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Dr. Shakuntla Kalra शक
Dr. Shakuntla Kalra
साहित्यकार एवं शिक्षाविद्
75 कृतियाँ 45+ पुरस्कार
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संपादकीय · समकालीन बाल साहित्य की दिशा और डॉ॰ शकुंतला कालरा

संपादकीय

समकालीन बाल साहित्य की दिशा और डॉ॰ शकुंतला कालरा

समकालीन बाल साहित्य की दिशा डॉ॰ शकुंतला कालरा को समर्पित संपादित ग्रंथ है, जिसमें उनको केंद्र में रखते हुए बाल साहित्य के अनेकानेक उद्घाटित-अनुद्घाटित पक्षों का असामान्य विवेचन किया गया है। असामान्य इस अर्थ में कि इसके विश्लेषक साहित्य जगत के सुविज्ञ हैं। मर्मज्ञ हैं। उनका विवेचन केवल डॉ॰ शकुंतला कालरा जी तक सीमित न रहकर बाल साहित्य के व्यापक फलक का संस्पर्श करता है। अस्तु, इस ग्रंथ को पढ़ते हुए आप समकालीन बाल साहित्य के विशद परिदृश्य से जुड़ाव अनुभव करेंगे।

समकालीन बाल साहित्य की जड़ें जहां बहुत गहरी हैं, वहीं उसकी संभावनाओं का आकाश भी अति विशाल है। बाल साहित्य अब केवल मनोरंजन का साधन मात्रा नहीं है। बाल साहित्य अब केवल शिक्षा या उपदेश का परोक्ष माध्यम भी नहीं है। बाल साहित्य को मात्रा नीति शास्त्र की व्याख्या भी नहीं कह सकते। वह अब परंपरा और आधुनिकता का सेतु भी नहीं है। बाल साहित्य अब नए युग का रोचक संविधान है जिसकी हर धारा का निर्माता बालक है। जी हां, बालक। चैतन्य बालक। हमारी समझ से कहीं ज्यादा परिपक्व और तीक्ष्ण समझवाला बालक। आज का बालक मुखापेक्षी नहीं है। उसके समक्ष गुत्थियों की जटिल दुनिया है तो उससे बाहर निकल आने का हुनर भी। बड़ों का संसार अब उसके लिए आश्चर्यलोक नहीं है। बल्कि अपनी मौलिक दृष्टि-सृष्टि से वह बड़ों को अवश्य आश्चर्यचकित करने की सामर्थ्य रखता है। आज का बालक बहुत आगे का बालक है। सूचना-क्रांति के इस युग में अब बालक के मन में भ्रांति के लिए कोई स्पेस नहीं है। बालक के मन में यदि अनसुलझे सवाल हैं तो स्वयं ही उनके जवाब खोजने का कौशल भी। यानी समकालीन जगत का बालक ह्यूरैस्टिक मेथड से अधिगम करने वाला बालक है।

ऐसा नहीं है कि समकालीन बाल साहित्य में यह आज का बालक अपनी शतप्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराए बैठा हो। यह समकालीन बाल साहित्य की सीमा भी है और यह सीमा सदैव रहेगी। इसलिए रहेगी क्योंकि अब बालक बालसाहित्य से दस कदम आगे चलने का हुनर रखता है। वह बाल साहित्य को अपने ढंग से हृदयंगम करने वाला बालक हो चुका है। बालसाहित्यकार बस चिड़िया, हाथी-घोड़े की बात करता है और यह नये जमाने का बालक उसे पढ़ते-सुनते संसार में उनकी कितने ही तरह की प्रजातियों की व्याख्या कर बैठता है। समकालीन बालसाहित्य सही अर्थों में इसी नवयुगीन बालक को कल्पना के पंख प्रदान करने वाला साहित्य है।

