पुरोवाक् · विनयपत्रिका (भाव एवं कलागत मूल्यांकन)
वाल्मीकि के राम ऐतिहासिक महामानव थे, उन्होंने घर-परिवार, समाज और अखिल मानवता के समक्ष त्याग, स्नेह और शील के उच्च आदर्श प्रस्तुत किये थे। आगे वाल्मीकि की कथा युग के अनुसार नये-नये मोड़ स्वीकार करती हुई निरन्तर विकसित होती गयी। तुलसी ने जिस राम का चित्रण किया वह वाल्मीकि-रामायण की विकसित कथा के ऐसे नायक हैं जो भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ उपादान अपने में समाहित किये हैं। उनका रामचरितमानस ग्रन्थ पिछली कई शताब्दियों से कोटि-कोटि जनों को गहराई से प्रभावित करता रहा है।
कई विद्वानों की दृष्टि में साहित्यिक सौन्दर्य की दृष्टि से गोस्वामी तुलसीदास की विनयपत्रिका एक श्रेष्ठ ग्रन्थ है। इसके रूप में तुलसी ने साहित्यक्षेत्र में शिल्पगत नया प्रयोग किया है। यह विनयपत्रिका अर्जी या एप्लिकेशन है जो राजराजेश्वर राम की राजसभा में कलियुग से पीड़ित तुलसी ने प्रस्तुत की है। पूरे सांग-रूपक का निर्वाह महाकवि ने किया है। राजभवन तक पहुँचने के लिए सात ड्योढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। राम के भवन तक पहुँचने के लिए प्रत्येक ड्योढ़ी पर विराजमान एक-एक देवता की वन्दना तुलसी ने की है। राजभवन में राम के अंग-रक्षक चारों भाइयों की भी स्तुति की गयी है। तुलसी ने एक व्यवहार-कुशलता भी दिखायी है। पति पर धर्म-पत्नी का प्रभाव होता ही है, सो महाकवि ने सीतामाता को भी पटाने की जुगति कर ली है— "माता, कभी अनुकूल अवसर देखकर मेरी भी सुधि करा देना।" तुलसी कोई फाँक नहीं रहने देना चाहते। वे अच्छी तरह ठोंक-बजाकर ही विनयपत्रिका प्रस्तुत करते हैं। राम से उनका अनुरोध है— "प्रभु, आप स्वयं इस दीन की पत्रिका पढ़ो।"
इस प्रकार पूरी तैयारी के साथ विनयपत्रिका राजसभा में प्रस्तुत होती है। सभी सभासद् पक्ष में बोलते हैं। राम को सीता की सिफारिश की भी याद है। वे हँसकर इस पर सही कर देते हैं।
कुछ लोग भ्रम अथवा दुराग्रह के कारण तुलसी को चाटुकार समझने की भूल कर सकते हैं। यह तो अत्यन्त सुशील और सहृदय ब्रह्म राम के प्रति समर्पित भक्त का निष्कपट और निःस्वार्थ आत्म-निवेदन है। राम यदि जीवित होते तो सोचा जा सकता था कि तुलसी किसी लोभ के कारण चापलूसी कर रहे हैं। वह तो राम के गुणों पर रीझ-रीझ कर सच में स्वान्तः सुखाय के लिए आत्म-निवेदन में लीन हैं। उन्होंने सुगति-सुमति-सम्पत्ति-ऐश्वर्य-कीर्ति आदि किसी की भी तो कामना नहीं की है, वे चाहते हैं प्रभु के चरणों में अहैतुक अनुराग—
चहौ न सुगति सुमति संपति कछु रिधि सिधि बिपुल बड़ाई।
हेतु रहित अनुराग नाय पद बढ़ी अनुदिन अधिकाई ॥
विनयपत्रिका के अधिकांश गीतों में निर्वैयक्तिकता है। तुलसी अपनी दुर्बलताओं का जो वर्णन करते हैं वे किसी भी मानव की दुर्बलताएं हो सकती हैं। उनका कथन है— "मैं दूसरों की विपत्ति देखता हूँ तो सुख मिलता है। दूसरे की सम्पत्ति देखता हूँ तो जलन होती है। मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे पूजें, आदर दें, किन्तु मैं किसी को आदर नहीं देता। मैं सारे जीवन सुख-सुविधाओं की प्राप्ति में जुटा रहा, किन्तु मुझे उसी प्रकार सुख नहीं मिला, जिस प्रकार कि कोई व्यक्ति बिछौना बिछाने के सरंजाम में उलझा रहे, इसी में रात बीत जाए और वह सो न सके।"
डासत ही गई बीति निसा सब, कबहुँ न नाथ! नीन्द भरि सोयो।
वह प्रभु राम को मनाने के लिए भी तरह-तरह की युक्तियों-उक्तियों का प्रयोग करते हैं— "यह मेरी मजबूरी है कि मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप जैसा कोई है ही नहीं। यदि आपको मुझसे घिन लगती हो तो अपने-जैसे किसी और को सौंप दीजिए। यह भी तो हो सकता है कि मेरे जैसे अधम से अपने को जोड़ने में आपको संकोच हो रहा हो तो प्रकट रूप में कुछ न कहकर मुझे मन ही मन अपना लीजिए।"
विनयपत्रिका में भाव-गाम्भीर्य है तो उसकी सशक्त अभिव्यक्ति भी है। तुलसी ने लोक-प्रचलित सटीक बिम्बों का प्रयोग किया है। एक उदाहरण—
सदा मलीन पंथ के जल ज्यों कबहुँ न हृदय थिराने।
रास्ते का पानी कभी स्थिर होकर स्वच्छ नहीं हो पाता, क्योंकि कोई न कोई वाहन या जन्तु उसे गँदला करता रहता है। इसी प्रकार मन भी सदैव अस्थिर और मलिन रहता है।
कई स्थलों पर तुलसी ने ऐसी बातें कह दी हैं जिन्हें आज का मनोविज्ञान बताता है— जैसे पेड़ में पुतली छिपी होती है और सूत में वस्त्र, उसी प्रकार मन में अनेक तन छिपे रहते हैं, जो अवसर आने पर प्रकट हो जाते हैं। एक प्रकार से मानव के अवचेतन की बात तुलसी कर गये हैं—
बिटप मध्य पुतरिका, सूत-महँ कचुकि बिनहिं बनाये।
मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥
ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ का अध्ययन-विश्लेषण कर डॉ॰ शकुन्तला कालरा ने प्रशंसनीय कार्य किया है। तुलसी के काल की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक और दार्शनिक परिस्थितियों का सारगर्भित विवेचन करते हुए उन्होंने विनयपत्रिका का रचनाकाल संवत् 1631 से 1679 के मध्य का माना है। उन्होंने विनयपत्रिका की प्रतियों, टीकाओं आदि का परिचय भी दिया है। लेखिका की दृष्टि में विनयपत्रिका में एक क्रम है। 'यह तुलसी की व्यक्तिगत अनुभूति तक सीमित नहीं है। इसमें समस्त लोक-मानस की अभिव्यक्ति है।'
तुलसी के दार्शनिक सिद्धान्तों का विवेचन कर लेखिका ने निष्कर्ष दिया है— 'तुलसी के दार्शनिक दृष्टिकोण की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह समाज और जीवन के अभिमुख है। मनुष्य को संसार से विमुख या विरत नहीं करता वरन् संसार में रहते हुए संसार के मोह-माया के बन्धनों से मुक्त होने पर ज़ोर देता है।'
भक्तिभावना का विवेचन कर डॉ॰ कालरा ने ठीक ही निष्कर्ष दिया है— 'वास्तव में तुलसीदास ने भक्ति की पृष्ठभूमि पर मानवतावाद का सन्देश दिया है।'
रस-निरूपण में लेखिका का यह कथन भी सत्य है कि तुलसी ने भक्ति को भावदशा से उठाकर रस-दशा तक पहुँचाया है।
