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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
◈ साहित्यिक संग्रह — हिन्दी साहित्य ◈

मॉरीशस में भारत · डॉ॰ शकुन्तला कालरा

मॉरीशस में भारत

शुभकामना · डॉ॰ रामनाथ त्रिपाठी

आज से लगभग 40-45 वर्ष पूर्व मैंने पत्रिकाओं में छपे लेखों से जानकारी प्राप्त की थी कि क्रूर और दुष्ट अंग्रेज भारत के असहाय और निर्धन मजदूरों को धोखा देकर मॉरिशस, फीजी, सूरीनाम, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, ट्रिनिडाड आदि देशों को ले गये थे। वहाँ उन पर भयावह अत्याचार किये गये। उन्होंने सब कुछ सहा, किन्तु अपने धर्म और संस्कृति का परित्याग नहीं किया। उन्होंने 'रामचरितमानस' और 'हनुमान-चालीसा' से सम्बल और प्रेरणा प्राप्त कर आततायी शक्ति के विरुद्ध संघर्ष किया। अन्ततः उन्होंने विजय प्राप्त की।

मैंने मॉरिशस की तीन बार यात्राएँ कीं। मुझे भारत सरकार ने राम-साहित्य के विशेषज्ञ के रूप में वहाँ भेजा। मैंने मॉरिशस के सम्बन्ध में बड़ी-बड़ी जनसभाओं और साहित्यिक गोष्ठियों में भाषण दिये हैं। आकाशवाणी से भी मेरे भाषण प्रसारित हुए हैं। मेरे यात्रा-वृत्तान्त 'हिम किरीट से सागर में' मॉरिशस से सम्बन्धित लेख प्रकाशित हैं। उ॰प्र॰ हिन्दी संस्थान ने इस पुस्तक पर मुझे 'अज्ञेय सम्मान' दिया था।

डॉ॰ शकुन्तला कालरा ने मुझे अपना यात्रा-वृत्तान्त 'मॉरिशस में भारत' पढ़ने को दिया। मैंने अपनी तीन बार की यात्राओं में जो कुछ देखा है उसे शकुन्तला जी ने अपनी एक यात्रा में देखने का प्रयास किया है। उनका वर्णन ऐसा रोचक और चित्रात्मक है कि मुझे लगा कि मैं दिल्ली में बैठा हुआ चौथी बार मॉरिशस की यात्रा कर रहा हूँ। इसे पढ़कर मेरी पुरानी यादें ताजा हुईं, साथ ही कई महत्वपूर्ण रोचक सूचनाएँ भी मिलीं। मानो शकुन्तला जी ने फाइबर से बनी पारदर्शी नाव पर मुझे भी बिठाकर समुद्र में विहार करते जीव-जन्तुओं के दर्शन करा दिये, जो मैंने कभी नहीं किये थे।

पं॰ राजेन्द्र अरुण के प्रयास से मॉरिशस की संसद में सर्वसम्मति से 'रामायण सेन्टर' की स्थापना का प्रस्ताव पास हुआ था। राम के देश भारत की किसी भी सरकार में इतना दम नहीं कि इस प्रकार का सत्प्रयास कर सके। इसी रामायण सेन्टर द्वारा आयोजित 24वें अन्तरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में भाग लेने के लिए शकुन्तला जी गयीं थीं। उनकी यात्रा सैर-सपाटे के लिए नहीं थी। भारतीय संस्कृति के प्रति गहन अनुराग रखकर ही उन्होंने यह यात्रा की थी।

भारतीय मजदूरों की भीषण यातनाओं का परिचय प्राप्त कर वे विह्वल हो उठी हैं। उन्होंने लिखा है कि अंग्रेजों ने निरीह मजदूरों को बताया था कि मॉरिशस में पत्थर उलटने पर सोना ही सोना मिलता है। अंग्रेज झाँसा देकर उन्हें जहाजों में भर-भर के ले जाते रहे। उनकी नंगी पीठ पर कोड़े मारे जाते, जूतों की ठोकरों से उन्हें पीटा जाता। उन्हें सूर्योदय से सूर्यास्त तक बारह-बारह घण्टे खेतों से पत्थर उखाड़ कर काम करना पड़ता। धूप या वर्षा से बचने के लिए यदि वे थोड़ी देर के लिए किसी पेड़ के नीचे खड़े हो जाते तो उन पर हन्टरों की मार पड़ती। स्त्रियों का यौन-शोषण किया जाता। प्रसव के बाद भी उन्हें आराम नहीं करने दिया जाता। वे बच्चों को असुरक्षित छोड़कर काम पर आ जातीं। मजदूरों को अधूरा और ऐसा खाना दिया जाता जिससे उन्हें अपच हो जाता और वे बिना दवा-दारू के मर जाते।