कहते हैं न! आप बालक को रास्ता न दिखाओ, बल्कि रास्ता खोजने के योग्य बनाओ। समकालीन बाल साहित्य की दिशा ऐसे ही नवोन्मेषी पथ का अनुशीलन करती है। सुखद है कि डॉ॰ शकुंतला कालरा नवोन्मेषी पथ की निर्मात्राी है। भावियित्री और कारयित्री प्रतिभा की स्वामिनी। सृजन में समर्थ और समीक्षा में निष्णात। वे अपनी जगह अकेली हैं। काव्य शास्त्र में एक अलंकार का जिक्र आता है– अन्वय अलंकार। जहां उपमेय और उपमान एक ही होते हैं। उपमेय की समानता के लिए कोई उपमान नहीं मिलता। उपमेय को ही उपमान बनाना पड़ता है। ऐसे ही डॉ॰ शकुंतला कालरा हैं जिनकी तुलना तो बस डॉ॰ शकुंतला कालरा से ही की जा सकती है। वे गद्य और पद्य दोनों की ही प्रतिनिधि विधाओं की लेखिका हैं, साथ ही आलोचना उनका प्रिय विषय है। आलोचना भी सतही आलोचना नहीं। सहज उपलब्ध साहित्य के आधार पर केवल विवरण या आंकड़े भर परोस देना आलोचना नहीं है, जैसा कि कुछ फेसबुकिया समीक्षक इन दिनों कर रहे हैं और मत्सर के बेताल को पीठ पर लादे, स्वयं को सर्वज्ञ घोषित करते हुए निरर्थक दंभ भरते फिरते हैं। डॉ॰ शकुंतला कालरा तो तत्त्वाभिनिवेशी आलोचक हैं। आलोचना की यह सर्वोत्तम कोटि है। वे इतिहासकार भी हैं और मर्मज्ञ संपादक भी। बाल साहित्यकारों के सर्वाधिक साक्षात्कार लेने का श्रेय उनको ही जाता है।

अपने जीवन की हीरक जयंती मना चुकी कालराजी बालसाहित्य के क्षेत्र में तब आईं, जब वे जीवन के पचास वसंत देख चुकी थीं। अनुभव की सघन सामर्थ्य उनकी झोली में थी। उस झोली से जब सृजन का पिटारा खुला तो एक से एक नायाब बाल साहित्य की रचनाओं के रंग-बिरंगे पक्षी बाल साहित्य के आकाश में चहचहाने लगे। बाल साहित्य उन दिनों इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहा था। नंदन के अनुभवी संपादक जयप्रकाश भारती भविष्यवाणी भी कर चुके थे कि इक्कीसवीं सदी बाल साहित्य की होगी। उनका नारा आज सत्य सिद्ध हुआ। आज बाल साहित्य का युग है। प्रायः सोलह-चौबीस पन्नों की पतली सी पुस्तिकाओं वाले बाल साहित्य का वामन रूप अब विराटकार है। बाल साहित्य के पग अब विश्वविद्यालय तक अपनी धमक बनाए हैं। विश्वविद्यालयों में अब बाल साहित्य पाठ्यक्रम का हिस्सा है। शोध का सहज स्वीकार्य विषय है। बाल साहित्य के क्षेत्र में अब बड़े-बड़े पुरस्कार-सम्मान हैं। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ से बाल साहित्य का प्रकाशन हो रहा है।

जयप्रकाश भारती द्वारा संपादित नंदन में ही कालरा जी की पहली बाल साहित्य रचना (कहानी - पुल टूट गया) सन 1996 में प्रकाशित हुई थी। तब से अब तक उनकी सृजन यात्रा निर्बाध जारी है। उन्होंने बाल साहित्य का भंडार भर दिया है। बच्चों-बड़ों की उनकी पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। यों स्फुट सृजन की दृष्टि से साहित्य के क्षेत्र में वे किशोरावस्था (1961) से ही सक्रिय हो गई थीं।

डॉ॰ कालरा ने बाल साहित्य की राह क्या पकड़ी कि जैसे बाल साहित्य उनकी दुनिया ही बन गई। डॉ॰ प्रकाश मनु ने इस संदर्भ में ग्रंथ में विस्तारपूर्वक लिखा है। बहुत ही डूबकर लिखा है। जिसे पढ़ते हुए आपका भी रह-रह कर भावुक होना तय है।

