प्राक्कथन: हिन्दी बालसाहित्य (विचार और चिंतन)
चिंतन बोला पहले अपने बल को तोलो - फिर उड़ो वहाँ तक जहाँ-जहाँ उड़ना चाहो"
— कृष्ण शलभ
कवि कृष्ण शलभ की ये पंक्तियाँ मेरे विचार-प्रवाह में हैं। विचार-चिंतन से निःसृत यह भाव-धारा साहित्य के अंग-संग रह कर सदा अमृत-तत्त्व का सा काम करती है। जिसके विचार-प्रवाह में बालक हो, जो हर प्रकार से बालकों के संपूर्ण का चिंतन करे, वह ही वस्तुतः बाल-साहित्य है।
बाल-साहित्य बालकों के हृदय की धड़कन है जो कभी कविता के रूप में, तो कभी कथा-कहानी और कथेतर विधाओं में विभिन्न संभावनाओं के साथ धड़कती है। एक अच्छी बाल-रचना बालक के मन के, भीतर के समग्र अवरोध को पराजित कर देती है और मन उल्लसित हो उठता है। मन का यह उल्लास उसे सहज अपराजित बना देता है। एक अच्छी रचना सचमुच सच्ची होते हुए बालक के लिए अमृत का काम करती है। उसकी रागात्मक चित्त-वृत्तियों का विकास करती है। उसे नई दिशा देती है और मानसिक दबाव से मुक्त रखती है। साहित्यकार मूलतः संवेदनशील होता है। वह अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से पाठक को भी संवेदनशील बनाता है। उसमें उदात्त भावनाओं का संचार करता है। उसके विशृंखलित विचारों एवं संस्कारों का समुचित आयोजन कर उसे विकासोन्मुख बनाता है। बाल-साहित्यकार तो और भी अधिक संवेदनशील होता है क्योंकि वह बालमना होता है। वह बालक को नया उत्स देता है! इसलिए बालक और बाल-साहित्य इस दृष्टि से आज और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
बाल-साहित्य बालकों के समग्र जीवन के लिए है। वह बड़ों के साहित्य की भाँति उनका मनोरंजन भी करता है और उनका सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विकास भी। परिवर्तन समय की गतिशीलता के गर्भ से जन्म लेता है। युगानुरूप बाल-साहित्य में भी परिवर्तन होता आया है। नवीनता समय की माँग है। आज के वैज्ञानिक एवं लोकतांत्रिक समाज में हम बच्चे को अपनी पुरानी मान्यताएँ थोपकर चुप नहीं करा सकते। उसकी तार्किक शक्ति 'क्यों और कैसे' के धारदार औजारों के साथ बेबुनियाद तथ्यों को स्वीकार नहीं कर सकती। विज्ञान-युग में बढ़ता-पलता बच्चा यह स्वीकार ही नहीं कर पाता कि पृथ्वी ईश्वर निर्मित है और शेषनाग इसे अपने फन पर धारण किए हैं। अथवा भूकंप शेषनाग के हिलने-डुलने से आता है। विज्ञान के अनुसार धरती भूगर्भीय सिद्धांतों पर निर्मित है।
साहित्य-सृजन की प्रवृत्ति में जोड़ना, तोड़ना और छोड़ना निरंतर साथ रहता है। इसी से वह प्रगतिगामी हो पाता है। हिंदी बाल-साहित्य के समूचे परिदृश्य से विगत चार-पांच दशकों के हिंदी बाल-साहित्य के ग्राफ का अवलोकन यह प्रस्थापित करता है कि उसने अपनी उन्नति और समृद्धि के जो शिखर तय किए हैं उसने कथ्य और शिल्प के पुराने खाँचों को तोड़ कर नये मार्गों का संधान किया है। पूर्व में जहाँ कविता तथा कहानी ही सशक्त विधाएँ थीं, वहाँ आधुनिक युग में वैज्ञानिक विकास के कारण आज अलग-अलग प्रकार की नई गद्य और पद्य विधाएँ दृष्टिगत होती हैं। पत्रकारिता ने जहाँ प्राचीन विधाओं को समृद्ध किया है, वहाँ अनेक नवीन रचनात्मक विधाओं, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, निबंध आदि का उद्भव और विकास पत्रकारिता के माध्यम से ही हुआ। विज्ञानपरक साहित्य तो इन पत्रिकाओं के कारण इतना लोकप्रिय हुआ है कि आज कुछ बाल-पत्रिकाएँ विज्ञान पर ही अधिक केंद्रित हैं। स्वातंत्र्योत्तरकाल में बाल-साहित्य का फलक व्यापक हुआ है और स्वरूप परिवर्तित। आज साहित्य युगानुरूप बाल-मन की अनुभूतियों के निकट आ गया है। आधुनिक जीवन-मूल्यों का साहित्य युग की माँग बना है। स्वतंत्रतापूर्व सृजित साहित्य की दृष्टि मात्र मिशनरी थी। आज़ादी के बाद देश में नई चेतना का विकास हुआ। उसकी सोच ने बदले युग के परिवेश के अनुकूल बाल-साहित्य को मनोवैज्ञानिक-मनोरंजक भावभूमि प्रदान की। बाल-साहित्य ने अपने प्रारंभ से आज तक युगानुरूप एक महत्त्वपूर्ण सफ़र तय किया है। संक्षेप में कहूँ तो इतना ----- कहाँ से चले थे --- कहाँ आ गए हम -----! एक विराट पाट की नदी! यह सब विचार और चिंतन के सहारे ही संभव हो सका।
बाल-साहित्य बड़ों के साहित्य से संवेदना के स्तर पर भिन्न एक सृजन रूप है, जिसका एकमात्र लक्ष्य बालक हैं। बच्चों का संसार बड़ों के संसार से सर्वथा भिन्न होने के कारण प्रत्येक कार्य को आंकने का उनका अपना नज़रिया होता है। जो लेखक बच्चों के मन तक सूक्ष्म रूप से पहुँच पाता है, जो उनमें लवलीन होकर उनके मन तक जा विराजता है वही बाल-साहित्य का प्रभावी सृष्टा हो सकता है। बाल-साहित्य की अनिवार्य शर्त है कि वह बालक की वय, रुचि, समझ, योग्यता को ध्यान में रखकर रचा जाए। उसे रचते समय लेखक अनुभूत से अभिव्यक्ति तक बालक बना रहे। विद्वान, उपदेशक या शिक्षाशास्त्री नहीं क्योंकि बच्चे साहित्य मनोरंजन के लिए पढ़ते हैं। यहाँ यह कहना भी वाजिब है कि संस्कार और शिक्षा का रास्ता भी खेल-खेल में मनोरंजन के दरवाजे से होकर ही निकल सकता है।
भाषा की बात करें तो पाते हैं कि अपनी सृजनात्मक मुद्रा में बाल-साहित्य शिशु से किशोर वय तक आते-आते अवस्था की स्थिति के अनुसार बदलती हुई मुद्रा में भाषा का उपयोग करता है। आयु के अनुसार बच्चों का बौद्धिक और मानसिक विकास होता है और भाषा भी उसी के अनुसार विकसित होकर व्यवहार में आती है। उसका शब्द-भंडार, वाक्य-विन्यास, अर्थ-ग्रहण करने की शक्ति का विकास होता है। भाषा की दुरूहता रचना के कथ्य और विचार की संप्रेषणीयता को बाधित करती है। बालकों के लिए सृजित किये जाने वाले साहित्य में भाषा का सरल और सरलतम रूप अपेक्षित होता है। ऐसा रूप जो बोधगम्यता, सहजता, विषयानुसार चुटीलापन, चुस्ती, बतकही का बांकपन, चित्रात्मकता, ध्वन्यात्मकता, पात्रानुकूलता, नाटकीयता आदि को रेखांकित करने में सक्षम हो।