शिल्प-विधान के अन्तर्गत डॉ॰ शकुन्तला ने विनयपत्रिका की गीतिकाव्य की कसौटी पर खरा मानकर तुलसी को महान् सङ्गीतज्ञ सिद्ध किया है; उन्होंने विनयपत्रिका के छन्द, भाषा और अलङ्कारों का भी सम्यक् निरूपण किया है। भक्ति-गीतों की परम्परा में तुलसीदास एवं विशिष्ट कवियों का परस्पर तुलनात्मक अध्ययन करते हुए विनयपत्रिका का महत्त्वपूर्ण स्थान निर्धारित किया है।
विदुषी लेखिका ने सारगर्भित शैली अपनायी है। पुस्तक में कहीं व्यर्थ विस्तार नहीं है। उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में स्वीकृत तुलसी-साहित्य के अध्येता और अध्यापकों तथा शोधकर्ताओं के लिए यह पुस्तक उपादेय है। तुलसी ने जिन मूल्यों का प्रचार किया वे शाश्वत हैं। उनका विवेचन युग की परिस्थितियों के अनुसार निरन्तर होते रहना चाहिए। इस प्रकार के प्रयास में डॉ॰ शकुन्तला कालरा का योगदान अभिनन्दनीय है।
26, वैशाली, पीतमपुरा, दिल्ली-110034
— डॉ॰ रामनाथ त्रिपाठी
भूमिका
प्रत्येक मनुष्य में अपनी विशिष्ट अनुभूति को दूसरे तक सम्प्रेषित करने की दुर्निवार लालसा सन्निहित रहती है जो उसकी विचार सम्पत्ति को सर्वजन सुलभ बना देती है। वह अपनी अनुभूतियों, भावों एवं विचारों का साधारणीकरण करने के लिए सदा लालायित रहता है। कोई अदृश्य शक्ति साधारणीकरण करने के लिए उसे व्याकुलता की सीमा तक प्रेरित करती है। तुलसी के हृदय में स्थित रामभक्ति ही उनके उत्तमकाव्य की प्रेरणा-शक्ति है। जो शक्ति मनुष्य को सामाजिकीकरण की ओर उन्मुख करती है, उसी से कविता का सृजन होता है और तदनुसार जीवन और जगत् में भीगे हुए एवं देखे गए सत्य को आधार बनाकर वह काव्यरचना में प्रवृत्त होता है। कविता मार्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है। कवि के जीवन की मार्मिक घटनाएँ ही उसे काव्यरचना करने की प्रेरणा देती हैं। रचनाप्रक्रिया के क्षणों में कवि अपने व्यक्तित्व से ऊपर उठ जाता है और उसकी अनुभूति सार्वजनीन हो जाती है। देश-काल से परे होकर सार्वभौम बन जाती है। तब कविता स्वतः रूप उसके हृदय से निकलकर बहने लगती है। वैयक्तिक तत्त्वों का निरसन हो जाता है और जब लोककल्याण काव्य की प्रेरणा हो तो साहित्य में शिवं की सृष्टि होती है। 'कीरति, भनिति, भूति' की सर्वहितय मानने वाले तुलसीदास के काव्य की रचना 'शिव' के लिए हुई। कवि जब समष्टि की इच्छा को साथ लेकर चलता है तो 'सुन्दर की सृष्टि होती है। 'सुरसरि सम सबकर हित होई' के आदर्शवाहक तुलसीदास के मन में जनकल्याण की चेतना काम कर रही थी। इसी सामाजिक मङ्गल की चेतना से परिचालित उनका काव्य सत्य को उजागर करता हुआ 'शिव' एव 'सुन्दर' से पूर्ण है। 'सत्यं शिवं सुन्दरं' की त्रिवेणी में स्नान करके तुलसीदास की कविता पावन हो उठी और पावन के स्पर्श से सहृदय पाठक भी पावन हो उठता है।
