भूमिका: यादों की मंजूषा
स्मृतियाँ जो समय की धूल से धुंधली नहीं होतीं। जीवन में कुछ अति विशिष्ट क्षण, घटनाएँ, व्यक्ति और चरित्र जो अपनी पावन छुअन से हमारे मन-प्राण-आत्मा को छू लेते हैं, उन्हें हम कब भुला पाते हैं। वे 'यादों की मंजूषा' में एकत्रित होते रहते हैं। अपनी अमूल्य इस पूँजी को व्यक्ति किसी के साथ साझा करना चाहता है। यदि वह रचनाकार है तो बड़ी उदारता से उसे अपने पाठकों तक संप्रेषित कर देता है। सुधियों का यह खजाना कभी घटता नहीं। पूर्ण में से पूर्ण निकलकर शेष भी पूर्ण ही बचता है। उपनिषद के इस मंत्र की तरह पाठकों को देकर भी सुधियाँ मृत्यु-पर्यन्त उसके मस्तिष्क में पूर्ववत् संचित ही रहती हैं। हाँ उसे बाँटकर संभवतः वह स्वयं को हल्का महसूस करता है।
अपने संस्मरण लिखना या डायरी लिखना या आत्मकथा लिखना हो तो तीनों में रचनाकार अपने अतीत में जाता है यानी उल्टी गिनती से शुरू होकर पीछे तक जाता है। ये स्मृतियाँ समय की धूल से धुंधली होकर भी धुंधली नहीं होतीं। रचनाकार की तेज़ स्मरण-शक्ति इस धूल को हटाती जाती है और एक-एक कर वह स्पष्ट होती जाती है। धूल छँटती जाती है, तस्वीर स्पष्ट होती जाती है। मनुष्य के मस्तिष्क में अनंत स्मृतिकोश हैं, जिनकी वजह से व्यक्ति भूतकाल में पहुँच जाता है। हाँ अभी ऐसी कोई शक्ति प्रकृति ने नहीं दी अथवा ऐसे सैल नहीं बनाए जो भविष्य देखने के लिए सक्रिय हो उठें। अतीत की यादें स्मृति-पटल पर अंकित होने लगती हैं। मेरे इस स्मृतिकोश में मेरे लेखकीय जीवन में आए अनेक साहित्यिक मित्र हैं। उनसे जुड़े अनुभवों के अनगिनत पृष्ठ दर्ज हैं।
एकांत में स्मृतियों का आकाश जब झिलमिलाने लगता है तो कई तारे आकर आँखों में टिमटिमाने लगते हैं। मन उजास से भर उठता है। इन्हीं उजास के क्षणों में उभर आई ताज़गी के रंग से सजाई-सँवारी बालसाहित्यकारों की स्मृतियाँ हैं, जो हमेशा ताज़ा ही लगती हैं। ध्यातव्य है कि इन बालसाहित्यकारों ने अपने लेखकीय जीवन में अनेक कृतियाँ देकर बालसाहित्य को प्रतिष्ठा और ऊँचाइयाँ दी हैं। अपने लेखकीय कर्म को जीवन-पर्यन्त गंभीरता से लिया। हम सब पाठक इनके कृतज्ञ हैं कि इन्होंने बालसाहित्य को अपने प्रदेय से अत्यंत समृद्ध किया है। मेरा सौभाग्य है कि बालसाहित्य में अपनी अर्थपूर्ण और गौरवपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने वाले इन सभी बालसाहित्यकारों का मुझे अत्यंत निकट से सान्निध्य मिला। संवेदना-सिक्त स्नेह मिला। सम्मान मिला। सबने अपने-अपने ढंग से मुझे प्रभावित और प्रेरित किया। किसी ने अपने व्यक्तित्व के निजी गुणों से आकृष्ट किया तो किसी ने अपने आंतरिक सौंदर्य से। किसी की कर्मठता से बल मिला तो किसी की संघर्षशीलता से। लेखन के प्रति किसी के जुनून ने मुग्ध किया तो किसी की विचारधारा ने। आइए, आप भी मेरे साथ मेरी अतीत की स्मृतियों में, जहाँ आप मिलेंगे एक दर्जन मेरे प्रिय बालसाहित्यकारों से—
विष्णु प्रभाकर