भाव, भाषा के बाद तीसरा चरण है विधा। मानव-संवेदना जितने-जितने रूपों में अभिव्यक्ति पाती है उसी के अनुरूप साहित्य की विविध विधाओं का जन्म और विकास होता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से हिंदी साहित्य ने आधुनिक युग में पदार्पण किया उसी के साथ निबंध, नाटक, कहानी, आदि विधाओं ने कविता के समानांतर प्रतिष्ठा पाई। इसके साथ-साथ अनेक गद्य-विधा के नवीन रूपों ने जन्म लिया और उनका विकास हुआ। आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, यात्रावृत्तांत, साक्षात्कार, डायरी जैसी ये विधाएँ इसी युग की देन हैं। पूर्व में कुछ नया जोड़ते हुए यह विधाएँ कमोबेश बाल-साहित्य तक विस्तार पा गई हैं। पद्य-विधा के अंतर्गत भी नए-नए प्रयोग और रूप कविता का विस्तार कर रहे हैं।
बाल-कविता की सक्रियता-सम्पन्नता-संभावना तो बीसवीं सदी के शुरुआती दौर से देखी जा सकती है। किंतु 14वीं शताब्दी में अमीर खुसरो की पहेलियों और मुकरियों को हम बाल-कविता के ही नज़दीक पाते हैं। बाल-कविता के इतिहास को सुविधा के लिए तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम चरण में स्वतंत्रता-पूर्व की कविता जिसकी अवधि 1901-1947 तक है। इस युग की कविता में देशभक्ति और उपदेशात्मक का स्वर प्रमुख था। बच्चों के मनोभावों को केंद्र में रखते हुए सहज कविता करने की अपेक्षा उनका चरित्र-निर्माण ही सृजन का प्रमुख लक्ष्य रहा। फिर भी प्रारंभ से ही कुछ कवि ऐसे भी हुए जिन्होंने बालकविता को उपदेशात्मकता परिधि से मुक्त कर सहज कल्पना का मुक्ताकाश दिया। सधे स्वर-लय ताल से थिरकती यादगार कविताएँ दीं। अविस्मरणीय गीत, और लोकपरंपरा को सुरक्षित रखने वाली मीठी लोरियाँ दीं।
कविता का दूसरा चरण जिसे छठे दशक के आसपास माना जा सकता है। इस चरण में जहाँ कविता बाल-परिवेश से सम्पृक्त होती दिखाई देती है, वहीं कविता के विषयों में विविधता और रचनाशैली में प्रयोगशीलता का गुणाकर्षण दिखने लगा। तीसरे चरण-कविता यानी छठे-सातवें दशक में बालकविता का और अधिक विस्तार हुआ। इस युग में तीन-चार पीढ़ियों के कवि एक साथ सृजन में निमग्न दिखाई देने लगे। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में लिखने वाले कवियों में अनेक ऐसे कवि हैं जिनकी कविता में बच्चों का पूरा संसार समा गया।
इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक और द्वितीय दशक की बालकविता निरंतर गतिमान है और उसमें कल्पना-तत्त्व और भाव-प्रवणता के साथ बालमनोविज्ञान की पूर्णता है। समूचे सृजन में सच्चाई यह भी है कि उत्कृष्ट रचनाओं के साथ ऐसी कविताएँ भी खूब लिखी जा रही हैं जिनमें न विषय की नव्यता है, न भाव की और न छंदों का निर्वाह। कुल मिलाकर स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से आज की समकालीन बालकविता की इस लंबी यात्रा में बालकविता के कई नए रंग उभरे हैं। कई परिवर्तन हुए हैं जिसने उसे नव्यता और भव्यता प्रदान की है।
बालकविता के प्रारंभिक स्वर में लोरी लोक-संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा रही है जिसमें लोक की सौंदर्य चेतना, कालचिंतन तथा जन-जीवन अभिव्यक्त हुआ है। आज के दौर में आधुनिकता के प्रभाव से लोरियों की विरासत संकट में है। फिर भी आज बालकविता में लोरी के साथ प्रभाती भी रची जा रही है। लोरी के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उसका अनुशीलन आवश्यक है।
