मध्ययुगीन हिन्दी कविता में निर्गुण-सगुण-तत्त्व-समन्वय
दृश्यमान जगत् के अदृश्य स्रष्टा के साक्षात्कारात्मक अनुभव को दर्शन कहा गया है। दर्शन मिथ्या को छोड़कर सत्य की खोज करता है। ईश्वर तीनों कालों में सत्य है। उसके संबंध में चिंतन मनुष्य की जिज्ञासा का प्रमुख विषय रहा है। आदिकाल से लेकर आज तक यदि सबसे अधिक चिंतन किसी विषय पर हुआ है तो वह परोक्षसत्ता और इसके स्वरूप पर ही हुआ है।
ईश्वर के सूक्ष्म आध्यात्मिक अस्तित्व का इतिहास मानव-जीवन के अस्तित्व के इतिहास से ही जुड़ा है। सृष्टि है तो उसका निर्माता भी होगा। उस शाश्वत सूक्ष्म सत्ता को प्रमाणित करने के लिए सभी ने अपनी-अपनी युक्तियों को प्रस्तुत किया। निर्गुणवादियों की दृष्टि में ईश्वर की तात्विक सत्ता है, मूर्त सत्ता नहीं। उस सत्ता का न आदि है, न अंत, न अवयव। वह नित्य है, शाश्वत है, निर्विकार है, निरपेक्ष है। सब उपाधियों एवं गुणों से रहित निरुपाधि एवं निर्गुण है। उसके संबंध में गुण का विधान करना उसे सीमित करना है। सब सीमाओं से परे वह असीम तत्व है। वह सर्वव्यापक है, हर मानव के घट में बसता है। ईश्वर इसी रूप में सत्तावान है। ईश्वर का अस्तित्व भावनात्मक रूप से प्रमाणित किया जा सकता है। उसकी सत्ता तार्किक शब्दों के ज्ञान-जाल से, बुद्धि और युक्ति से कभी भी प्रमाणित नहीं की जा सकती।
सगुणवादियों ने ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य तथा तेज इन षड गुणों से संपन्न ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया और उसकी उपासना की। मनुष्य बिना किसी सत्ता के उपासना कैसे कर सकता है? उपासना के लिए ईश्वर की सत्ता में निहित ईश्वर के गुणों का भी समावेश ज़रूरी है। सगुण ईश्वर ही उपासना का भाव-केंद्र है। उसे एक व्यक्तित्व प्रदान किया गया। अपनी-अपनी भावना के अनुसार उसके साथ विविध संबंध स्थापित किए गए। सगुणवाद में ईश्वर के व्यक्तित्व को आवश्यक माना गया है। मनुष्य के मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव तभी आता है जब वह ईश्वर को इस योग्य समझता है कि ईश्वर उसकी भावना, श्रद्धा को समझ रहे हैं, महसूस कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में भक्त उसे अपनी तरह व्यक्तित्वपूर्ण समझता है। वह अपने उपास्य में सखा-भाव, माधूर्य-भाव, देव-भाव जैसे विविध संबंध आरोपित कर लेता है। निर्गुणवादी संतों ने अपने आराध्य के साथ जो विभिन्न रागात्मक संबंध स्थापित किए हैं वे मात्र निराकार-निर्गुण प्रभु के प्रति नहीं हैं। उस समय उनके मन में निश्चय ही साकार एवं सगुण की प्रतिष्ठा हो जाती है। इस प्रकार संतों का निर्गुण-मत भी गुणों को साथ लेकर चलता है। उपास्य की भक्तवत्सलता, उसकी अगाध करुणा, उपासक की भक्ति को तीव्र एवं प्रगाढ़ बनाती है। भक्त उसके दयालु, शरणागत-वत्सल आदि रूपों का स्तवन करता है और अपनी भावना के अनुरूप उस पर विविध गुणों का आरोप कर गुणाकर रूप में उसकी महिमा का गान करता है।
ईश्वर के सगुण रूप को स्वीकार कर उसे विश्व का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहारकर्ता माना गया। ईश्वर जगत् का स्वामी तथा नियंता है इसलिए जीव उसकी उपासना करता है उसमें करुणा, दया आदि सहृदयतापूर्ण गुणों को स्वीकार कर उसकी पूजा, उपासना करता है।