समकालीन बाल कथा साहित्य को कालरा जी ने अनेक कृतियां सौंपी हैं। मोती जोती, सुनाओ वही कथा, चमत्कार का रहस्य, रात में दिन, अपना घर, मेरी प्रिय बाल कहानियां, मां का उपहार बाल कहानी संग्रहों के अतिरिक्त उन्होंने मिट्ठी की चिट्ठी चंदा के नाम बाल उपन्यास भी लिखा है। इस ग्रंथ में पद्मश्री डॉ॰ ऊषा यादव ने बाल साहित्य की गौरवशाली यात्रा की बात करते हुए उनकी बाल कहानियों के इंद्रधनुषी रंगों की छटा उकेरी है। अमर लेखक विष्णु प्रभाकर ने विज्ञान, संस्कृति और बालमनोविज्ञान को सहजभाव से रेखांकित करती उनकी बाल कहानियों पर चर्चा की है तो सुकीर्ति भटनागर ने बालकों को केंद्र में रखकर लिखी गई डॉ॰ शकुंतला कालरा की कहानियों को अपना विषय बनाया है। डॉ॰ अमिता दुबे ने बाल उपन्यास की दिशा में उनकी अपूर्व प्रस्तुति : मिट्ठी की चिट्ठी का तात्त्विक विवेचन किया है। ऐसे ही डॉ॰ मोहम्मद अरशद खान ने उनकी बाल कहानियों में नैतिक मूल्यों को देखने की कोशिश की है। डॉ॰ मधुसूदन साहा ने बालकथा साहित्य का सिंहावलोकन करते हुए बाल कहानियों की मार्मिक व्याख्या की है।

समकालीन बाल काव्य की बात करें तो डॉ॰ कालराजी के बालकविता संग्रह करे तमाशा प्यारी मुनिया, फुलवारी, हंसते-महकते फूल, जय-जय भारत प्यारा, ममता की छांव में, क्यों रूठी गौरैया खूब लोकप्रिय हुए हैं। डॉ॰ शकुंतला कालरा द्वारा रचित विविध विषयक बाल कविताओं पर बाल साहित्य के देवदूत विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’ ने अपना पक्ष प्रस्तुत किया है। डॉ॰ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ ने सविस्तार लोकसंस्कृति के अंग : लोरी और प्रभाती की संवेदनात्मक उपयोगिता को रेखांकित किया है। कृष्ण शलभ उनकी बाल कविताओं को ठुमकती हुई बाल कविताएं कहते हैं। डॉ॰ तारादत्त निर्विरोध को उनकी कविताएं बालमन की झांकी लगती हैं। डॉ॰ रोहिताश्व अस्थाना का मत है कि कालरा जी ने अपनी कविताओं में समग्र-बाल संसार का प्रतिनिधित्व किया है। डॉ॰ मोहम्मद साजिद ख़ान ने बालिका-विमर्श को दृष्टिगत रखते हुए उनकी बाल कविताओं पर बात की है।

बाल नाटक बाल साहित्य की उपेक्षित किंतु अपेक्षित विधा है। यह सर्वाधिक तकनीकी विधा भी है। प्रताप सहगल ने ठीक ही लिखा है कि उन्होंने अपनी नाट्यकृति ‘देर आए दुरुस्त आए’ के माध्यम से बाल नाटकों के अभाव को पूरा करने की कोशिश की है। मंजुरानी जैन ने बाल समस्याओं के समाधान परोसते उनके बाल नाटकों का सुंदर विवेचन किया है।

डॉ॰ शकुंतला कालरा ने बाल-मनोवैज्ञानिक निबंध भी लिखे हैं। बच्चों का व्यक्तित्व-विकास कैसे हो? उनका निबंध-संग्रह है। मतलब बाल विमर्श की दिशा में भी वे सजग हैं। डॉ॰ रवि शर्मा ने उनके निबंध कौशल को सराहा है।