कविता के समान कहानी भी बच्चों की प्रिय विधा है। कहानी को बालसाहित्य की रीढ़ माना गया है। कहानी की प्रारंभिक अवस्था लोक-कथाओं की है। संस्कृत से बालसाहित्य की यह परंपरा आगे चलकर हिंदी में विकास को प्राप्त हुई। इसे प्रगति की दिशा में अग्रसर करने में अंग्रेजी बालसाहित्य का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। रॉबिंसन क्रूसो, डेविड कॉपरफ़ील्ड, सिंदबाद, ट्रेज़र आइलैंड आदि की कहानियाँ बच्चों ने खूब पसंद कीं। हिंदी के लेखकों का ध्यान भी बालोपयोगी साहित्य की ओर आकृष्ट हुआ। भारतेंदु-युग में बालसाहित्य की स्वतंत्र रचना होने लगी। इस युग में यद्यपि मौलिक बाल-कहानियाँ भी लिखी गईं किंतु प्रधानता अनूदित कहानियों की रही। द्विवेदी युग में रचित कहानियों का प्रमुख स्वर राष्ट्रीय चेतना का है। धार्मिकता, नैतिकता से आच्छादित पौराणिक कहानियों के साथ काल्पनिक परिकथाएँ एवं ऐतिहासिक कहानियों का सृजन भी हुआ। साथ ही साथ मौलिक कहानियाँ भी लिखी गईं जिनमें बाल-हृदय की अनुभूतियाँ थीं। मूलतः इस युग में उपदेश-तत्व को उभारने की प्रवृत्ति प्रमुख रही।
समय के स्पंदनों के साथ स्वातन्त्र्योत्तर युग में बालकहानी अपने पुराने रूप स्वरूप से मुक्त होते हुए मनोवैज्ञानिकता की ओर बढ़ चली। अब बच्चों के भाव संसार और उनकी मनोवृत्ति को साथ लेकर उनकी ही भाषा और भाव-भंगिमा में कहानी का सृजन होने लगा। पूर्व की पौराणिक, धार्मिक और जादू-टोने की कहानियों को तर्क की कसौटी पर परखा जाने लगा। कहानी अपने पूर्व कलेवर से हटकर आधुनिक जीवन मूल्यों का प्रभाव-रंग दिखाने लगी। इस प्रकार उत्थान की ओर अग्रसर कहानी की विधा युग को अपने साथ लेकर चली। बच्चों की बदलती रुचियों और प्रवृत्तियों के अनुरूप इसमें विषयगत और शैलीगत प्रयोग भी हुए।
इक्कीसवीं सदी की बालकहानी पर समग्रता से दृष्टि डालें तो प्रकट होता है कि इस सदी की कहानी आज की ज्वलंत समस्याओं को केंद्र में रखते हुए रची जा रही हैं। आज की कहानी कल्पना की ऊँची उड़ान लिए है तो उसमें आधुनिक युगबोध की उर्वर ज़मीन भी है। पौराणिक और ऐतिहासिकता के रंग हैं तो विज्ञान की अद्यतन जानकारी के स्पंदन भी हैं।
हिंदी बाल-साहित्य गद्य विधाओं में केवल कथा साहित्य अथवा पद्य-विधा में कविता तक ही सीमित नहीं है। आज संप्रेषण के अन्य माध्यमों में फ़ीचर, वार्ता, निबंध, यात्रा-वर्णन, परिचर्चा, साक्षात्कार, समीक्षा, प्रहेलिका, प्रहसन, जीवनी, आत्मकथ्य, संस्मरण, डायरी, पत्र-लेखन आदि विभिन्न विधाएँ भी बाल-साहित्य का अंग है। एक अर्थ में विस्तार लेती यह यात्रा सुखद और विशिष्ट है। बच्चे इनमें रुचि ले रहे हैं और यह बच्चों में लोकप्रिय भी हैं।