भक्ति रस की उत्कृष्ट कृति 'विनयपत्रिका' न केवल तुलसीदास की पत्रिका है वरन् कलिकाल से त्रस्त हर जीव की पत्रिका है जो राम की शरणागति प्राप्त करके अपने जीवन को सफल बनाना चाहता है। जिस समय तुलसीदास का आविर्भाव हुआ उस समय सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक स्तर पर विघटन, अनास्था और अवमूल्यन की स्थिति थी। कलिकाल के रूप में तुलसीदास ने युगीन-परिस्थितियों का अङ्कन किया। 'विनयपत्रिका' में वर्णित तुलसीदास का कलियुग आधुनिक युग पर पूर्णतया घटित होता है। आज घुटन, अतृप्ति, असन्तोष, अविश्वास से विचलित मनःस्थिति, विघटनात्मकता पूरे विश्व में चहुँ ओर व्याप्त है। अतः इस कथन में कहीं भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तुलसीदास के कलियुग में आधुनिक परिवेश ही प्रतिध्वनित और प्रतिबिम्बित हुआ है। कलिकाल से पीड़ित मानव का राम की शरण में जाना ही उसे सभी समस्याओं से मुक्ति दिलाकर एक शान्त, सुखद एवं निश्चित ज़िन्दगी दे सकता है। उसके लिए शीतल अवलेप का काम करता है। राम केवल व्यक्ति नहीं, यह आस्था का बीज है। आस्था से बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। तुलसी के समय मध्ययुग आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्ण पराभव पर था पर तुलसीदास की राम के प्रति आस्था अडोल थी। 'मति राम सों गति राम सों' की बार-बार एक ही घोषणा करने वाले तुलसीदास के काव्यसन्देश ने राजनैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक सभी स्तरों पर हमारी रक्षा की है। यही कारण है कि उनकी काव्यकला केवल क्षणिक ज्योति विकीर्ण करके ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् काल और सीमाओं का अतिक्रमण कर विश्वजनीन बन गई है।
धर्म की माङ्गलिक चेतना से अनुप्राणित इस कृति में तुलसीदास ने भक्ति, नीति और दर्शन आदि सूक्ष्म तत्त्वों को समाहित किया है। लोककल्याण के आदर्श के पोषक एवं युगद्रष्टा तुलसीदास ने रामभक्ति के साधन-रूप में मङ्गलकारी मानवधर्म की निबन्धना करके सनातन धर्म एवं दर्शन का प्रतिपादन किया है। सभी दार्शनिक मतवादों से आध्यात्मिक प्रेरणा ग्रहण करते हुए अपूर्व सामञ्जस्य का प्रदर्शन किया है और रामभक्ति के ऐसे सूत्रों में समेटकर बाँध लिया जो भेद से अभेद की ओर ले जाता है।
विनयपत्रिका भक्ति और दर्शन की दृष्टि से भक्तों, विचारकों और दार्शनिकों में अत्यन्त लोकप्रिय है। 'रामचरित मानस' जितना जनता में लोकप्रिय है उतना साहित्यिक क्षेत्र में भी। जनता के सामान्य एवं विशिष्ट वर्ग में तुलसी की समान लोकप्रियता का प्रधान आधार उनके यही दी ग्रन्थ रहे हैं। दोनों में काव्य और अध्यात्मक का अद्वितीय समन्वय है जो तुलसीदास के काव्य की शाश्वत महत्त्व और स्थायित्व प्रदान करता है।
किसी भी कृति के दो ही प्रबल पक्ष हैं कथ्य या संवेदन और शिल्प या अभिव्यक्ति। प्रस्तुत पुस्तक में दोनों दृष्टियों से विनयपत्रिका का साङ्गोपाङ्ग विवेचन एवं मूल्याङ्कन प्रस्तुत किया है जो छह अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में तुलसी युगीन-परिस्थितियों के साथ-साथ उनकी प्रामाणिक रचनाओं पर संक्षेप में प्रकाश डाला है। समन्वय की सुदृढ़ भूमि पर प्रतिष्ठित तुलसी के दार्शनिक विचारों की विशद