अन्यान्या विधाओं में आत्मकथा के अंतर्गत मेरा बचपन : उड़ान की चाह तो उनकी बेजोड़ और मार्मिक पुस्तक है। एक टिकट में कई तमाशे जैसी। यह कभी जीवनी तो कभी उपन्यास तो कभी संस्मरण का आह्लाद प्रदान करती है। देवेंद्र मेवाड़ी समकालीन बाल साहित्य में आत्मकथा लेखन के उनके अन्यतम प्रयोग की सराहना करते हैं। यह बिल्कुल अलग हट कर है। यह आत्मकथा उस अर्थ में एक स्त्री की आत्मकथा नहीं है। स्त्री द्वारा लिखी एक बालिका की आत्मकथा है। आत्मकथाकार ने अपनी जन्मभूमि से विस्थापित शरणार्थी-परिवार के बच्चे के रूप में आत्मकथा लिखी है। सृष्टि पांडेय उनके बाल विज्ञान साहित्य को लेकर तो पद्मा चौगांवकर साक्षात्कार से अनुवाद तक उनके उल्लेखनीय प्रदेय को लेकर विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं।

घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ का आलेख ‘बाल साहित्य को समर्पित प्रौढ़ साहित्य-लेखिका’ यह जताता है कि बाल साहित्य के नाम से पहचाने जाने वाले कितने ही सर्जक वस्तुतः प्रौढ़ लेखन के कैसे महारथी हुआ करते हैं। जैसा कि कालरा जी का इस दिशा में विपुल अवदान है जो अलग से चर्चा की दरकार रखता है। आत्मनिर्वासन, डूब रहे हैं नावों में, यात्रा, भंवर, मॉरीशस में भारत, विनयपत्रिका कथ्य एवं शिल्प, मध्ययुगीन हिंदी कविता में निर्गुण-सगुण-तत्त्व-समन्वय, मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त का राम और कृष्णकाव्य, विनयपत्रिका भाव एवं कलागत मूल्यांकन, रामचरितमानस की प्रासंगिकता भारतीय लोकसाहित्य : विविध परिदृश्य, विधा-विविधा, भक्तिकाल: प्रतिनिधि कवियों की ब्रह्म-दृष्टि, समीक्षा के आलोक में : चुनिंदा पुस्तकें इत्यादि उनकी प्रौढ़ साहित्य की दस्तावेजी कृतियां हैं।

बालसाहित्य आलोचना के क्षेत्र में कालरा जी की सक्रियता देखते ही बनती है। वे दो सौ से अधिक बालसाहित्य-पुस्तकों की समीक्षा लिख चुकी हैं। हिन्दी बालसाहित्य विचार और चिंतन, हिन्दी बालसाहित्य के अनन्य साधक, हिन्दी बालसाहित्य : आधुनिक परिदृश्य, बालक और बालसाहित्य ग्रंथ उनकी गवेषणात्मक दृष्टि के परिचायक हैं। बाल साहित्य के मूल लोक साहित्य पर भी उन्होंने भारतीय लोकसाहित्य : विविध परिदृश्य मानक ग्रंथ की रचना की है। उनके आलोचनात्मक अवदान पर भगवतीप्रसाद गौतम, डॉ॰ दिविक रमेश, डॉ॰ भैंरूंलाल गर्ग, अखिलेश श्रीवास्तव चमन आदि ने चर्चा की है। दिविक जी ने तो समकालीन बाल साहित्य आलोचना में उन्हें शिखर पर स्वीकार किया है।

बाल साहित्य संपादन के क्षेत्र में डॉ॰ शकुंतला कालरा का विपुल अवदान है। बालसाहित्यकारपरक ग्रंथों में बाल साहित्य का स्वरूप और रचना-संसार, बाल साहित्य के युगनिर्माता: जयप्रकाश भारती, डॉ॰ राष्ट्रबंधु और उनका बाल साहित्य: एक मूल्यांकन, डॉ॰ दिविक रमेश और उनका बाल साहित्य, डॉ॰ दर्शन सिंह आशट और उनका बाल साहित्य, विधापरक ग्रंथों में बालकथा-सुमनमाला, भाग-1 और 2, मीठी-मीठी लोरियां एवं प्रभातियां, गुल्लू और एक संतरंगी भारत का प्रथम बृहद किशोर उपन्यास: एक विवेचन उनके अनथक श्रम की गाथा कहते हैं। हिन्दी बालसाहित्य विधा विवेचन उनकी इतिहासपरक कृति है जिसमें बालसाहित्य की विविध विधाओं के तात्त्विक विवेचन के साथ-साथ उनका इतिहास भी पढ़ा जा सकता है। इस ग्रंथ में उनकी संपादन-कला पर संतोष खन्ना का विवेचन पठनीय है।