अंग्रेजों ने अनेक छल-कपट करके चाहा था कि ये मजदूर ईसाई मत अपना लें, किन्तु उन्होंने घोर यातनाएँ सहते हुए भी अपने धर्म और संस्कृति का परित्याग नहीं किया।

लेखिका शकुन्तला जी वहाँ के समाज में भारतीयता की झलकें देखकर विस्मय-विमुग्ध हुई हैं। उन्होंने देखा है कि आज भी वहाँ विवाह के अवसर पर हल्दी की रस्म और सात फेरों की प्रथा का अनुसरण होता है। करवाचौथ के दिन महिलाएँ साड़ी और आभूषण धारण कर चन्द्र-दर्शन के पश्चात् अन्न-जल ग्रहण करती हैं। मॉरिशस की तृतीय यात्रा के समय वहाँ की सरकार ने मुझे एक होटल में ठहराया था। श्री राजेन्द्र अरुण आग्रह-पूर्वक मुझे होटल से अपने घर ठहरने के लिए ले आये थे। करवाचौथ की रात्रि को उनकी पत्नी श्रीमती विनोद बाला जी ने मुझे अपना जेठ मानकर नारियल, वस्त्र आदि वस्तुएँ प्रदान कर प्रणाम निवेदित किया था। यह विदुषी महिला उस समय विनीता घरेलू महिला सी लग रही थी।

डॉ॰ कालरा ने वहाँ एक अद्भुत दृश्य देखा था। एक प्रशिक्षित कर्मकाण्डी महिला शुद्ध संस्कृत मन्त्रों का उच्चारण कर पूजन-हवन करा रही थीं। मॉरिशस की संस्कृति को देखकर शकुन्तला जी ने लिखा है कि मॉरिशस-वासियों ने भारतीय संस्कारों को सँजोकर रखा है जबकि भारत में वे दम तोड़ रहे हैं।

भारतीय मजदूरों का भारत के प्रति गहरा लगाव ही था कि उन्होंने वहाँ के कई स्थानों - गंगातालाब, सतरंगी धरती, मुड़िया पहाड़, सिंह पर्वत आदि के साथ पौराणिक कथाओं या परिकथाओं को जोड़कर मानो मॉरिशस को भारत का एक लघु भौगोलिक खण्ड बना दिया है।

शकुन्तला जी कवयित्री हैं। वे मॉरिशस की विविधवर्णी प्रकृति के दर्शन कर पुलकित हो उठी हैं। जलप्रपात, थाली-जैसे पत्ते वाले कमल, सैकड़ों वर्ष पुराने सोये पड़े कछुओं आदि का उन्होंने सजीव वर्णन किया है। सागर के सौन्दर्य पर भी वे मुग्ध हुई हैं। कहीं यह शान्त है और कहीं अधीर-विह्वल। उन्होंने लिखा है — "हर सागर की अपनी भंगिमाएँ और मुद्राएँ हैं। प्रशान्त महासागर की लहरें बड़े वेग से तटबन्ध को छूने आती हैं। फेन उगलती, लपकती, उफनती उत्ताल तरंगों का शोर एक अलग ही दृश्य प्रस्तुत करता है।" लेखिका ने समुद्र की लहरों का आनन्द लेते हुए विदेशी सैलानियों की विविध जलक्रीड़ा के साथ ही उनकी उन्मुक्त रतिक्रीड़ा का भी वर्णन किया है।

लेखिका ने मॉरिशस के नगर तो देखे ही गाँव भी देखे हैं। ग्रामीण लोगों के रहन-सहन, वस्त्राभूषण, रीति-प्रथा, चिन्तन आदि पर भारतीयता की अधिक गहरी छाप है। वहाँ के सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रायः रामकथा पर आधारित होते हैं। अभी भी 'मानस' और 'हनुमान चालीसा' के छन्दों का गायन करते हुए लोग भाव-विह्वल हो जाते हैं। लेखिका ने बताया है कि भारतीयों ने अपने गाँवों के फ्रेंच नाम बदलकर भारतीय नाम दे दिये हैं, जैसे कि चित्रकूट। मैंने स्वयं अपनी द्वितीय यात्रा के समय देखा था कि हरमितेज गाँव के लोगों ने इसे 'पंचवटी' नाम दे दिया था। बच्चों की पाठशाला का नाम था 'लवकुश पाठशाला'।