आइए मिलते हैं मेरे प्रिय वरिष्ठ वयोवृद्ध-साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी से। उनके साथ हुई अनेक मुलाकातों की एवं साक्षात्कार लेते समय की संवाद-प्रतिसंवाद की कई यादगार सुंदर स्मृतियाँ मेरे मन-मस्तिष्क में आज भी उसी तरह ताज़ा की ताज़ा अंकित हैं। साहित्यिक दलबंदी और प्रचार से दूर विष्णु जी के लिए पाठक और उनकी प्रशंसा ही सबसे बड़ी पूँजी थी। वे मेरी रचनाओं को चाव से पढ़ते हैं। किसी भी साहित्यकार मूल्यांकन का आधार रचना होती है उसका दलतंत्र नहीं।
भारतीय जी
सौम्य और सरल भारतीय जी का हृदय सचमुच बाल सरलता का प्रतीक था। विज्ञान के विद्यार्थी होने के साथ-साथ उनके हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा पर आश्चर्यजनक अधिकार ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया था। भारतीय जी ने मुझे अपनी पुस्तक 'हिंदी साहित्य की सौ श्रेष्ठ पुस्तकें' दीं। मैंने पुस्तक के पृष्ठ पलटते हुए एक नज़र में देख डाली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अब हिंदी बालसाहित्य की सौ श्रेष्ठ पुस्तकें लिखूँ। मैंने कहा कि मैं इतना बड़ा काम नहीं कर पाऊँगी। पुस्तकों का संग्रह फिर उन्हें आद्योपान्त पढ़ना और फिर सौ श्रेष्ठ पुस्तकों का चयन। भारतीय जी ने कहा कि पुस्तकें हम आपको उपलब्ध करा देंगे। जो हमारे पास हैं वे मैं आपको दे दूँगा। कुछ प्रकाशमनु जी दे देंगे और राष्ट्रबंधु जी तो हैं ही। सबके साझे सहयोग से वह कार्य पूरा हुआ। सौ तो नहीं 'हिंदी बालसाहित्य की 75 श्रेष्ठ पुस्तकें' ही कर पाई।
डॉ. प्रकाश मनु
सर्जक रचनाकार, प्रबुद्ध आलोचक, कुशल संपादक, इतिहासकार डॉ. प्रकाश मनु। हिन्दी बालसाहित्य का सौ वर्षों का इतिहास जिनकी स्मृतिकोष में दर्ज है, ऐसे सरस्वती के वरद् पुत्र को साहित्य-जगत के सभी लोग जानते हैं। उन्हें पता है कि वह एक फकीर स्वभाव के संत-रचनाकार हैं। वह इतना ही कहते हैं कि— "मैं तो बस एक तपस्वी हूँ और साहित्य-साधना में रत् हूँ। यही मेरी तपश्चर्या है। इसी में जीता हूँ, इसी के सुख में तल्लीन रहता हूँ। मेरी कोई इच्छा अपूर्ण नहीं रही है।" सच मैंने उन्हें सदा आप्तकाम निष्कामी मात्र सरस्वती की साधना करते पाया है। उनकी साहित्य के प्रति समर्पित साधना के फलस्वरूप ही आज आने वाली पीढ़ी हिन्दी बालसाहित्य के इतिहास से परिचित हुई है।
डॉ. राष्ट्रबंधु
इन संस्मरणों में आप यायावर बालसाहित्यकार राष्ट्रबंधु जी भी मिलेंगे। मित्रों के मित्र थे मूर्धन्य बालसाहित्यकार डॉ. राष्ट्रबंधु। बालसाहित्य के प्रति तन-मन-धन से समर्पित एक ऐसे साधक का नाम है जिनकी सतत् साहित्य-साधना और कर्त्तव्यनिष्ठता उन्हें देश के तपस्वी-ज्ञानियों की उस सूची में शामिल करती है, जिन्होंने मृत्यु पर्यंत बालसाहित्य के प्रति अपनी अटूट निष्ठा का निर्वाह किया। बाल कल्याण को साहित्य में शब्द-रूप में निबद्ध करके वह अपनी भावी पीढ़ी के लिए छोड़ गए हैं। बालसाहित्य के अधिकांश दिग्गज विद्वानों से मेरा परिचय डॉ. राष्ट्रबंधु