साहित्य, जीवन का परिष्कार और पकड़ है। इस विचार-चिंतन में बच्चों के विकास में बालसाहित्य और उसे रचने वाले साहित्यकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है और रहेगी। बालसाहित्य बालचिंतन की उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है। सजीव कहानियाँ बच्चों की चेतना और भावनाओं पर छा जाती हैं। इनमें रचित पात्रों के सुख-दुख महसूस करके वह वास्तविक जीवन में मानव के सुख-दुख का साथी बन जाता है। बालसाहित्य बचपन की जिज्ञासा पूर्ति और कल्पनाशक्ति के विकास में सबसे अधिक सहायक होता है। एक श्रेष्ठ मानव की नींव बचपन में ही पड़ जाती है जिसकी आधार-शक्ति बालसाहित्य में ही निहित है। एक प्रेरक बीज-बिन्दु सी। बच्चों के लिए ऐसा साहित्य सृजन किया जाना आवश्यक है जो उनकी आत्म-शक्ति को जगाकर उनका दिशा-निर्देश करे। यह सर्वमान्य है कि दिशा का निर्धारण ही दशा के परिवर्तन में सहायक होता है। समय की गतिशीलता और उसके परिवर्तन भी समाज को प्रभावित करते रहे हैं। आज सूचना-क्रांति और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का युग है जिसके प्रभाव से एक नये विचार ने जन्म ले लिया है। कुछ लोग आज साहित्य को अनुपयोगी मानने लगे हैं। एक स्वर में यह भी कहा जा रहा है कि साहित्य मर जाएगा, किंतु जब तक साहित्य और समाज के सरोकार एक रहेंगे साहित्य कभी मरेगा नहीं। समाज-सापेक्ष साहित्य समाज से रस लेकर सदा हरा-भरा रहेगा। हाँ शर्त यह है कि इस दौर में बच्चों के लिए ऐसा साहित्य सृजित किया जाए, जिसके द्वारा आकाश से हो रहे सांस्कृतिक आक्रमण के प्रभाव को रोका जा सके। उन्हें ऐसा साहित्य दें जिसमें संवेदना और विचारशीलता का सुंदर समुच्चय हो। बच्चों के लिए सृजन एक दायित्व है, एक चुनौती भी। इस दृष्टि से यह एक अतिरिक्त गुरुतर दायित्व भी है। यह ठीक है कि बालसाहित्य बच्चों के थके-हारे मन के लिए मनोरंजन का साधन बनता है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु रह जाए। यदि ऐसा होता तो मदारी के तमाशे और साहित्य में क्या अंतर रहेगा। यहाँ भी सृजन के मूल में समन्वयात्मक दृष्टि होनी चाहिए। साहित्य आनंदप्रद और सरस होने के साथ जीवनोपयोगी भी हो। ऐसा साहित्य निश्चित ही सच्चे अर्थों में समाज का प्रतिनिधित्व करेगा और देश-काल की परिधि से परे कालजयी होगा।
साहित्य-सृजन के साथ अपने रूप-स्वरूप में निरंतर विस्तार लेता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। हर वर्ष नई पुस्तकों का प्रकाशन होता है। क्या हुआ, क्या अच्छा और श्लाघ्य हुआ इसका सर्वेक्षण भी समय के साथ किया जाना ज़रूरी होता है। यही साहित्य के सृजन, उसकी गुणवत्ता और लोकप्रियता का पता देते चलता है। नई-नई पुस्तकों, पत्रिकाओं, प्रकाशनों से बालसाहित्य का संवर्धन होता है। इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रेखांकित होकर सामने आना अपरिहार्य है। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रिंट-मीडिया के योगदान की चर्चा भी ज़रूरी हो जाती है।