व्याख्या द्वितीय अध्याय में की गई है। दर्शन और काव्य का अभिन्न योग तुलसीदास के कवि-कर्म की महती विशेषता है। काव्य और दर्शन को अलग-अलग करके न तो विनयपत्रिका' का ही सही मूल्याङ्कन हो सकता है न सहृदय पाठक तुलसीदास के साथ न्याय कर सकता है। प्रस्तुत अध्याय में तुलसी-युगीन दार्शनिक-चिन्तन धाराओं के परिप्रेक्ष्य में तुलसी के दर्शन और उन पर विभिन्न सम्प्रदायों के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए विनयपत्रिका' में प्रतिपादित ब्रह्म, जीव, जगत्, माया, मोक्ष सम्बन्धी विचारों की विश्लेषणात्मक व्याख्या प्रस्तुत की गई है। विनयपत्रिका के अध्ययन-विवेचन से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि तुलसीदास ने ब्रह्म, जीव, जगत् तत्त्व को केवल समझा ही नहीं वरन् दर्शन को जीवन में भी ढाला है और यही उनके दर्शन की सफलता एवं उनके विवेचन का लक्ष्य भी है। तत्त्व-दर्शन सफल भी तभी है जब वह जीवन-दर्शन के रूप में हमारे सामने आए। इस दृष्टि से तुलसीदास को जीवन-द्रष्टा कह सकते हैं, लोक-द्रष्टा कह सकते हैं। उनकी समग्र साधना लोक-हित के लिए थी। तुलसीदास का दर्शन जगत् को राम-रूप में अनुभव कराके परस्पर विरोध को समाप्त कर मानवतावाद की प्रतिष्ठा करता है। 'सीयाराम मय सब जग' के आदर्श-वाहक तुलसीदास ने हमें यही आदर्श दिया कि घट-घट वासी का रूप तुम सब में समान रूप से समाहित हो रहा है। उन्होंने राम तक पहुँचने का मार्ग इसी लोक-जीवन के मध्य से जाता हुआ प्रत्यक्ष दिखा दिया है।
तृतीय अध्याय में विनयपत्रिका के आधार पर तुलसीदास की भक्ति-भावना के स्वरूप-निर्धारण का प्रयास किया है। मानव मात्र को परम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए 'श्रुति-सम्मत हरिभक्तिपथ' की ही सर्वाधिक प्रशस्त किया। उनकी भक्ति भारतीय परम्परा से सम्बन्धित हैं, उसमें व्यक्ति और लोककल्याण दोनों का समन्वय है। उनकी भक्तिभावना मानव-मूल्यों में पर्यवसित होकर चिरन्तन रूप धारण कर लेती है। वास्तव में तुलसीदास ने भक्ति की पृष्ठभूमि में भी मानवतावाद का सन्देश ही सम्प्रेषित किया है। इसी अध्याय के अन्तर्गत भक्ति के विभिन्न साधनों का उल्लेख करते हुए तुलसी की प्रपत्त्यात्मक भक्ति का विवेचन किया गया है। ज्ञान और भक्ति का सामरस्य तुलसी का प्रतिपाद्य है जिसकी स्थापना विनयपत्रिका के अनेक पदों में हुई है। यह हम दावे के साथ कह सकते हैं कि भक्तिभावना की ऐसी एकरूपता, एकसूत्रता और ऐसा तारतम्य हिन्दी साहित्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। भक्तिप्रसूत विनय के प्रतिपादन में विनयपत्रिका तुलसी की रचनाओं में ही नहीं हिन्दी-साहित्य में भी अद्वितीय है।
चतुर्थ अध्याय में विनयपत्रिका का शुद्ध भक्तिरस एवं मिश्रित रस की दृष्टि से विवेचन किया गया है। तुलसीदास रसवादी कवि हैं, विनयपत्रिका कवि का भक्तिरस का काव्य है जिसमें आद्यन्त भक्तिरस की अभिव्यक्ति हुई है। भक्ति-इतर रस भी भक्ति में पोषक बनकर आए हैं।