जी के माध्यम से ही हुआ। मुझे बालसाहित्य-सम्मेलनों में राष्ट्रबंधु जी का यादगार सान्निध्य मिला। बालसाहित्य-सम्मेलनों में सहभागिता के लिए वह जिस भी राज्य या शहर में गए वहाँ के तीर्थ और मंदिरों के दर्शन अवश्य करते। न केवल स्वयं वरन् अन्य बालसाहित्यकारों के जाने की भी सामूहिक रूप से व्यवस्था करना कभी नहीं भूलते। मैंने स्वयं उनके साथ अनेक बार निकटवर्ती तीर्थों के दर्शन किए हैं। सच! बहुत कुछ सीखा यायावर बालसाहित्यकार और उनके सान्निध्य से। उनके साथ इन यात्राओं से न केवल तीर्थाटन का लाभ मिलता वरन् बालसाहित्य विषयक चर्चा भी साथ-साथ होती रहती। संगोष्ठियों में सहभागिता के साथ-साथ की गई यात्राओं के अनेक रोचक संस्मरण हैं।
देवेन्द्र कुमार
बालसाहित्यकार देवेन्द्र कुमार जी से मेरी पहली मुलाकात नंदन पत्रिका के कार्यालय में हुई थी। वह 'नंदन' में प्रकाशित होने वाली कहानियों को देखते थे। भारतीय जी के पास कोई भी साहित्यकार अपनी कहानी देने आता, भारतीय जी उन्हें देवेन्द्र जी के पास भेजते थे। वर्ष 1996 में 'नंदन' के विशेषांक के लिए मेरा कहानी लिखना शुरू हुआ था। बालसाहित्य लेखन में यह मेरा पहला कार्य था। कहानी नंदन पत्रिका में छपी। शीर्षक था 'पुल टूट गया'। देवेन्द्र जी ने कहानी पढ़ी और बड़े प्रसन्न हुए। बड़े ध्यान से कठिन शब्दों को निकालकर उनकी जगह आसान शब्द रखे पढ़ते-पढ़ते उन्होंने फिर दो-चार शब्दों को अंडरलाइन किया और उनकी जगह सरल शब्द बताए। खैर कहानी चयनित हुई और मैं बहुत प्रसन्न हुई। बालसाहित्य लेखन में यह मेरा पहला कार्य था। इसके बाद एक 'प्राचीन अंक' अथवा 'उपहार' विशेषांक के लिए और दूसरा परीकथा विशेषांक के लिए मैं कहानी अवश्य लिखती जिसमें यथास्थान देवेन्द्र जी 'फिनिशिंग टच' देते और कहानी सुन्दर बन जाती। देवेन्द्र कुमार जी के स्टाफ का कहना था कि वह खिड़की खोलते ही बाहर का दृश्य देखकर झट कहानी बना लेते थे और ऐसी कहानी का विषय भी सर्वथा नवीन और अभूतपूर्व होता था।
डॉ. भैरूँलाल गर्ग
साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में कर्मयोगी पुरुष डॉ. भैरूँलाल गर्ग जी के साथ पिछले छब्बीस वर्ष की स्मृतियाँ हैं। अनेक बालसाहित्य-सम्मेलनों के कार्यक्रम में हुई भेंट और एक साथ की गई सहभागिता में से कुछ स्मृतियों को मैंने संस्मरण में पिरोने का प्रयास किया है। विशेष कर उन स्मृतियों को जिनमें उनके जीवन-मूल्यों उनके आदर्शों ने प्रभावित किया, प्रोत्साहित किया। विनम्रता, सहजता, सरलता, मधुरता, निरभिमानिता, उनके व्यक्तित्व की ऐसी खूबियां हैं, जो किसी को भी पहली ही मुलाकात में अपना बना लेती हैं। कोरोना की दैवीय आपदा के रूप में आई महामारी ने विश्व के बड़े-बड़े कार्य-कलापों को बाधित कर दिया था। उनमें से कुछ तो हमेशा के लिए बंद हो गए। गर्ग साहब की भी उस अवधि में पत्रिका नहीं आ पाई किंतु उसे उन्होंने बंद होने नहीं दिया और हालात सुधरते ही पत्रिका का पुनः प्रकाशन शुरू कर दिया। गर्ग