निर्गुण और सगुण दोनों ही भावनाओं का उद्गम उस एक 'सत्य' की अनुभूति के पश्चात् हुआ, जिसके सर्वशक्तिमत्ता, सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता आदि तात्विक गुण हैं। भारतीय चिंतनधारा में अनेक दार्शनिकवाद प्रचलित हैं, जिनमें कुछ निर्गुण-सत्ता में विश्वास रखते हैं और कुछ सगुण ब्रह्म को मान्यता देते हैं। ब्रह्म के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों की चर्चा भारतीय साहित्य के आदिकाल से होती आई है। साहित्य के विकास के साथ ये दोनों दार्शनिक धाराएं विकसित होती गईं। मध्ययुग में निर्गुण और सगुण भक्तिधारा की अनेक शाखाएं अपनी-अपनी गति से प्रवहमान रहीं। इस युग के साहित्य में मिलने वाले ब्रह्म के दो रूप बहुत स्पष्ट हैं— अव्यक्त रूप अर्थात् निर्गुण रूप, व्यक्त रूप अर्थात् सगुण रूप।
मध्यकाल में निर्गुण-सगुण की प्रवृत्ति के आधिक्य के आधार पर शुक्ल जी ने निर्गुण-भक्ति और सगुण-भक्ति-काव्य का विभाजन किया। आने वाले विद्वानों ने अपनी मान्यताओं को शुक्ल जी की विचारधारा के संदर्भ में उपस्थित किया और निर्गुणोपासकों की रचनाओं को निर्गुण-काव्य और सगुणोपासक भक्तों के साहित्य को सगुण-काव्य कहकर विवेचित किया। उन दोनों में व्याप्त निर्गुण-सगुण के समन्वय की स्थिति को ढूंढकर प्रस्तुत करने की ओर आचार्य शुक्ल और उनका अनुगमन करने वाले हिंदी आलोचकों का ध्यान नहीं गया। मध्ययुगीन निर्गुण और सगुण साहित्य पर सूक्ष्मतापूर्वक गहन विचार किया जाए तो मैं विनम्रता पूर्वक कहना चाहूंगी कि शुक्ल जी द्वारा किया गया यह विभाजन पुनर्विचार की अपेक्षा रखता है। निर्गुणवादी ब्रह्म के मात्र निर्गुणत्व का और सगुणवादी ब्रह्म के मात्र सगुणत्व का ही जयघोष नहीं करते वरन् दोनों में समन्वय स्थापित करने वाले ऐसे अनेक उद्गार हैं जो इस साहित्य पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करते हैं। इस युग के साहित्य में निर्गुण-सगुण का जो अंतर्विरोध दिखाई देता है उसके निराकरण की आवश्यकता स्वतः सिद्ध है। मध्ययुगीन भक्ति साहित्य के वर्षों के अध्ययन-अध्यापन करते समय कबीर, नानक, दादू, रैदास, सुन्दरदास आदि संतों एवं सूर, तुलसी आदि भक्तों के काव्य का गहराई में जब अवगाहन किया तो अनुभव हुआ कि दोनों का केंद्रीय भाव निर्गुण-सगुण के समन्वय का है न कि विरोध का। अतः यह आवश्यक प्रतीत होता है कि दोनों की रचनाओं के आलोक में उनके संबंध में की गई स्थापनाओं का पुनःपरीक्षण किया जाए।
निर्गुणवाद और सगुणवाद मध्ययुगीन भक्ति-साहित्य के दो पक्ष हैं। निर्गुण-भक्ति-साहित्य की दोनों धाराओं संतकाव्यधारा एवं सूफ़ीकाव्यधारा में निर्गुण एवं निराकार ब्रह्म के प्रति दृढ़ आस्था दिखाई देती है। इसी प्रकार सगुणभक्ति की उभयशाखाओं रामभक्ति-शाखा एवं कृष्णभक्ति-शाखा में भक्त कवियों का ब्रह्म के सगुण एवं साकार स्वरूप के प्रति झुकाव है। प्रत्यक्षतः दोनों में पार्थक्य दिखाई देता है। एक की भक्ति का आलंबन गुण, विशेषण, आकार और उपाधि से परे निर्गुण, निर्विशेष, निराकार और निरुपाधि ब्रह्म है तो दूसरे की भावना सगुण, सविशेष, साकार और सोपाधिक के प्रति समर्पित है। किंतु तथ्य यह है कि दोनों धाराओं में ब्रह्म के निर्गुण एवं सगुण दोनों प्रकार के वर्णन पाए जाते हैं। निर्गुणवादियों ने ब्रह्म के निर्गुण रूप के साथ सगुण का और सगुणवादियों ने सगुण रूप के साथ-साथ निर्गुण का बड़ी सूक्ष्मता के साथ वर्णन किया है। दोनों ने ब्रह्म का वर्णन कुछ इस प्रणाली के साथ किया है कि वहां निर्गुण और सगुण के समन्वय की पुष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ऐसे अनेक स्थल हैं जहां निर्गुण-कवियों द्वारा ब्रह्म के सगुणत्व और सगुण-भक्त कवियों द्वारा ब्रह्म के निर्गुणत्व की खुली घोषणा हुई है। 