेला पाती है। दादी और बुआ के स्नेह से यद्यपि इस अकेलेपन की बेशक कुछ भरपाई होती है, लेकिन वह अस्थायी है। उसकी यह प्यास जीवन भर बनी रहती है।

इन चिट्ठियों में नन्ही मिट्ठी ने अपने हृदय के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए हैं। ये चिट्ठियाँ हल्के-फुल्के प्रभावशाली अंदाज़ में नहीं लिखी गईं। बहुत सुन्दर चिट्ठियाँ हैं, मिट्ठी अपने हृदय की गहराइयों में उतरती है। वह बहुत संवेदनशील तरीके से उन समस्त छवियों को ढूँढ़ती है। ये कोरी कल्पना नहीं। इसमें मिट्ठी का हृदय उतरा है। इन चिट्ठियों में मिट्ठी के उस बचपन का ब्यौरा भरा पड़ा है जो उसने माँ के साथ बिताया है। जहाँ उसने जाने-अनजाने अपनी शैतानियों से माँ को खिझाया और परेशान किया है। उसका कहना नहीं माना। सदा मनमानी की है। वह एक बिगड़ैल और ज़िद्दी बच्ची रही है। जब तक माँ उसके साथ रही, उसे उसके प्यार का, ममता का, त्याग, सेवा और समर्पण का अहसास नहीं होता। पर अब उस आनंद, उत्सव और प्रकाश की याद आती है जो माँ ने उसके जीवन में भरा था। माँ की मृत्यु के समय उसकी उम्र केवल नौ-दस वर्ष की थी। माँ की मधुर यादों में खोई मिट्ठी दिन के उजाले में और रात के अंधेरे में हर पल माँ से संवाद करती है। रोज़ माँ को एक पत्र लिखती है। कुछ पत्र उसने दिन में कागज़ पर उकेरे हैं और कुछ रात में तारों की छाँव में बैठकर माँ से संवाद करते हुए अपने दिल में अंकित किए हैं। उन्हें वह चंदा के पते पर भेजती है क्योंकि मिट्ठी को विश्वास है कि माँ तारा बनकर आकाश में चंदा के साथ चमकती है। चंदा और माँ का नित संवाद होता है। मिट्ठी चंदा से प्रार्थना करती है कि वह ये पत्र माँ तक पहुँचा दे। मिट्ठी के कुछ चुनिंदा पत्र इस उपन्यास में हैं। पर्व, त्यौहारों पर तो मिट्ठी को माँ की बहुत याद आती है। वह उस दिन माँ को पत्र लिखती है। माँ के बिना सब त्यौहार उसे फीके, नीरस और बेरंग लगते हैं। मां के स्नेहित स्पर्श और ममता की गंध से वह कभी मुक्त नहीं हो पाती और न ही मुक्त होना चाहती है क्योंकि यही उसकी पूँजी है, यही उसका मनोबल है। उसकी ऊर्जा है।

आइए, पढ़ते हैं इन पत्रों से झाँकता मिट्ठी का बालमन &


डॉ० शकुंतला कालरा, डी-लिट्
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: एन-डी-57, पीतमपुरा दिल्ली-110034 मो: 8287479455 लैंडलाइन: 011-41677475

“मिट्ठी की चिट्ठी” — माँ के नाम अहसासों की अमर पोथी।

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