डॉ॰ कालरा विदेश में बसे भारतीय मूल के लोगों के हिन्दी-प्रेम और भारतीयता के साथ उनके गहरे लगाव को देखकर रोमांचित हुई हैं। तथापि, उन्होंने आसन्न संकट की आहट भी महसूस कर ली है। डॉ॰ विनोद बाला अरुण द्वारा हिन्दी के विकास के लिए किये गये प्रयासों के सन्दर्भ में डॉ॰ कालरा ने लिखा है —

"हिन्दी को पूर्ण गौरव दिलाने के लिए जितना उनकी पीढ़ी में उत्साह है उतना नयी पीढ़ी उत्साहित नहीं दिखती। यह बात मैंने बर्मिंघम में हुए 22वें अन्तरराष्ट्रीय रामायण-सम्मेलन के अवसर पर वहाँ भी महसूस की थी। ऐसे आयोजनों में नयी पीढ़ी भाग नहीं लेती। भारतीय संस्कृति, भाषा-इतिहास में उसकी विशेष रुचि नहीं है। यह भविष्य के लिए खतरे की घन्टी है।"

मॉरिशस तो लघु भारत है। जब भारत में ही खतरे की घन्टी बजनी आरम्भ हो गयी है तो मॉरिशस या फीजी आदि देश कैसे बचे रह सकते हैं। भारतीय संस्कृति के कर्णधारों को इस सम्बन्ध में सोचना होगा। मॉरिशस की नयी पीढ़ी के दादा-परदादाओं ने नारकीय यातनाएँ सहते हुए भी जिन जीवन-मूल्यों का परित्याग नहीं किया उन्हें अब भौतिक सुखों की लिप्सा में नयी पीढ़ी उपेक्षित कर रही है। आर्थिक दृष्टि से यह पीढ़ी भले ही सम्पन्न हो जाए सांस्कृतिक दृष्टि से खोखली होगी।

विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के प्रति भारतीयों के मन में अपनत्व और सहानुभूति का संचार करने में डॉ॰ शकुन्तला की यह सरस और प्रेरणादायक पुस्तक बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी। ऐसे लेखन को विशेष प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। विदेश में स्थित हमारे दूतावासों में ऐसी पुस्तकों की प्रतियाँ सुलभ होनी चाहिए। बहुमुखी प्रतिभा की धनी अपनी मेधावी शिष्या शकुन्तला के यशस्वी दीर्घ जीवन की मङ्गलकामना के साथ मैं अपना वक्तव्य शेष करता हूँ।

26, वैशाली, पीतमपुरा दिल्ली-110034


पूर्वकथन

पर्यटन मानव-जीवन में जीवन्तता भरता है। इसके माध्यम से नया-नया परिवेश देखने को मिलता है, जो उसके ज्ञान-विज्ञान का विस्तार करता है। ज्ञान तो पुस्तकों से भी प्राप्त हो जाता है किन्तु पुस्तकीय ज्ञान और यथार्थ दर्शन में अन्तर होता है।

अपना देश सबसे सुन्दर लगता है किन्तु दूसरा देश, दूसरा परिवेश भी हमें उत्सुकता जगाकर हमें यात्रा के लिए आकृष्ट करता है। दूसरा देश भी ऐसा जिसे लघुभारत कहा गया हो। इसलिए मुझे जब कला एवं संस्कृति मन्त्रालय, मॉरिशस की ओर से 24वें अन्तरराष्ट्रीय रामायण-सम्मेलन में पत्र-वाचन का निमन्त्रण मिला तो मैंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। मॉरिशस के विषय में पढ़-सुनकर कुतूहलपूर्ण एक मनमोहिनी छवि पहले से ही मेरे मन में बनी हुई थी।