'खुले नैन पहिचानों हँसि-हँसि सुंदर रूप निहारौ।' जैसी निर्गुण संतों की उक्तियां सगुणवाद के कितनी नज़दीक हैं। इसमें कबीर ने अरूप की रूपानुभूति का ही स्पष्ट वर्णन किया है। ऐसे अनेक अन्य स्थल हैं जहां निर्गुणवादियों की विचारधारा अनेक अंशों में सगुणवाद के मूल तत्वों से अनुप्राणित है। दूसरी ओर सगुण-भक्तों ने बार-बार इस सत्य की घोषणा की है जो प्राकृत गुणों—सत्व, रज और तम से रहित निर्गुण है वही दिव्य गुणों से संपन्न होने के कारण सगुण है। दोनों में कोई विरोध नहीं। सगुणवादियों के अनुसार भगवान अज होकर भी जन्म ग्रहण करते हैं। अविकारी होकर भी नाना प्रकार के विकारों को स्वीकार करते हैं। देशकाल से परे होकर भी अपने को देशकाल के भीतर प्रकट करते हैं। ब्रह्म की विरुद्धधर्माश्रयता के कारण उन्होंने ब्रह्म के निर्गुण और सगुण रूपों में अभेद माना। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठता है कि क्या निर्गुणवादी कवियों को 'शुद्ध निर्गुणवादी' कवि कहा जा सकता है? अथवा क्या सगुणवादी कवियों को 'शुद्ध सगुणवादी' कहना समीचीन है? जबकि दोनों में एक दूसरे के तत्व समाहित हैं। दोनों ने ब्रह्म के उभय रूपों को साथ-साथ ग्रहण किया है। निर्गुणोपासक कबीर 'गुण मै निरगुंन, निरगुंन बाट छांडंी कीयूँ बहियै' की बात कहते हैं। अपने आराध्य को 'राजा राम' कहकर संबोधित करते हैं। गुरु अर्जुनदेव के राम निर्गुण-सगुण तथा निराकार-साकार दोनों हैं। 'निरगुण सरगुण हरि-हरि मेरा' अथवा 'निरंकार आकार आदि निरगुन सरगुन एक' जैसी उक्तियां उनके समन्वयात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। दूसरी ओर सगुणवादी तुलसी हृदय में निर्गुण और नेत्रों में सगुण की छवि साथ-साथ लेकर चलते हैं। 'दोहावली' में उनका प्रसिद्ध कथन 'हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन' इसी समन्वय की पुष्टि करता है। इसी समन्वय के स्वर सूर काव्य में भी मिलते हैं। 'वेद उपनिषद् जासु को निगुनहिं बतावै। सोइ सगुन है नंद की दांवरी बँधावै' जैसे कथन इसका प्रमाण हैं।
समन्वय के इस विचारणीय प्रश्न के निर्णय से पूर्व दोनों की ब्रह्म-विषयक धारणा का सम्यक् विवेचन-विश्लेषण भी अत्यंत अनिवार्य है। किसी के साथ 'निर्गुणवादी' या 'सगुणवादी' कोई भी विशेषण लगाने से पूर्व इनकी स्पष्ट अवधारणा से परिचित होना आवश्यक है क्योंकि दोनों ने निर्गुण-सगुण की सत्ता को एक साथ स्वीकार किया है।
मध्ययुगीन साहित्य पर अनेक दृष्टियों से गहन चिंतन हुआ है। हर शाखा पर विपुल अनुसंधान हुआ है किंतु निर्गुण-सगुण के समन्वय पर अलग से सम्यक् अध्ययन-अनुसंधान का कार्य नहीं हुआ। यद्यपि विविध शोध-ग्रंथों में अथवा फुटकर निबंधों के रूप में कुछ सामग्री यथाप्रसंग अवश्य मिलती है।
इस दिशा में प्रयाग विश्वविद्यालय से डी. फिल्. के लिए स्वीकृत डॉ. आशा गुप्ता का शोध-प्रबंध पठनीय है। इसका विषय भक्ति-दर्शन और काव्य की दृष्टि से मध्ययुगीन सगुण और निर्गुण हिंदी साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन है।
केवल संत काव्य पर पृथक् रूप से डॉ. भृगुनाथ तिवारी द्वारा प्रणीत शोध ग्रंथ 'हिंदी संत काव्य में सगुण भावना' है, जिसमें लेखक ने निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक संतों के काव्य में सगुण के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम आदि तत्वों का उल्लेख कर उनके सगुणत्व को सिद्ध किया है। प्रमुख संत कवियों की विशिष्ट भाव-भक्ति के अनेक सूत्रों का विवेचन भी किया है।
