संवाद-प्रतिसंवाद
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भूमिका: हिंदी बालसाहित्य (संवाद-प्रतिसंवाद)
वर्तमान में साक्षात्कार विधा हिंदी गद्य-साहित्य की एक नवविकसित, स्वतंत्र एवं महत्वपूर्ण अन्यतम विधा है। भारतीय वाङ्मय में इसका आगमन यद्यपि पश्चिम से हुआ, परंतु वर्तमान साहित्य में इसने अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। विगत कतिपय कई दशकों से यह साहित्यिक विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में विकसित होती रही है, जो जिज्ञासु पाठकों के लिए किसी प्रिय अथवा विशिष्ट रचनाकार के बारे में सही जानकारी प्राप्त करने का एक सफल माध्यम बन गया है। ऐसा माध्यम जिसके द्वारा 'उन्हीं के विचार उन्हीं की जुबानी' प्रस्तुत हो सकें। साक्षात्कार रचनाकार को पाठक के समीप लाने का प्रयास करता है। पाठक यह महसूस करता है कि वह रचनाकार के बिल्कुल रूबरू बैठकर संवाद कर रहा है और अपनी हर जिज्ञासा का समाधान पा रहा है।
साक्षात्कार गद्य-साहित्य की न केवल नव विकसित विधा है, वरन् बहुपठित विधा भी है, जो साहित्य और पत्रकारिता दोनों का आनंद एक साथ देती है। आज साक्षात्कार समृद्ध विधा के रूप में परिणत हो गया है, इसमें एक साथ कई विधाओं के तत्व सम्मिलित हैं। कहीं-कहीं ये साक्षात्कार आपको जीवनी प्रतीत होंगे, क्योंकि जीवनी की तरह ये साक्षात्कारदाता के जीवन-चरित्र को हमारे समीप लेकर आते हैं। उसके जीवन के महत्वपूर्ण पहलू से पाठक को जोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों में साम्य का एक दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु है जैसे जीवनी-लेखन सत्याधारित होता है, उसमें कल्पना की छूट नहीं होती। 'साक्षात्कार' में भी तथ्यों के तोड़-मरोड़ की कोई गुंजाइश नहीं होती। इसमें साक्षात्कारकर्ता अपनी कल्पना का इच्छानुसार कोई रूपाकार नहीं दे सकता। इस तरह दोनों में साम्य के कुछ बिंदु हैं, किंतु फिर भी दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। जीवनी जहां कथा के समान चलती है, वहां साक्षात्कार प्रश्नोत्तर शैली में आगे बढ़ता है। जीवनी में लेखक परोक्ष रूप में होता है जबकि साक्षात्कार में दोनों आमने-सामने रहकर संवाद-प्रतिसंवाद करते हैं।
कहीं-कहीं साक्षात्कार संस्मरण भी प्रतीत होंगे, जहां रचनाकार जीवन की स्मृतियों में पहुँचकर उनका वर्णन करता है। दोनों में साम्य का बिंदु है - आत्मीयता पूर्वक रचित जीवन के विशेष क्षणों, घटनाओं एवं व्यक्ति विशेष से जुड़े किसी प्रसंग का विवरण प्रस्तुत करना। एक अर्थ में दोनों एक दूसरे से भिन्न भी हैं। संस्मरण में चरित्र-नायक परोक्ष में रहता है, साक्षात्कार में वह प्रत्यक्ष रूप में रहता है - आमने-सामने। संस्मरण का एक गुण है वैयक्तिकता, जो नितांत आवश्यक है। किंतु साक्षात्कार में वैयक्तिकता का पुट होते हुए भी उसमें किसी सिद्धांत, किसी विषय या मुद्दे पर चर्चा प्रमुख रहती है।
कहीं-कहीं साक्षात्कार आत्मकथा का आनंद भी देता है। साक्षात्कार और आत्मकथा दोनों में तथ्यों का खुलासा आत्म-कथन द्वारा होता है। दोनों ही विधाओं में लेखक का 'स्व' उद्घाटित होता है। आत्मकथाकार और साक्षात्कारदाता दोनों ही अपने 'स्व' का उद्घाटन करते हैं। दोनों के साम्य का दूसरा तत्व है तथ्यों की प्रमाणिकता। आत्मकथा में लेखक से जैसे तथ्यों की प्रमाणिकता की अपेक्षा की जाती है वैसे ही साक्षात्कार में भी साक्षात्कारदाता द्वारा कहे गए आत्म-कथन भी 'अन्तर्साक्ष्य' के रूप में प्रामाणिक माना जाता है। फिर भी दोनों में अंतर है। आत्मकथा में मध्यस्थ कोई नहीं होता यानी उसका नायक और लेखक दोनों एक होते हैं। वह स्वयं ही पाठकों के साथ सीधे जुड़ता है जबकि साक्षात्कार में दोनों अलग होते हैं। वहाँ साक्षात्कारकर्ता मध्यस्थ का कार्य करता है।
इस प्रकार अनेक विधाओं का अंतर्भाव साक्षात्कार विधा में होने पर भी उसका अपना अलग अस्तित्व है और उसकी अपनी अलग विशेषताएं। किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व के छुए-अनछुए पक्षों को उजागर करने का यह सर्वाधिक प्रामाणिक माध्यम है।