विनयपत्रिका भावप्रवण कवि का आत्म-निवेदन है जिसका काव्य-सौन्दर्य हृदय की सच्चाई पर निर्भर है, बाह्यशिल्प योजना पर नहीं। भावपक्ष की सुन्दरता को ही सर्वोपरि मानने वाले तुलसीदास कलापक्ष एवं शिल्पपक्ष के सौन्दर्य के प्रति भी उदासीन नहीं रहे।
पंचम अध्याय शिल्प-योजना से सम्बन्धित है जिसमें विनयपत्रिका के काव्यरूप का निर्धारण करते हुए गीतिकाव्य के तत्त्वों के आधार पर विनयपत्रिका का मूल्याङ्कन किया गया है। विभिन्न राग-रागनियों में बँधे इसके पद गहरी सघन आत्मानुभूति के परिचायक हैं। कवि के निश्चल आत्मनिवेदन का जैसा साहित्यिक और प्रगीतात्मक स्वरूप विनयपत्रिका में उपलब्ध होता है, वैसा हिन्दी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। इसी अध्याय में विभिन्न राग-रागनियों में निबद्ध विनयपत्रिका में प्रयुक्त छन्दों का भी विवेचन किया गया है। विनयपत्रिका के सभी पद छन्दों की ताल और सङ्गीतात्मकता में बँधे हुए हैं जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि तुलसीदास का सङ्गीत और छन्दशास्त्र दोनों पर समानाधिकार था जो एक विशेष स्थिति है। सामान्यतः एक सङ्गीतकार काव्यशास्त्र का ज्ञाता नहीं होता और एक कवि काव्यशास्त्र का ज्ञाता होकर भी सङ्गीतशास्त्र से नितान्त अपरिचित अथवा कम परिचित होता है। तुलसीदास के साथ ऐसा नहीं था। इसलिए वह सामान्य न होकर विशिष्ट हैं। इसी अध्याय के अन्तर्गत ही तुलसी के भाषा-विषयक दृष्टिकोण के सन्दर्भ में विनयपत्रिका की भाषा का विभिन्न दृष्टियों से विवेचन किया है। विषय-प्रतिपादन और भाषा-चयन दोनों में उनकी अद्भुत प्रतिभा एवं पाण्डित्य का परिचय मिलता है। लोक-मङ्गल की भावना से प्रेरित होकर ही उन्होंने अवधी और ब्रज में काव्य रचना की। उस युग में जब राजभाषा फ़ारसी थी विद्वज्जन संस्कृत में ही काव्य रचना करते थे, ऐसे में ग्राम्य बोलियों का उद्धार करके उनमें श्रेष्ठ काव्य की रचना करना उनकी अद्भुत भाषा-शक्ति का परिचायक होने के साथ-साथ उनकी प्रगतिशीलता को भी दर्शाता है। तुलसीदास की जनबोलियों की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि उन्होंने अवधी और ब्रज दोनों जनभाषाओं को साहित्यिक सांचे में ढाला है। विनयपत्रिका की भाषा यद्यपि ब्रज-बहुल है किन्तु उसमें अन्य बोलियों के रूप भी विद्यमान हैं। तुलसीदास ने लोकमङ्गल की सिद्धि के लिए लोकभाषा में काव्य की रचना की, साथ ही एक शास्त्र-सिद्ध कवि की तरह संस्कृत की तत्सम पदावली का भी यत्रतत्र प्रयोग किया है। विनयपत्रिका की भाषा संस्कृतनिष्ठ है। तुलसी के संस्कृत-प्रयोग की विशेषता यह है कि उन्होंने संस्कृत को लोकभाषा के निकट लाने का प्रयत्न किया है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि भाषा पर तुलसीदास का असाधारण अधिकार था। भावों के उत्कर्षवर्धक अलङ्कारों का किस चारुता के साथ विनयपत्रिका में निर्वाह हुआ है इसका अध्ययन भी इसी अध्याय में किया गया है। रसवादी कवि तुलसीदास काव्य में अलङ्कारों की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने सर्वत्र साधन रूप में ही अलङ्कारों का प्रयोग किया है, साध्य रूप में अलङ्कार उनके काव्य में कभी नहीं आए।