साहब के भीतर के बालसाहित्य प्रेमी ने अपनी संततिवत् पत्रिका को पुनर्जीवित किया। गर्ग साहब को जो मान-सम्मान बाल साहित्य जगत और पत्रकारिका जगत ने प्रदान किया है, उसका कारण है उनका 'बाल वाटिका' को बाल साहित्य के साथ बाल बाल विमर्श की पत्रिका बनाना। गर्ग साहब की साधना एवं प्रसिद्धि में उनका आत्मविश्वास और कठिन श्रम, बाल साहित्य के प्रति विशेष समर्पण का बहुत बड़ा योगदान है। एक सच्चे अध्यापक की गरिमा, और महत्ता को प्रतिष्ठित करते हुए इन्होंने अपने लेखन कार्य को निरंतर ऊंचे शिखर पर पहुँचाने का सफल प्रयास किया है। अपने विषय के प्रकांड विद्वान एवं कभी हार न मानने वाले संघर्षशील योद्धा के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई है।
पद्मश्री उषा यादव
मेरी अगली प्रिय बालसाहित्यकार हैं पद्मश्री उषा यादव जी। बालसाहित्य-समारोहों में अक्सर उषा जी से मुलाकात होती। हम एक-दूसरे के कमरों में बैठते। सभी साहित्यकारों के सम्मेलन का इससे बढ़िया समागम स्थल क्या हो सकता है? आपस में अपनी किताबें एक-दूसरे का भेंट में देते। छोटी सी अनौपचारिक काव्यगोष्ठी हो जाती। उषा जी ने कई सेमिनारों में अपने पति डॉ. राजकिशोर जी के साथ सहभागिता की है। दिल्ली में भी आयोजित यहाँ एक सुखद स्थिति यह भी रही है कि उनकी सुयोग्य चित्रकार एवं साहित्य पुत्री डॉ. कामना सिंह भी उनके साथ-साथ रही हैं। डॉ. उषा यादव जी का मेरा लगभग 20-22 वर्ष पुराना संबंध आज भी और प्रगाढ़ता की ओर बढ़ता जा रहा है। इस टिकाऊपन का कारण है उषा जी की सादगी, सहजता और सरलता। उषा जी एक अच्छी इंसान हैं। दोस्ती की कद्र समझने वाली हैं। मन-वचन-कर्म से हितैषी, आत्मीयता से लबालब भरा जो उनका चरित्र-चित्र मेरे मन में उभरता है, वह औरों से बिल्कुल अलग है। विनम्र, सौम्य व्यक्तित्व की धनी उषा जी किसी को भी अपनी सादगी, सहजता से अपना बना लेती हैं और जो एक बार अपना बन गया तो वह हमेशा के लिए अपना बन गया।
डॉ. दिविक रमेश
दिविक जी से जुड़ी अनेक स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क की मंजूषा में वर्षों से सुप्त पड़ी थीं जो अब उचक-उचक कर मुझसे कहने लगीं कि अब आप हम पर कुछ लिखिए। बस मैंने तय किया कि मैं दिविक जी पर एक संस्मरण लिखूँगी और मैंने संस्मरण शुरू कर दिया। डॉ. दिविक रमेश से मेरा परिचय बहुत पुराना है। रमेश शर्मा को मैं सन् 1969 से जानती हूँ, जब हम दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय में एम-ए. के विद्यार्थी थे। तब वह- दिविक रमेश नहीं थे। उन्हें मैं केवल जानती थी कि वह एम-ए. के सन् 1969 के बैच के हैं। दिविक बने रमेश शर्मा अपनी बहुमुखी प्रतिभा के कारण विभाग की अन्य गतिविधियों में भी खूब सक्रिय थे। दिविक जी को व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं जानती थी। इतना जानती थी कि वह एम-ए. फाइनल में थे और मैं एम-फिल प्रिवियस में थी। वह दिल्ली विश्वविद्यालय की शोध संगोष्ठी के संयोजक थे। और