डॉ. कपिलदेव पांडेय का शोध-प्रबंध 'मध्यकालीन साहित्य में अवतारवाद' है, जिसमें निर्गुण ब्रह्म के सगुण रूप में अवतार का विवेचन है। 'हिंदी काव्य की निर्गुणधारा में भक्ति' काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित डॉ. श्यामसुंदर शुक्ल का शोध-प्रबंध है, जिसमें उन्होंने मध्ययुग की निर्गुणधारा में भक्तिभाव के उद्दाम प्रवाह की चर्चा की है, उन्होंने केशव और राम को भक्त कहा है। उनका निष्कर्ष है कि संतों का राम सहज भाव से निर्गुण और निराकार था और अपने सहज प्रभाव में सगुण तथा उत्कृष्ट गुणागार।
निर्गुण-भक्ति-साहित्य के कवियों का सांगोपांग और व्यवस्थित अध्ययन करने वाले डॉ. बड़थ्वाल ने अत्यंत संक्षेप में संत गुरुओं में उपलब्ध सगुणवाद के मेरुदंड अवतार और उसकी प्रवृत्तियों का विवेचन किया है।
श्री परशुराम चतुर्वेदी ने 'उत्तरी भारत की संत परंपरा' में संतों में प्रचलित अवतारों का परिचय दिया है।
मध्ययुगीन कविता में निर्गुण-सगुण के समन्वय पर पृथक् रूप से कार्य नहीं हुआ। इस विषय में गवेषणात्मक अध्ययन की आवश्यकता को देखते हुए शोध-कार्य का यह विषय लिया। पारिवारिक आस्थापूर्ण संस्कार के परिणाम-स्वरूप उपजे भक्त एवं भगवान् के प्रति दृढ़ अनुराग ने इस विषय पर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। ब्रह्म निर्गुण है अथवा सगुण अथवा उभय रूप है, इस जिज्ञासा ने इस कार्य को कार्यान्वित करने में सबल भूमिका निभाई। प्रस्तुत है इस विस्तृत कार्य की संक्षिप्त रूपरेखा—
प्रथम अध्याय 'निर्गुण तथा सगुणधारा की दार्शनिक पृष्ठभूमि' से संबद्ध है। इसके अंतर्गत तीन उपखंड हैं। प्रथम खंड में भक्तिकाव्य की प्रेरणा-स्रोत उन राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का अध्ययन किया गया है, जिनकी मध्यकालीन भक्तिसाहित्य के सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूसरे खंड में भारतीय दर्शन की प्राचीन परंपरा का विवेचन करते हुए अत्यंत संक्षेप में 'नास्तिक दर्शन' और 'आस्तिक दर्शन' के भेद-उपभेदों पर विचार किया है, जिनका संतों और भक्तों पर प्रभाव पड़ा है। निर्गुण और सगुण का जो समन्वय मध्यकालीन कविता में दिखाई देता है उसे मात्र मध्यकाल की उपज नहीं कहा जा सकता। इसका इतिहास बहुत पुराना है। अतः दर्शन की भारतीय परंपरा का अनुशीलन भी आवश्यक है। मध्ययुगीन रचयिता भक्त पहले है कवि या दार्शनिक बाद में। इनके दार्शनिक सिद्धांतों को भक्ति-साहित्य कहा गया है, दर्शनशास्त्र नहीं। मध्यकाल का एक ही दर्शन है, वह है भक्ति-दर्शन। यहां दर्शन की हर धारा भक्ति के सागर में आकर समाहित हो जाती है। दर्शन ने अपने व्यावहारिक रूप में भक्ति का रूप धारण कर लिया। भक्तिकाल की निर्गुण और सगुण दोनों धाराओं ने जिस दर्शन को ग्रहण किया है वह उनके अनुभव का दर्शन है। दोनों की दृष्टि में तत्व एक है जो निर्गुण-निराकार है वही देश, काल, पात्र के अनुसार सगुण-साकार रूप धारण करता है और जो भक्तों के लिए देह धारण कर अवतरित होता है वह अपने मूल स्वरूप में अज, अनीह, अविनाशी है। पूर्ववर्ती धाराओं के प्रभाव को ग्रहण करते हुए भी हर कवि की अभिव्यक्ति विलक्षण है, मौलिक है, उस पर उनके निजपन की छाप है। तृतीय खंड में ब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या है। दर्शन की भारतीय परंपरा में परमतत्व के दो रूप स्वीकृत हैं 'पर' एवं 'अपर' अर्थात् निर्गुण एवं सगुण। वेद-उपनिषद् से लेकर आधुनिक युग के दार्शनिकों ने ईश्वर के ये दो स्वरूप माने हैं—सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म। इस