एक ही रचनाकार के साक्षात्कार पुस्तक रूप में इस विधा को समृद्ध करने में 'किताबघर प्रकाशन' की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इधर-उधर पत्रिकाओं में बिखरे साक्षात्कारों को एकत्र कर किताबघर प्रकाशन ने पुस्तक का 'सीरीज' रूप में प्रकाशन किया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किताबघर प्रकाशन द्वारा इस विधा ने प्रौढ़ता को प्राप्त कर लिया है और इसका आश्चर्यजनक विकास हो रहा है।
अब तक 2010-2017 की अवधि में मेरे द्वारा बालसाहित्यकारों से लिए गए साक्षात्कार के दो संग्रह प्रकाशित हुए थे। इसके अतिरिक्त बालसाहित्य की आलोचना की पुस्तक में चार साक्षात्कार थे। आजकल, साक्षात्कार, इंद्रप्रस्थ भारती, दस्तावेज, बालवाटिका, हिंदुस्तान टाइम्स आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी अनेक साहित्यकारों के साथ मेरे द्वारा लिए साक्षात्कार प्रकाशित होते रहे।
अब बात उलट हो गई है। मेरे पाठकों, साहित्यकार मित्रों, पत्रकार, संपादकों के अलावा अनेक बालसाहित्य के शोधार्थियों के प्रश्नों और जिज्ञासाओं के उत्तर मुझसे मांगे जाने लगे। ये प्रश्न होते मेरे बाह्येतर व्यक्तित्व से जुड़े, मेरे वैचारिक दृष्टिकोण से जुड़े। मैंने उनके सभी प्रश्नों के उत्तर उनके द्वारा लिए गए विधिवत साक्षात्कार में दिए। मैंने उनकी शंकाओं का यथासंभव समाधान करने का प्रयास किया। इनमें कुछ प्रश्न मेरे जीवन से जुड़े हैं। एक बालसाहित्यकार के नाते मेरे बचपन से जुड़े हैं। कुछ कृतित्व से जुड़े हैं। सृजन और आलोचना के क्षेत्र के प्रदेश से जुड़े हैं। शेष बालसाहित्य की दशा-दिशा से जुड़े ज्वलंत प्रश्न हैं। कुछ मेरी सृजन-प्रक्रिया से जुड़े हैं। इन सबके साथ-साथ मेरे स्वभाव, मेरी लेखन के अतिरिक्त दूसरी रुचियों की भी साक्षात्कारकर्ता के उद्घाटित करने की कोशिश भी मिलेगी विशेष रूप से श्याम सुशील के इंटरव्यू में। निश्चय ही इससे बातचीत में जीवंतता आ गई है। इन सब उत्तरों में प्रश्नकर्ता ने मेरे विचार, मनोभाव और दृष्टिकोण को समेट लिया है।
मुझे लगा यदि बालसाहित्य-प्रेमी, पाठकों एवं बालसाहित्य के शोधार्थियों के लिए इसे एक जिल्द में प्रकाशित कर दिया जाए, तो यह उनके लिए अत्यंत उपयोगी होगा इसलिए 'हिंदी बालसाहित्य : संवाद-प्रतिसंवाद' शीर्षक से यह पुस्तक नमन प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
इसमें बालसाहित्य के कई ज्वलंत मुद्दों पर संवाद-प्रतिसंवाद हैं। ये संवाद या भेंटवार्ताएं अलग-अलग समय की और अलग-अलग प्रश्नकर्ताओं की हैं। कुछ प्रश्न समान भी हैं। कुछ जिज्ञासाएं सबकी स्वाभाविक हैं। अतः प्रश्नों-उत्तरों में दोहराव भी आपको दिखाई देगा। कुछ प्रश्नों में प्रकाश्य पुस्तकों के नाम या भविष्य की योजनाओं के विषय में पूछा है तो आगे आने वाले इंटरव्यू में वह कार्य पूरा हो चुका होता है। इसी तरह प्रकाशित साहित्य भी अलग-अलग इंटरव्यू में अलग होगा। वैसे प्रयास किया है कि प्रश्नों की आवृत्ति को हटा दिया जाए।
मेरे उत्तर सबको सार्थक लगें ऐसा तो जरूरी नहीं है। ये साक्षात्कार वैचारिक धरातल पर हैं। कहीं-कहीं प्रश्नकर्ता और मेरे बीच दृष्टिकोण की टकराव भी दिखाई देगी। लेकिन यह मत-भिन्नता होना स्वाभाविक है। वैचारिक ऐक्य हो यह जरूरी नहीं है, न ही मैं इस बात की उम्मीद करती हूँ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और व्यक्तिगत सोच का अधिकार भी सबका अपना है, उनका भी और मेरा भी।
बालसाहित्यकारों से जुड़ी मेरी यह स्मृतियाँ पुस्तक में छपी संस्मरण हो गई। लगभग तीन दशकों के सुदीर्घ अंतराल बहुत सी घटनाएँ स्मृति से उतर चुकने की स्थिति में हैं। जीवन-यात्रा के पथ में मिले कई महत्वपूर्ण चेहरे अब धुंधले भी पड़ने लगे हैं। बचपन में मिले कई महत्वपूर्ण परिचय अब आयु के वार्धक्य की परतों में दबते जा रहे हैं। कुछ स्नेहमयी आँखें अभी भी इन धुंधली आँखों में बसी हुई हैं। मेरा प्रयास रहेगा कि उन चित्रों को भी कागज़ पर उतार लूँ ताकि वे स्मृतियाँ भी संस्मरण बन जाएँ।
संस्मरण विधा की शैली से परिचित कराने का श्रेय मनु जी को है।