कई कार्यक्रम करवाते थे। और अब मोती लाल नेहरू कॉलेज में पढ़ाते हैं। सन् 2000 में वह उसी कॉलेज के प्राचार्य बन गए। दिविक जी अपने प्राचार्य पद को खूबसूरती से संभालते हुए एक दिन अपने सेवाकाल की अवधि को पूरा करके वर्ष 2011 में ससम्मान सेवानिवृत्त हो गए। उनके मित्र संदीप मारवाह, जो नोएडा के मारवाह फिल्मसिटी स्टूडियो के मालिक भी है, ने ओपन ऑडिटोरियम में उनके विदाई समारोह का भव्य आयोजन किया। इसमें उनके साहित्यिक मित्रों के साथ मैं भी निमंत्रित थी।
कृष्ण शलभ
मेरी स्मृतियों में बसे कृष्ण शलभ जी उन गीतकारों में से थे जिनके गीतों, बालगीतों का अंदाज अपने सौष्ठव से पाठकों के मन में अपनी प्रतिगूँज देर तक छोड़ता था। मंच पर जब वे सस्वर उनका पाठ करते तो श्रोताओं को उनका अंदाज प्रभावित करता। देशभर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने गीतों के माध्यम से पाठकों के अंतर्मन में उतरकर एकाकार हो जाने वाले, भाव एवं काव्यत्व की दृष्टि से उन्हें उनके गीतों के उत्कर्ष ने अपने प्रशंसकों के हृदय में एक प्रतिष्ठित स्थान दिया। सहारनपुर की तो वह धड़कन थे। हों भी क्यों न। उनका जन्म सहारनपुर में, उनकी कर्मस्थली सहारनपुर जहाँ उनका साहित्यिक कृतित्व फला-फूला और फिर महाप्रस्थान की स्थली भी सहारनपुर। शलभ जी का सर्जक व्यक्तित्व प्रतिभा का विस्फोट था। कविता एक बहता हुआ पानी है। उसके बहाव को आप रोक नहीं सकते। रचना, रचनात्मकता, सृजन, सृजनात्मकता विचार, चिंतन, कलात्मकता यदि आप के अंदर नहीं तो आप कवि नहीं बन पाएँगे। सायास कोई कवि नहीं हो सकता। उन्हें प्रकृति ने कवि बनाया था और फिर उन्होंने अपनी खुद की शैली विकसित की।
रत्नलाल शर्मा
रत्नलाल शर्मा जी से मेरा प्रथम परिचय सन् 1996 में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय के रिसर्च फ्लोर पर सभी प्राध्यापक बैठते थे। मेरा पहला परिचय डॉ. शारदा लाल ने ही करवाया। उन्होंने साहित्य की साधना की है और सबसे बड़ी साधना जीने की कला की। वह सदा अपनी विद्वत्ता एवं अपने मधुर व्यवहार के कारण अनेक मनीषियों/रचनाकारों/पत्रकारों/प्रकाशकों/प्रवक्ताओं और प्रोफेसरों से घिरे रहते। संगोष्ठियों/सेमिनार साहित्य-सम्मेलनों के प्रोग्राम वे वहीं बैठ कर बनाते। वह अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े थे। कभी थकान का कोई चिह्न उनके मुख पर दिखाई नहीं दिया। वह सदा प्रसन्न रहते और उनका मुख-मंडल सदा खिला रहता। अस्वस्थ होना, अस्वस्थ दिखना अथवा स्वयं को अस्वस्थ मानना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था। मनुष्य प्रकृति का या परिस्थिति का गुलाम है इस वाक्य से उन्हें सख्त चिढ़ थी। वह सदा यही तर्क देते मनुष्य अपनी परिस्थितियों को अपनी इच्छा शक्ति के सहारे बदलने में पूर्ण समर्थ है। हो सकता है कि भीतर से कहीं उन्हें कभी स्वास्थ्य को लेकर बेचैनी होती हो, किन्तु उन्होंने कभी उसे स्वीकार नहीं किया। सातों दिन यूनिवर्सिटी रिसर्च