बिन्दु-बिन्दु, विचार-प्रवाह और चिंतन के इस प्रभाव को मैंने पुस्तक के कुल बारह आलेखों में क्रमशः संजोया है। निश्चित ही बारह आलेखों में बालसाहित्य के सभी परिदृश्यों को समेटना संभव नहीं क्योंकि बालसाहित्य-लेखन की एक समृद्ध परंपरा है। उसकी गंभीरता-गहराई और अनंतता सर्वज्ञात है। फिर भी उसके नज़दीक तक जाने का प्रयास तो किया ही जा सकता है। यह विचार ही इस पुस्तक के आलेखों की मूल शक्ति बना है। कुछ विशिष्ट बिन्दुओं जिनकी संक्षेप चर्चा मैंने पूर्व में की है उन्हीं पर मैंने आलेख तैयार किये। इनमें से कुछ बालसाहित्य की विविध गोष्ठियों में पढ़े गए हैं, कुछ का प्रकाशन समय-समय पर 'आजकल', 'भाषा', 'साक्षात्कार', 'साहित्य-अमृत', 'शोध-दिशा' आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में हुआ है।
पुस्तक में संकलित सभी आलेख स्वतंत्र हैं। जो क्रमबद्ध ढंग से नहीं लिखे गए। इस कारण उनमें पूर्वापर कोई संबंध नहीं है। बाल-साहित्य का स्वरूप, उसकी भाषायी संरचना, विधा-विविधा, बाल कविता की विकास-यात्रा, बाल कहानी का स्वरूप, प्रिंट-मीडिया--------- जैसे बाल-साहित्य के भिन्न-भिन्न विषयों पर आधारित जो कुछ आलेख हैं इनको लेकर क्या किया जाए? "एक सूत्र में फूल पिरोओ, एक माला बन जाए" कुछ समय से यह भाव मेरी भाव-यात्रा में आकार ग्रहण करने को तत्पर था ताकि पुस्तक रूप में यह प्रस्तुति हिंदी बाल-साहित्य के पाठकों एवं शोधार्थियों को भेंट करूँ ताकि सभी इससे लाभान्वित हो सकें।
मंै योजना-प्रवीण कभी नहीं रही इसलिए विलंब का होना या कभी कार्य का अपूर्ण भी रह जाना स्थिति और समय के हाथ रहा। पूर्णता-अपूर्णता दोनों ईश्वरेच्छा। यहाँ ईश-कृपा से यह विचार पूर्णता को प्राप्त कर सका मैं इसके प्रति नत-मस्तक हूँ।
इस पुस्तक के लेखन में हिंदी बाल-साहित्य के शोध-कार्य एवं इसके उन्नयन में पूर्णभाव से समर्पित कृष्ण शलभ जी के दीर्घ अनुभव से विशेष लाभान्वित हुई हूँ। अपनी समस्त व्यस्तताओं के बीच उन्होंने अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं सटीक टिप्पणियों के साथ अमूल्य सुझाव देकर मुझे उपकृत किया। उनके प्रति मेरा आभार-प्रदर्शन शब्दातीत है।
मैं अपने को अत्यंत सौभाग्यशाली समझती हूँ कि मुझे वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध बाल-साहित्यकार डॉ. कृष्णचंद्र तिवारी 'राष्ट्रबंधु' जी का सदा आशीर्वाद मिला।
बाल-साहित्य के मूर्धन्य विद्वान एवं इतिहास लेखक डॉ. प्रकाश मनु का मुझे बाल-साहित्य के हर क्षेत्र में सदैव प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन मिला। धन्यवाद देकर मैं उनके 'देय' को कम नहीं करूँगी।
इस सारी सामग्री को पुस्तकाकार रूप में संचय कर उसे सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाश में लाने और यथाशीघ्र पाठकों को सुलभ कराने का श्रेय नमन प्रकाशन को जाता है। मैं श्री नितिन गर्ग जी के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करती हूँ।
पाठकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में-----------
— शकुंतला कालरा