कालरा जी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर डॉ॰ राष्ट्रबंधु, डॉ॰ चक्रधर नलिन, डॉ॰ अश्वघोष, डॉ॰ दर्शन सिंह आशट, गोविंद शर्मा, निर्मला सिंह, नीलम राकेश आदि का इंद्रधनुषी विश्लेषण है। उनके गुरु डॉ॰ रमानंद त्रिपाठी और शिष्य डॉ॰ अनिल कुमार का दो अलग दृष्टियों से रूपांकन भी देखते ही बनता है।

इसी प्रकार चक्रधर शुक्ल, डॉ॰ श्रीप्रसाद, डॉ॰ श्याम सिंह शशि, सीताराम गुप्त, डॉ॰ रत्नलाल शर्मा, डॉ॰ बालशौरि रेड्डी, सूर्यकांत बाली, बालस्वरूप राही की सद्भावनापरक सम्मतियों का भी चिरस्थायी महत्त्व है।

साक्षात्कार विधा को समृद्ध करने वाली कालरा जी के हिन्दी बालसाहित्य-विमर्श और हिन्दी बालसाहित्य : जिज्ञासाएं और समाधान ग्रंथ बालसाहित्य में मील के पत्थर जैसे हैं। इन्हें पढ़ते हुए न केवल बाल साहित्य की समूची विकास यात्रा को प्रामाणिकता के साथ समझा परखा जा सकता है अपितु बाल साहित्य के समर्थ लेखकों की रचना प्रक्रिया को भी अनुभूत कर सशक्त लेखन की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। असंख्य बालसाहित्य मनीषियों के साक्षात्कार लेने वाली कालरा जी से लिए गए तीन अलग शेड्स के साक्षात्कार भी इस पुस्तक में संकलित हैं। एक साहित्य अकादेमी, म॰प्र॰ के निदेशक डॉ॰ विकास दवे द्वारा जिसमें वे समकालीन बाल साहित्य के विविध पक्षों पर अत्यंत विनम्रतापूर्वक बात रखती हैं। दूसरा, बालसाहित्य लेखक-प्राध्यापक वेदमित्र शुक्ल द्वारा, जहां जीवन-यात्रा में सहज बचपन को लेकर मार्मिक चर्चा है। वहीं तीसरा साक्षात्कार एक उत्साही किशोर द्वारा लिया गया है जो बाल साहित्य लेखकों और पाठकों के मध्य सेतु-निर्माण की संभावनाओं का भी निरूपण करता है।