फ्लोर पर आना उनकी दिनचर्या का प्रमुख अंग था। अपने अंतिम दिन यानी शनिवार 30 अगस्त को भी वह वहाँ आए और तीन बजे तक वहीं रहे। वह जो भी रचना लिखते, कविता/कहानी/लेख/अनुवाद कुछ भी करते वह उनका 'फेयर और फाइनल' होता। कभी काट-छाँट नहीं करते। यहाँ तक कि उसे दोबारा पढ़ते भी नहीं थे। हर रचना वह केवल एक बार ही लिखते। मृत्यु का वरण भी उन्होंने इसी प्रकार किया। बिना किसी रिहर्सल के वे चले गए। उनकी हृदय गति पहली बार जो रुकी तो रुक ही गई। स्वभाववश उन्होंने अपनी मृत्यु को भी 'फेयर एंड फाइनल' बना लिया। पहली बार में ही अस्वस्थ हुए बिना किसी स्वजन/परिजन को सूचित किए ही वे चले गए। सृजन सुख उनके लिए सबसे बड़ा सुख था। एक ओर आलोचना उनकी प्रिय विधा रही तो दूसरी ओर बालसाहित्य। एक के लिए गंभीरता अपेक्षित है तो दूसरे के लिए चपलता। बाल कविता रचकर उन्हें सर्वाधिक सृजन-सुख प्राप्त होता था। उसे तरन्नुम में गाकर वह जब सुनाते तो उनके भीतर का कोई बालक आज भी अठखेलियाँ कर रहा है। गुनगुना रहा है। उनकी बालसुलभ कोमलता, भोलापन और चपलता की झलक ही उनके व्यक्तित्व की पूँजी थी। बच्चों की भाँति ही उल्लसित होकर वह बाल कविता गाकर सुनाने लगते तो लगता कोई सरल बालक ही सामने बैठा हो।
क्षमा शर्मा
अपने जीवनकाल के विगत लगभग 52 वर्षों से मैं और क्षमा जी एक दूसरे के संपर्क में/सान्निध्य में हैं। इस अंतराल में मैंने कुछ बाल संगोष्ठियों में, बालसाहित्य की वर्कशॉप में एक साथ सहभागिता की है। इनमें उनके सहज अहंकार-शून्य व्यक्तित्व ने, उनके प्रखर चिंतन ने, निस्संदेह मुझे सम्मोहित किया है। मैं ही क्यों उनकी विद्वतापूर्ण बहुज्ञता से वर्कशॉप में उपस्थित सभी प्रतिभागी भी प्रभावित होते। क्षमा जी से जितनी बार मिलना हुआ हर बार उनसे मिलने पर एक नई ताज़गी, नई स्फूर्ति और नया उल्लास महसूस हुआ। उनसे मिलना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। वर्ष 2022 में एनसीईआरटी की निरंतर पंद्रह दिन की गोष्ठियों/मुलाकातों ने तो अभिभूत कर दिया। उनका हृदय सचमुच बाल-सरलता का प्रतीक है। बच्चों की समस्याओं से उनके मनोविज्ञान से वह भलीभाँति परिचित हैं। यही कारण है कि वह बालकल्याण के लिए आयोजित सेमिनार-संगोष्ठियों में आमंत्रित होती हैं। वह बालसाहित्य की मर्मज्ञ पुरोधा तो वह हैं ही स्त्री विमर्श की भी पुरज़ोर समर्थक हैं। उन्हें इस विषय पर टी-वी- पर चर्चा करते भी सुना है और अखबारों में पढ़ा भी है।'स्त्री का समय' जब मैंने पुस्तक पढ़ी और क्षमा जी के विचारों से अवगत हुई तो पाया कि जिस क्षमा को मैं जानती थी, वह तो बालसाहित्यकार है लेकिन इस पुस्तक ने बताया कि उनका एक और रूप भी है। क्षमा जी केवल बालसाहित्यकार ही नहीं वह प्रगतिशील लेखिका हैं। उनकी मेधा प्रकाशन से प्रकाशित स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री का समय' है जिसमें नारी विषयक समस्या या स्थिति के भिन्न कोणों, मानसिकताओं, दृष्टियों, संस्कारों, वैचारिक प्रतिबद्धताओं आदि को समझने-समझाने का प्रयास किया है।