शिल्पविधान के सभी उपकरणों का विस्तृत विवेचन-विश्लेषण करने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि विनयपत्रिका भक्ति, दर्शन एवं कवित्व का अनूठा सङ्गम है। जैसा उनका कथ्य सुन्दर एवं उदात्त है तदनुरूप ही सुन्दर शिल्प-विधान है। इस कृति में अनुभूति और अभिव्यक्ति अर्थात् कथ्य और शिल्प का मञ्जुल समन्वय उपलब्ध होता है।
षष्ठ अध्याय में, जो कि उपसंहार के रूप में हैं भक्त्यात्मक गीतों की परम्परा के परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट कवि विद्यापति, कबीर, रैदास, धरनीदास, गुरुनानक देव, सूरदास, मीरा, भारतेन्दु, निराला आदि के साथ तुलसीदास का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए विनयपत्रिका का भक्ति-गीतों की परम्परा में स्थान निर्धारित प्रस्तुत करते हुए विनयपत्रिका का भक्ति-गीतों की परम्परा में स्थान निर्धारित किया है।
विनयपत्रिका के सन्दर्भ वियोगीहरि की हरितोषीणी टीका से दिए गए हैं। तुलसी की अन्य कृतियों के सन्दर्भ गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित संस्करणों के अनुसार हैं।
विनयपत्रिका के इस विवेचन में जिन टीकाकारों, मर्मज्ञ आलोचकों, मनीषियों से मैंने यथेष्ट लाभ उठाया है मैं उनकी आभारी हूं।
रामकथा के मर्मज्ञ एवं सुयोग्य विद्वान डॉ॰ रामनाथ त्रिपाठी जी दृष्टि-शक्ति की क्षीणता के बावजूद इसे खुशी-खुशी आदि से अंत तक बड़ी बारीकी से पढ़ गए और इसका 'पुरोवाक्' लिखकर उन्होंने मुझे कृतार्थ किया। उनकी वत्सल छाया को अपना अधिकार मानते हुए मैं उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित नहीं करूंगी। एक स्नेही पिता की तरह उन्होंने जो श्रम किया वह मेरे लिए अत्यन्त आह्लाद, सन्तोष एवं गौरव का विषय है। मैं गुरु-चरणों में श्रद्धा से नत शिर हूँ।
मैं विद्यावती प्रकाशन, दिल्ली के प्रबन्धक संजय कुमार सिंह का भी धन्यवाद करती हूँ, जिन्होंने रुचि लेकर इस पुस्तक की प्रकाशित करने का प्रबन्ध किया।
इस अवसर पर मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों को विशेष कर अपने पति श्री मनमोहन जी एवं प्रिय पुत्रों गौरव और वैभव को कैसे भूल सकती हूँ जिन्होंने मेरे अध्ययन के कारण होने वाली असुविधाओं को ध्यान में न रखते हुए मुझे अध्ययन का उचित वातावरण प्रदान किया।
अंत में दो शब्द और। कोई भी प्रयास अपने आप में पूर्ण नहीं होता। प्रत्येक की कुछ निश्चित सीमा होती है, फिर भी मेरा यह विश्वास है कि प्रस्तुत पुस्तक विनयपत्रिका के कथ्य एवं शिल्प का पूर्ण परिचय देने में सहायक सिद्ध होगी और इससे तुलसी प्रेमियों एवं विनयपत्रिका के शोध-कर्ताओं को विचार की नवीन दिशा मिलेगी। अस्तु, रामकृपा से भविष्य में कुछ और भी सुधी पाठकों को भेंटकर सकूं इस आशा के साथ।
14 फरवरी, 1999
महाशिवरात्रि
— डॉ॰ शकुन्तला कालरा