खंड में 'निर्गुण' एवं 'सगुण' तत्व की परिकल्पना के अंतर्गत दोनों के स्वरूप का विवेचन करते हुए विविध अर्थों के प्रकाश में उन्हें परिभाषित किया है। निर्गुण शब्द अपने पारिभाषिक अर्थों में सत्वादि मायिक गुणों से परे कही जाने वाली अनिर्वचनीय सत्ता की बोधक संज्ञा है जिसे परमात्मा, ब्रह्म आदि संज्ञाओं से विभूषित किया जाता है। इसी प्रकार 'सगुण' कहने से सत्व, रजस् और तमस् इन गुणों का बोध होता है। यह परम तत्व जब क्रियाशक्ति में प्रवृत्त होता है तो रजस्, स्थिति में रहता है तो सत्व और जब सिमट कर लय हो जाता है तो उसका नाम तमस् है। परमतत्व जब निष्पंद रहता है, तो उसे 'निष्क्रिय' ब्रह्म कहा जाता है जब वह सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और विनाश की क्रिया में प्रवृत्त होता है तो 'सक्रिय' ब्रह्म कहलाता है। ब्रह्म के इसी सक्रिय रूप को ही गुण-युक्त होने के कारण 'सगुण' की संज्ञा दी जाती है।
द्वितीय अध्याय 'निर्गुणधारा के प्रमुख तत्व' विषयक है जिसमें निर्गुण ब्रह्म की निराकारता, सर्वव्यापकता, अनुभूतिगम्यता, अनिर्वचनीयता, नाम-महिमा एवं गुरु-महिमा आदि विशेषताओं का विशद विवेचन करते हुए चारों शाखाओं की सोदाहरण चर्चा की गई है। निर्गुण-काव्य में तो ये तत्व विद्यमान हैं ही सगुणकाव्य में भी अनुपलब्ध नहीं हैं। ब्रह्म की निराकारता का वर्णन करते हुए उसे दोनों ने अशरीरी एवं आकार-रहित कहा है। वह जन्म-मरण से रहित नित्य तत्व है। देहधारी का कोई विकार उसमें नहीं है। ईश्वर की सर्वव्यापकता भी सगुण भक्तों को मान्य है। दोनों का यह दृढ़ विश्वास है कि ब्रह्म जड़-चेतन सारी सृष्टि में अनुस्यूत है। परमात्मा का वास किसी स्थान विशेष में न होकर सर्वत्र है। तत्व-जिज्ञासुओं ने ब्रह्म को अनेक प्रकार से समझने-समझाने का प्रयास करके उसे अनुभवगम्य बताया है। ब्रह्म की अनुभूतिगम्यता की भी सगुण विचारधारा ने पुष्टि की है। वे अपने अंतःकरण में उसके दर्शन करते हैं। कृष्णकाव्य में कृष्ण का एक अंतर्यामी रूप भी माना गया है। वह घट के भीतर है जिसकी अनुभूति को संतों और भक्तों ने अपने-अपने ढंग से व्यक्त करने का प्रयास किया है, किंतु यह अनुभव इतना सूक्ष्म है कि इसे भाषाबद्ध करना अत्यंत कठिन है। इस आध्यात्मिक अनुभव की दुष्कर अभिव्यक्ति का वर्णन न वेद कर पाए न शास्त्रादि दूसरे ग्रंथ। घट-घट वासी होता हुआ भी वह वर्णनातीत है। ब्रह्म-विषयक अनिर्वचनीयता यद्यपि निर्गुण-काव्य का महत्वपूर्ण तत्व है किंतु सगुण भक्तों ने भी अनेक बार उसके स्वरूप की अकथनीयता को स्वीकार किया है। दोनों की दृष्टि में वह परमतत्व और उसकी अनुभूति गूंगे के गुड़ की भांति मात्र आस्वाद की वस्तु है। वर्णन की नहीं। ज्ञानी, भक्त, साधक सभी थक गए पर उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सके क्योंकि वह तत्व मन और वाणी का विषय नहीं। अनुभव में सुखद है किंतु उसकी गति अकथनीय है।
निर्गुणकाव्य का अगला महत्वपूर्ण तत्व है गुरु की महिमा। संत और सूफ़ी दोनों की दृष्टि में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। उनका मानना है कि ब्रह्म की अनुभूति या साक्षात्कार अलौकिक दृष्टि से होता है और यह अलौकिक दृष्टि या अतीन्द्रिय प्रातिभज्ञान गुरुकृपा से संभव है। संतों का अटल विश्वास है कि गुरु साधक के ज्ञान-चक्षु खोलकर परमात्म-तत्व के दर्शन कराता है। कहीं-कहीं उन्होंने गुरु को साक्षात् ईश्वर कहा है और कहीं उसे ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दे दिया है। निर्गुणकाव्य की