कश्मीर को भारत का स्वर्ग कहा गया है और मॉरिशस को विश्व का स्वर्ग। मार्क ट्वेन (Mark Twain) ने तो स्वर्ग को मॉरिशस की प्रतिकृति कहा है। मॉरिशस की सुन्दरता की प्रशंसा में वे लिखते हैं — "You gather the idea that Mauritius was made first and then heaven and that the heaven was a copy of Mauritius." मॉरिशस समुद्र की गोद में बसा एक द्वीप है, चहुँ ओर से पर्वत जिसका अभिषेक करते हैं। ऊपर फैले नीले आकाश के मण्डप के नीचे हिन्द महासागर की नीली-हरी, शान्त-चपल लहरें नाद और लय के साथ नृत्य करती हैं। जहाँ हरीतिमा ही हरीतिमा है। जो प्राकृतिक सम्पदा के साथ सांस्कृतिक सम्पदा में भी समृद्ध है। जहाँ हर घर में रामायण का पाठ होता है और प्रांगण में हनुमान जी विराजमान हैं। जहाँ गंगातालाब के किनारे तेरहवें ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में मारीशेश्वर महादेव का मन्दिर है। जहाँ माँ दुर्गा घर की शोभा हैं। जहाँ मरियम हैं। ईसा मसीह हैं, जहाँ फ्रेंच संस्कृति और ईसाई धर्म के बीच में भारतीय संस्कृति अडिग और सुरक्षित है। जहाँ घर-घर, गाँव-गाँव में लोग हिन्दी बोलते हैं। जहाँ अपनों के बीच संवाद की भाषा भोजपुरी है। जहाँ 'रामचरितमानस' सर्वप्रिय धर्मग्रन्थ है, जिससे वे मार्ग-निर्देश ग्रहण करते हैं। जहाँ सभी भारतवंशी भारत को अपनी 'माँ' मानते हैं, जिन्हें भारत अपना घर लगता है और जिसके साथ वे गहरा आत्मीय जुड़ाव महसूस करते हैं। ऐसा देश है मॉरिशस। ज्वालामुखी के मुख से निकले लावे के ढेर पर बसा एक छोटा-सा द्वीप जिसकी राजधानी 'पोर्ट लुई' है। जो मेडागास्कर के पास है। दसवीं सदी में अरबियों को इस द्वीप का पता था। मॉरिशस का सर्वप्रथम अन्वेषण 1505 ई॰ में पुर्तगाली नाविक 'पेट्रो मास्केरेनास' ने किया, जो भारत के गवर्नर-जनरल के पुत्र के साथ हिन्द महासागर में विहार करता हुआ मॉरिशस और उसके आस-पास के द्वीप-समूह में पहुँच गया था। इस अन्वेषक ने युवराज मारिसनसउ के नाम पर इसका नाम मॉरिशस रखा। फिर फ्रान्सीसियों ने 1715 ई॰ में इस पर विजय प्राप्त कर इसका नाम लेडिफ फ्रांस (Liedf France) रखा। सन् 1810 में ब्रिटिश राज्य स्थापित होने के बाद इस का नाम पुनः मॉरिशस कर दिया गया। यह वह द्वीप है जिसके पूर्वजों को 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के दलालनुमा सरदार सोने के सब्ज-बाग दिखाकर गिरमिटिया मजदूर बनाकर इस द्वीप पर लाये। वहां से उन्हें गुयाना, फीजी, सूरीनाम, ट्रिनिडाड और दक्षिण अफ्रीका जैसे कई देशों में ले गये। वहाँ पाँच-छह आने की दैनिक मजदूरी पर पेट पालने के लिए ये विवश थे। उसके लिए वे कोल्हू में नंगे पैर जुते। नंगी पीठ पर गोरे 'साहब' के चाबुक के प्रहार सहे। जूते की नोंक की मार से पिटे। पर इनकी आत्मिक शक्ति वज्र से भी अधिक दृढ़ थी। बड़े से बड़े अमानवीय अत्याचारों के आगे झुके नहीं। जिस ढाल के सहारे उन्होंने शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक दासत्व को सहा और विधर्मी बनने के हर प्रयास को विफल कर दिया वह था उनका संस्कृति-प्रेम।

विश्व के जिन देशों में भारत-दर्शन होते हैं उनमें से हिन्द महासागर पर बने द्वीप 'मॉरिशस' की अपनी अलग गरिमा है। भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं को अपने पूर्वजों की धरोहर के रूप में आज भी मॉरिशसवासी अपनी दिनचर्या में सहेजे हुए हैं। वहाँ भारत जैसे ही पर्व-त्योहार, जन्मोत्सव-विवाहोत्सव आदि संस्कार हैं।