सुनीता मनु
मेरा अंतिम संस्मरण है 'अतिथि वत्सला सुनीता मनु' जी का। वह बालसाहित्यकार हैं, विशेष रूप से बालकहानीकार हैं। वह आलोचक हैं लेकिन सबसे ऊपर वह एक संवेदनशील, भाव-प्रवण इंसान हैं। दूसरों के हृदयतल में बैठने की कला और अपने मधुर व्यवहार से अपना बना लेने की कला का कमाल है जिसके मूल में है उनकी निरभिमानिताजन्य विनम्रता। जिस अंतरंग भाव से वह मिलती हैं, असीम स्नेह से बाँहों में भर लेती हैं तो मन में एक गुरूर आ जाता है कि मैं उनके हृदय के कितनी निकट हूँ। यह मेरा सौभाग्य है कि वह मुझे सखीवत् मानती हैं। हालाँकि मनुजी की मैं शकुंतला दीदी हूँ। सुनीता जी के व्यक्तित्व का वह गुण जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, वह है उनका आतिथ्य प्रेम। अतिथियों के लिए स्वयं अपने हाथ से पूरा नाश्ता और फिर दोपहर का भोजन बनाना उनकी कर्मठता को तो दर्शाता ही है लेकिन उसमें जो भावना छिपी है वह उनसे अकेले सब काम करवा लेती है वह है उनका मनु जी के प्रति अगाध प्रेम एवं पति-निष्ठा। तभी तो वह उनके साहित्यिक मित्रों के स्वागत के लिए हर समय तैयार रहती हैं। वह उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानती हैं। बड़ों के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति प्रेम स्पृहणीय है। आत्मीयता का यह विस्तार मुग्ध करता है। सुख देता है। वहाँ जाकर, उनसे मिलकर ऐसे लगता है आप किसी प्रगाढ़ स्नेही मित्र के आतिथ्य में हैं, जो अपने सौम्य, मुस्कुराती भाव-मुद्रा, हँसकर मिलने के अपने मृदु व्यवहार से बरबस बाँध लेता है, जो भी उनसे मिलता है, हमेशा के लिए उनका अपना बन जाता है। नितांत निरभिमानिता उनके अपना बना लेने वाले सरल, निष्कपट, शालीन व्यक्तित्व का प्रतीक हैं। 'जीने की कला' सीखनी है तो सुनीता जी को पढ़ना चाहिए, गुनना चाहिए। सच्चा इंसान अपने भीतर जगाना हो तो सुनीता जी की बालकहानियाँ पढ़नी चाहिए। सुनीता जी से जुड़े अविस्मरणीय लम्हों को मैं आज भी नहीं भूली हूँ और न भूलना चाहती हूँ। आज अतीत की उन मुलाकातों को जब मैं याद करती हूँ तो उनकी सहृदयता और सरलता से अभिभूत हो जाती हूँ। खुला स्वभाव, हँसमुख चेहरा सामने आ जाता है। सुनीता जी की बड़ी-बड़ी आँखों में स्नेह और आत्मीयता आत्मविभोर कर देती हैं।
बालसाहित्यकारों से जुड़ी मेरी यह स्मृतियाँ पुस्तक में छपी संस्मरण हो गई। लगभग तीन दशकों के सुदीर्घ अंतराल बहुत सी घटनाएँ स्मृति से उतर चुकने की स्थिति में हैं। जीवन-यात्रा के पथ में मिले कई महत्वपूर्ण चेहरे अब धुंधले भी पड़ने लगे हैं। बचपन में मिले कई महत्वपूर्ण परिचय अब आयु के वार्धक्य की परतों में दबते जा रहे हैं। कुछ स्नेहमयी आँखें अभी भी इन धुंधली आँखों में बसी हुई हैं। मेरा प्रयास रहेगा कि उन चित्रों को भी कागज़ पर उतार लूँ ताकि वे स्मृतियाँ भी संस्मरण बन जाएँ।
संस्मरण विधा की शैली से परिचित कराने का श्रेय मनु जी को है।