भांति सगुण-काव्य की पृष्ठभूमि में गुरु-परंपरा अपने पूर्ण महिमामय रूप में दिखाई देती है। संतों और भक्तों में गुरु-विषयक अनेक समानताएं हैं। दोनों ने भक्ति-साधना में गुरु के महत्व को स्वीकार करते हुए यही कहा है कि गुरु शिष्य के सभी भ्रमों का निवारण करता है। गुरु द्वारा ज्ञान के प्रभाव से मन सुवर्णवत् शुद्ध हो जाता है। गुरुमहिमा के समान नाममहिमा, भी सभी निर्गुण भक्तों को अत्यंत प्रिय है। संतों की दृष्टि में 'नाम' से सुरति लगाना सभी योगों का योग है। इसी को मंत्रयोग भी कहा गया है। 'नाम' 'नामी' तक पहुंचने का साधन है। सगुण भक्तों की भक्ति का आधार नाम है। उनकी दृष्टि में 'नाम' 'नामी' से भी श्रेष्ठ है। नाम-स्मरण से अनेक अधम और पापियों का उद्धार हुआ है। निर्गुण और सगुण दोनों मार्गों में यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान के अनंत नामों से किसी एक का हृदय में निरंतर स्मरण, कीर्तन, गायन करने से, मन, वाणी और कर्म द्वारा होने वाले समस्त पापों का क्षय हो जाता है। नाम-स्मरण से नामी भक्त के हृदय में वास करने लगता है। भक्त सतत भगवान और उनकी भक्ति में लीन हो जाता है।
तृतीय अध्याय 'सगुणधरा के प्रमुख तत्व' विषयक है जिसमें नाम, रूप, गुण, लीला, धाम की विस्तृत चर्चा की गई है। अपने आराध्य के रूप और गुणों पर रीझ कर भक्त निरंतर नाम-स्मरण द्वारा प्रभु के धाम को पाना चाहता है। उसकी लीलाओं में डूबना चाहता है। सगुण-भक्ति के ये तत्व निर्गुण-काव्यधारा में भी अनुपलब्ध नहीं हैं। गुणनिधान ईश्वर के हर गुण के आधार पर संतों ने प्रेम, भक्ति और भाव में भरकर उसे अनेक नाम दिए हैं। निर्गुणवाची नामों के साथ सगुणवाची नामों का प्रयोग किया है। बार-बार उन नामों की भी चर्चा की है, जिनका सगुणमार्गियों ने स्मरण किया है। वही राम, वही गोविंद, वही मधुसूदन और वही हरि संतों का भी उपास्य है। कहीं-कहीं तो कबीर ने 'रघुनाथ' आदि विशुद्ध सगुण ब्रह्म-सूचक शब्द भी प्रयुक्त किए हैं। रूप-तत्व के वर्णन में भी सगुणवाद का स्पष्ट स्पर्श है। कबीर खुले नैनों से, अपने आराध्य का 'हँसि हँसि सुंदर रूप' निहारकर तृप्त होते हैं। सगुण भक्तों की भांति ही संतों ने पुराणों में प्रचलित अवतारवादी उद्धार-कार्यों एवं उनकी लीलाओं का उल्लेख किया है साथ ही उसके लीला-स्थलों के रूप में विविध धामों की चर्चा भी की है। बैकुंठ-धाम की चर्चा संतों, सूफ़ियों और भक्तों ने एक समान की है। परमपद अथवा प्रभु के परमधाम का वर्णन भी दोनों ने किया है जिसकी प्राप्ति हो जाने पर जीव आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाता है।
चतुर्थ अध्याय 'निर्गुण-सगुणधारा के समान तत्व' विषयक है। वस्तुतः निर्गुणवाद और सगुणवाद भक्तिकाव्य के दो पक्ष हैं जो इतने संपृक्त हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। निर्गुणवाद में सगुणवाद और सगुणवाद में निर्गुणवाद के तत्वों का विचित्र संगुंफन है। साधनापद्धति की भिन्नता के बावजूद दोनों में पर्याप्त समानताएं हैं। ज्ञानियों और भक्तों की भक्ति का प्राण है ईश्वर-विषयक श्रद्धामूलक अनुभूति जिसका आधार है आस्तिकता। ब्रह्म अथवा ईश्वर की सत्यता में दोनों का अटूट विश्वास है। दोनों परमसत्ता की विद्यमानता के विषय में एकमत हैं। वह सत्ता निर्गुण भी है सगुण भी। उसे केवल निर्गुण कहना या सगुण कहकर अपना निर्णय देना असली लक्ष्य से दूर जाना है। आराध्य चाहे निर्गुण-निराकार हो अथवा सगुण-साकार भक्त उससे प्रेम करता है। सभी निर्गुण संतों में प्रेम का आलंबन ईश्वर का निराकार रूप है और सगुण भक्तों का साकार रूप। सूफ़ियों और भक्तों ने इस प्रेम की बड़ी प्रशंसा की है। भक्त और भगवान के बीच यह प्रेमानुभूति प्राणतत्व है। प्रेम की विशेषता है कि वह अनन्यता की ओर ले जाता है। ईश्वर के प्रति इस अनन्य-भाव की दोनों धाराओं के कवियों में पूर्ण पराकाष्ठा मिलती है। प्रेम बिना वे जीवन को निरर्थक मानते हैं। प्रेम चाहे लौकिक हो, अथवा अलौकिक उसके प्रेमास्पद के प्रति अनन्यता का होना अत्यंत आवश्यक है।