समकालीन बाल साहित्य लेखकों में सर्वश्री प्रकाश मनु, देवेंद्र कुमार, दिविक रमेश, क्षमा शर्मा, ऊषा यादव, विनायक, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, रोहिताश्व अस्थाना, देवेंद्र मेवाड़ी, संजीव जायसवाल, नागेश पांडेय संजय, विश्वनाथ गुप्त, नीलम राकेश, अनंतप्रसाद रामभरोसे, भगवती प्रसाद द्विवेदी, भगवती प्रसाद गौतम, भैंरूंलाल गर्ग, देवेंद्रकुमार देवेश, नयन कुमार राठी, पवन कुमार वर्मा, रामेश्वर प्रसाद सारस्वत, सूर्यकुमार पांडेय, अरविंद दुबे, राजा चौरसिया, प्रताप सहगल, कौशल पांडे, मो॰ साजिद खान, मो॰ अरशद खान, फहीम अहमद, जाकिर अली रजनीश, रमाशंकर, आशा शर्मा, विमला भंडारी, सुशील शुक्ल, प्रभात, पंकज चतुर्वेदी, घमंडीलाल अग्रवाल, उद्भ्रांत, सुनील कुमार सुमन, शील कौशिक, रामकरन, निश्चल, शादाब आलम, सिराज अहमद, गौतम अरोड़ा सरस, श्रवण कुमार सेठ, शिव मोहन यादव, उमेश चंद्र सिरसवारी, देशबंधु शाहजहांपुरी, परशुराम शुक्ल, डॉ॰ विकास दवे, चक्रधर शुक्ल, राकेश चक्र, सत्यनारायण सत्य, गिरीश पंकज, शशि शुक्ला, हेमंत कुमार, अजय जनमेजय, गोपाल माहेश्वरी, मंजरी शुक्ला, रजनीकांत शुक्ल, यश मालवीय, सुरेंद्र विक्रम, दीनदयाल शर्मा, प्रभुदयाल श्रीवास्तव, अमिता दुबे, मीनू त्रिपाठी, अनिल कुमार जायसवाल, हूंदराज बलवाणी, चांद मोहम्मद घोसी, विनोद भृंग, सुधा भार्गव, शशि गोयल, राजश्री रावत, रीता कौशल, अलका अग्रवाल, गिरिराजशरण अग्रवाल, श्याम सुशील, श्यामपलट पांडे, श्यामकृष्ण श्रीवास्तव, सुधा दुबे, गुडविन मसीह, आइवर यूशियल, ओम निश्चल, रूपसिंह चंदेल, श्यामसुंदर श्रीवास्तव कोमल, नरेंद्र सिंह निहार, श्याम कृष्ण सक्सेना, अरविंद कुमार साहू, अनुश्री, राजा भैया गुप्ता, किशोर श्रीवास्तव, प्रदीप शुक्ल, संगीता बलवंत, प्रत्यूष गुलेरी, गोविंद शर्मा, गोविंद भारद्वाज, राज सक्सेना, सुकीर्ति भटनागर, पवन चौहान, राजपाल सिंह गुलिया, ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश, महेश सक्सेना, प्रीति खरे, अशोक वाजपेयी, अजीत सिंह राठौड़, विनय राजाराम, सुनील गज्जाणी, कविता विकास, राजकुमार निजात, सुधा गुप्ता, कुसुम लता सिंह, करुणा पांडे, शीला पांडे, निर्मला सिंह, कीर्ति श्रीवास्तव, फकीर चंद शुक्ला, कुसुम अग्रवाल, कामना सिंह, शेषपाल सिंह शेष, आशा शैली, मालती बसंत, पवित्रा अग्रवाल, रेनू चौहान, रेनू सैनी, रोचिका शर्मा, शिखर चंद जैन, समीर गांगुली, राजकुमार राजन, लायक राम मानव, रामनिवास मानव, प्रभात गुप्त गौरीशंकर विनम्र आकांक्षा यादव मनोहर चमोली मनु रमेश चंद्र पंत प्रभा पंत, दिशा ग्रोवर, गौरव स्वप्निल, ललित शौर्य, नरेंद्र मस्ताना, सृष्टि पांडेय आदि विशेष रूप से सक्रिय हैं।

इन रचनाकारों में डॉ॰ शकुंतला कालरा का अन्यतम स्थान है। उन्हें सदैव बालसाहित्य के अग्रणी विद्वानों का अनन्य समादर मिला। बालसाहित्य जगत में उनकी विशेष लोकप्रियता है। वे सरल, सहज और निश्चल छवि की स्वामिनी हैं। यह ग्रंथ उनके कृतित्व के बहाने समकालीन बाल साहित्य की यथास्थिति को प्रतिबिंबित करे, यही मेरा अभीष्ट है। ग्रंथ में जो कुछ भी श्रेष्ठ या विशिष्ट है, उसका श्रेय संकलित लेखकों को जाता है। जो सीमाएं हैं, वे मेरी हैं। ग्रंथ के लिए जिनका सहयोग मिला, मैं उनका हृदय और आत्मा से आभारी हूं।

डॉ॰ शकुंतला कालरा पर केंद्रित यह कृति आपको कैसी लगी? आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का मुक्त मन से स्वागत करूंगा।

अभिवादन और अग्रिम आभार सहित,
सादर,

(डॉ॰ नागेश पांडेय ‘संजय’) संपादक
237, सुभाष नगर, शाहजहांपुर - 242001 (उ॰प्र॰)

संपादकीय · समकालीन बाल साहित्य की दिशा और डॉ॰ शकुंतला कालरा

‘समकालीन बाल साहित्य की दिशा’ डॉ॰ शकुंतला कालरा को समर्पित संपादित ग्रंथ है।


© संपादक · डॉ॰ नागेश पांडेय ‘संजय’
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