भारत की प्रतिच्छवि मॉरिशस को देखने की तीव्र उत्कण्ठा वर्षों से मन में थी। वहाँ के हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार भारत आते और दिल्ली विश्वविद्यालय में उनके व्याख्यान होते। जब हम आप्रवासी भारतीयों द्वारा वहाँ की प्राकृतिक सुषमा, हिन्दी भाषा के उन्नयन एवं विविध विधाओं में लेखन की उत्तरोत्तर प्रगतिशील स्थिति को सुनते अथवा विभिन्न पत्रिकाओं में आप्रवासी साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ते तो मन मॉरिशस-भ्रमण के लिए और भी लालायित हो उठता। यह मेरी साहित्यिक यात्रा थी किन्तु मुझे अपने प्रतिनिधि मण्डल के साथ मॉरिशस घूमने का भी पर्याप्त समय मिला। ऐतिहासिक एवं धार्मिक दर्शनीय स्थलों को देखते हुए वहाँ की संस्कृति में महकती भारतीयता की खुशबू का आनन्द लिया। प्रकृति को निकट से देखा। ऐसी सुदूर यात्रा में कहीं मन विस्मय-विमुग्ध होता रहा तो कहीं वीतरागी और दार्शनिक बन गया। कहीं बच्चों की तरह चहकने लगा तो कहीं पीड़ा-जन्य अवसाद से भी घिर गया। आप्रवासी घाट देखते समय और देखने के बाद काफी समय तक गहन उदासी छायी रही। इस डिपो की दीवारों में मॉरिशस की आज की पीढ़ी के उन पुरखों की वेदना और छटपटाहट अब भी प्रतिध्वनित हो रही थी, जिन्हें 1834 ई॰ में बहला-फुसलाकर छलपूर्वक शर्तबन्द या गिरमिटिया मजदूर के रूप में उतारा गया था। जहाँ उन्होंने पाँव रखे थे, मॉरिशस के आप्रवासी घाट में वे सीढ़ियाँ आज भी एक धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं। उन मजदूरों में से बहुत थोड़े भारत लौट सके थे। शेष मारीच देश में ही रह गए। सोने की तलाश में आए इन मजदूरों को पहाड़ चीरने पर तो सोना नहीं मिला पर जिस असमतल, पथरीली भूमि को उन्होंने समतल और उर्वर बनाया वह आज सोना उगल रही है और मारीच देश उत्तरोत्तर उन्नत और प्रगतिशील मॉरिशस देश बन गया।

मॉरिशस में यह हमारा अल्पकालीन प्रवास था, 3 अगस्त से 10 अगस्त, 2008 तक। हम मात्र एक सप्ताह वहाँ रहे। वहां के निवासी चाहे भारतीय मूल के हों चाहे मॉरिशस मूल के अथवा अन्य राष्ट्रों चीन, लन्दन, अमरीका या अफ्रीकन आदि अन्य देशों के, जैसा परस्पर समन्वय और वैचारिक उदारता का भाव यहाँ दिखाई देता है वैसा दुनिया के किसी देश में नहीं। परस्पर सहयोग की यह भावना प्रशंसनीय भी है और अनुकरणीय भी।

इन सात दिनों में आयोजकों के जिस आतिथ्य सत्कार का अनुभव किया उसे हम कभी नहीं भूल सकते। मॉरिशस की धरती पर अपने ही चेहरे-मोहरे वाले, उसी कद-काठी और नैन-नक्श वाले लोगों से जब पहली बार मिले तो वे चेहरे इतने परिचित लगे जैसे उनसे कोई रिश्ता रहा हो। हजारों मील दूर अपरिचित देश में इनकी आँखों में जो प्रेम-संवेदना देखी तो लगा जैसे हम अपने रक्त-सम्बन्धियों से मिल रहे हैं। हमें मॉरिशस में सर्वत्र भारत और भारतीयता के दर्शन हुए। उनके खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाजों तथा उनके विविधवर्णी परिवेश को जानने के लिए आइए पढ़िये, मेरी डायरी के सात दिन —

इसमें आप मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुई में मेरे साथ गांव और नगर-परिभ्रमण करेंगे। प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन-स्थल देखेंगे। समुद्र, पर्वत, जलप्रपात और उद्यान देखेंगे। तीर्थाटन करेंगे। मैं चाहूँगी, आप मेरे साथ वहाँ के जनजीवन का जायजा भी लें। इस यात्रा में जीवन का वैविध्य एवं जगत् का जो वैचित्र्य उद्घाटित हुआ, उसके सहयात्री बनकर आप आनन्द लें __________


डॉ॰ शकुन्तला कालरा, डी-लिट्
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, मैत्रेयी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
सम्पर्क: एन-डी-57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034 मो: 8287479455 लैंडलाइन: 011-41677475

डॉ॰ शकुन्तला कालरा की यह यात्रा-वृत्तान्त 'मॉरिशस में भारत' भारतीय प्रवासियों के संघर्ष, उनके धर्म-संस्कृति के प्रति अटूट लगाव और मॉरिशस की अनुपम प्राकृतिक छटा का सजीव चित्रण है। यह पुस्तक हमें भारत के प्रति गर्व और अपने मूल से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।

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