प्रेम की प्रदीप्ति विरह से होती है। भक्त चाहे निर्गुण हो या सगुण जब वह सर्वात्मना ईश्वर से प्रेम करने लगता है तो हर क्षण उसके मिलने के लिए व्याकुल रहता है। दोनों की दृष्टि में ईश्वर के वियोग की अनुभूति ईश्वर-मिलन का अनुपम साधन है। उनके काव्य में विरहभाव की उत्तेजना उत्कृष्ट रूप में मिलती है। दोनों के काव्य में काव्यशास्त्र में वर्णित वियोग की सभी अवस्थाओं —अभिलाषा, चिंता, स्मृति, उन्माद, जड़ता आदि का हृदयग्राही वर्णन मिलता है। ईश्वर से प्रगाढ़ प्रेम और उसके वियोग में आकुलता संपूर्ण भक्तिकाव्य में विद्यमान है। प्रियतम की उपलब्धि के लिए अभिमान आदि का त्याग और सर्वस्व-समर्पण का भाव भी सबमें समान रूप से मिलता है। इसी प्रकार कुछ अन्य विशेषताएं भी दोनों में समान रूप से पाई जाती हैं। जिनमें प्रमुख हैं सत्संगति की महिमा। भक्ति के उद्रेक और विकास में अनुकूल वातावरण उपस्थित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लोकसंग्रह की भावना दोनों का काव्यादर्श है। उनका काव्य विश्व-कल्याण की भावना से अनुप्राणित है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है निर्गुण-सगुण-तत्व का समन्वय। मध्ययुग के सभी संतों एवं भक्तों ने ईश्वर के निर्गुण और गुणवंत दोनों रूपों का वर्णन किया है। निर्गुणवादियों ने ब्रह्म को सिद्धांततः निर्गुण रूप में स्वीकार करते हुए भक्तिभाव से उसकी उपासना की है। उनका ब्रह्म एक तरफ निर्विकल्प, निर्विकारी निरीह, निरामय, निर्विशेष है तो दूसरी ओर उस पर गुणों का आरोप कर उन्होंने उसे सगुण बनाया है। सगुणवादी भी परमार्थतः ब्रह्म के दोनों रूपों को सत्य मानते हैं। रामकाव्य के रंजन और लोकरक्षक राम उपनिषदों में वर्णित निर्गुण ब्रह्म हैं। इसी प्रकार कृष्णकाव्य में वल्लभ-सिद्धांत के अनुसार परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के गुणातीत और सगुण उभय रूप हैं।
पंचम अध्याय में निर्गुण-सगुण-तत्व-समन्वय के प्रमुख रचनाकारों को लिया है। विस्तार की सीमाओं के कारण कुछ कवियों की ही अलग से चर्चा की जा सकी है। वैसे सभी कवियों के उदाहरण प्रसंगानुसार किसी-न-किसी अध्याय में अवश्य आए हैं।
प्रमुख रचनाकारों में संतकाव्य के अंतर्गत—कबीर, दादू, सुंदरदास, गुरु नानकदेव, रैदास आदि को लिया है। सूफ़ीकाव्य में जायसी, रामकाव्य में तुलसीदास, कृष्णकाव्य में सूरदास और रहीम आदि का विवेचन किया है। मध्यकाल का हिंदी भक्ति-साहित्य भारतीय वाÄमय की अविचल संपत्ति है। हिंदी की आत्मा है, इसका आयतफलक अत्यंत विशाल है और काव्यगत प्रवृत्तियों में व्यापकता है, किंतु विषय का गंभीरता से गहन अध्ययन करने के लिए चयन-प्रवृत्ति के आधार पर संख्या को सीमित करना पड़ा है।
उपसंहार मध्ययुगीन कविता में निर्गुण-सगुण-तत्व-समन्वय के वैशिष्ट्य से संबद्ध है। निर्गुण और सगुण के नाम से भक्ति-काव्य की दो धाराएं ऊपर से प्रतीत होने वाले भेदों के होते हुए भी बहुत सी समानताएं लिए हैं। निर्गुण और सगुण ब्रह्म-विषयक विचार इनमें संयुक्त रूप से समाहित हैं। दोनों का गंतव्य एक है, गमन करने के मार्ग दो हैं। साध्य एक है, साधन अलग हैं। निर्गुण-निराकार ही दोनों का साध्य है। सगुण-भक्ति करने वाला भक्त भी अंत में निराकार का ही आश्रय ग्रहण करता है। वास्तव में परब्रह्म की कोई रूपरेखा नहीं है। भक्त उसे जिस रूप में कल्पित करता है वही रूप वह धारण कर लेता है। वह सर्वरूप है, उसे अरूप कहना उचित नहीं है। वह सगुण भाव से अपनी समस्त सृष्टि में अंतर्व्याप्त है। निर्गुण-सगुण दोनों धाराओं का साहित्य समन्वय के उस चरम रूप का व्याख्यान करता है, जहां साधक-साध्य का भेद भी मिट जाता है। भक्त चाहे सगुण हो या निर्गुण अपने इष्टदेव से तदाकारता की प्रतिपल अनुभूति करता हुआ समस्त जगत् में उसे व्याप्त देख आनंद की अनुभूति करता है। निर्गुण भक्त को जो 'सर्वघट मेरा सांइया' दिखाई देता है—सगुण भक्त भी पूरी सृष्टि में उसी के दर्शन करता है और वह 'सीय राममय सब जग जानी' कहकर उसे नमन करता है। दोनों की मान्यताएं कहीं टकराती नहीं हैं, क्योंकि दोनों की प्राणवत्ता समान है। वैषम्य केवल बाह्य धरातल पर है अंतस् की कामना एक है।
सभी अध्यायों के अंत में विवेचन एवं विश्लेषण पर आधारित निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं। यथासंभव दृष्टि को तटस्थ रखते हुए यह कार्य किया है। किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर नहीं। इस कार्य में मुझे कितनी सफलता मिली है इसका मूल्यांकन विषय में गहरी पैठ रखने वाले विद्वज्जन ही कर सकते हैं।
परिशिष्ट में उन आधार एवं सहायक ग्रंथों की सूची है जिनसे अध्ययन को आधार मिला है। पत्र-पत्रिकाओं के विवरण के साथ-साथ ग्रंथों एवं संदर्भित विद्वानों की भी संक्षिप्त नाम-सूची है।
शोध-विषय के चयन से लेकर शोध-प्रबंध की पूरी यात्रा हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वान परम पूज्य गुरुवर डॉ० सूर्यप्रसाद दीक्षित, पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा-विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के, मार्ग-निर्देशन में हुई है। मैं हृदय से उनके प्रति आभारी हूं। और शब्दातीत कृतज्ञता को अपनी पूरी आत्मा में महसूस करती हूं।
रामकथा-विशेषज्ञ डॉ० रामनाथ त्रिपाठी के बहुमूल्य सुझावों, सत्प्रेरणा को मैं कैसे भूल सकती हूं, जिन्होंने सदा मेरे स्वाध्याय और अनुसंधान को बल दिया।
मेरे पति एवं पुत्र-द्वय के त्याग, सहिष्णुता एवं उदारता का ही परिणाम है कि में इस कार्य को संपन्न कर सकी। उनका सहयोग ही मेरे जीवन का पाथेय और ईश्वर का सुंदरतम उपहार है।
सर्वाधिक धन्यवाद के अधिकारी सन्मार्ग प्रकाशन की मैं अत्यंत आभारी हूं, जिन्होंने इस कार्य को आकार प्रदान किया।
अंत में दो शब्द। कोई भी प्रयास अपने आप में पूर्ण नहीं होता। मैंने अपने शोधग्रंथ को यथाशक्ति पूर्ण एवं निर्दोष बनाने का प्रयास किया है। अपनी बात की पुष्टि के लिए मूलग्रंथों को ही आधार बनाया है। इतने लंबे अंतराल में कुछ पुस्तकें पुस्तकालयों से पुनः समय पर प्राप्त नहीं हो सकीं, अतः एक से अधिक संपादकों द्वारा संपादित पुस्तकों की भी सहायता ली है। पूरी चेष्टा के बाद भी कुछ दोष अथवा प्रूफ से संबंधित अशुद्धियां रह गई होंगी तो आश्चर्य नहीं। मैं उनके लिए विनयपूर्वक क्षमाप्रार्थी हूं।
यह शोध-प्रबंध निर्गुण-सगुण के विवाद को सुलझाने में एक नवीन दिशा देगा इस आशा और विश्वास के साथ।
— शकुंतला कालरा
✧ यह प्राक्कथन मूल शोध-प्रबंध 'मध्ययुगीन हिंदी कविता में निर्गुण‑सगुण तत्व का समन्वय' से उद्धृत है। ✧