21वीं सदी का हिंदी बालसाहित्य : विविध सोपान
डॉ. जयप्रकाश भारती जी ने कहा था कि 21वीं सदी में बालसाहित्य स्वर्णयुग में प्रवेश करेगा। 21वीं सदी में बालसाहित्य की उत्तरोत्तर प्रगति यह बताती है कि स्वर्णयुग आ गया है। बालसाहित्य की समग्र विधाओं में उसका चहुंमुखी विकास इसका प्रमाण है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, यात्रा-वृत्तांत, कॉमिक्स, पत्रकारिता आदि विधाएं निरंतर प्रगति की पथ की ओर बढ़ रही हैं जिससे हमारा बालसाहित्य साहित्य की मुख्य धारा के समक्ष खड़ा होने में पूर्ण समर्थ हो चुका है। बालकविता में विषय और शिल्प दोनों रूपों में नए प्रयोग हो रहे हैं। विषय-वस्तु में बदलाव आया है। ज्ञान-विज्ञान को स्थान मिलने लगा है। विज्ञान-परक साहित्य बच्चों में लोकप्रिय हो रहा है। पद्य की हर विधा भी लोरी, ग़ज़ल, गीत, शिशुगीत आदि विधाएं न केवल पत्रिकाओं में स्थान पा रही हैं वरन् इनके स्वतंत्र संग्रह भी आ रहे हैं।
कविता आरंभ से ही बच्चों की प्रिय विधा रही है। यह कल भी उनके लिए अत्यंत आनंददायिनी विधा थी, आज भी है और कल भी रहेगी। 21वीं सदी की बालकविता मनोरंजन के साथ-साथ सामयिक परिवेश से जुड़ी हैं।
कहानी विधा में भी अभूतपूर्व विकास हुआ है। परीकथाएं, पौराणिक कथाओं को नए परिप्रेक्ष्य में लिखा जा रहा है। इसे युग के अनुरूप प्रासंगिक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि आज का बालक और उसका आई-क्यू बहुत ही तीक्ष्ण है। वह किसी भी बात को कोरी कल्पना के आधार पर स्वीकार नहीं करता। उसे कुछ प्रमाण चाहिए।
इसी तरह नाटक विधा में भी विकास हो रहा है। आजकल अभिनेय नाटक लिखे जा रहे हैं जिन्हें रंगमंचीय जरूरतों और साज-सज्जा के साथ लिखा जा रहा है।
उपन्यास विधा का भी 21वीं सदी में अच्छा विकास हुआ है। इसका विषय-फलक भी अत्यंत व्यापक है। इतिहास, पुराण, समाज, विज्ञान, पर्यावरण, बालग्रहविज्ञान कुछ भी हो सकता है। पिछले दो दशकों में यानी 21वीं सदी के आरंभ से ही बड़ी तीव्रता से इस विधा में विकास देखा जा सकता है। बड़ी संख्या में रोचक कथानक, अच्छी साज-सज्जा एवं आकर्षक आवरण पृष्ठ के साथ अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने इस विधा को विकसित किया है। बच्चों की रुचि, उनके मनोविज्ञान उनकी समस्याओं एवं पर्यावरण सुरक्षा को लेकर अनेक अच्छे उपन्यास प्रकाशित हुए हैं।
बालजीवनी विधा में भी अनेक बालसाहित्यकार आए हैं। वैज्ञानिक, धार्मिक, सामाजिक हर तरह के क्षेत्र के असामान्य महापुरुषों की जीवनियां लिखी जा रही हैं जिन्हें बच्चे खूब पसंद करते हैं।
यात्रा-वृत्तांत बड़ों के साहित्य में तो अत्यंत लोकप्रिय है और खूब लिखा जा रहा है क्योंकि बालसाहित्य में यह विधा अपेक्षाकृत अभी पीछे है। हालांकि इस क्षेत्र के दो अत्यंत उल्लेखनीय नाम हैं डॉ. राष्ट्रबंधु की पुस्तक 'टेसू जी की भारत यात्रा' और डॉ. सोमनाथ लाल जी की पुस्तक 'भारत के धार्मिक स्थल' इस क्षेत्र की उल्लेखनीय कृतियां हैं।
इन विधाओं के साथ बच्चों में एक विधा जो बहुत ही लोकप्रिय है वह है कॉमिक्स। इसे बालपत्रिकाओं में भी स्थान मिला है, साथ ही साथ स्वतंत्र रूप में कॉमिक्स लिखे जा रहे हैं। यह विधा बच्चों के लिए अत्यंत मनोरंजक विधा है। महापुरुषों पर केंद्रित कॉमिक्स या महान हस्तियों, वैज्ञानिकों, क्रांतिकारियों की कथा से जुड़ी ये चित्रकथाएं बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों को कई जानकारियां प्रदान करती हैं जो उसके व्यक्तित्व से जुड़ी होती हैं।
अनेक नई पत्रिकाएं भी अस्तित्व में आई हैं। पत्रिकाओं में चाहे कुछ पुरानी पत्रिकाएं बंद हुई हैं लेकिन इस तरह विविध विधाओं की यह विकास यात्रा बताती है कि बालसाहित्य का स्वर्णयुग आ गया है।
सृजन और आलोचना दोनों क्षेत्रों में हमारे बालसाहित्यकार बालसाहित्य की हर विधा को निरंतर विकास-पथ की ओर ले जा रहे हैं। इसमें निरंतर शोधकार्य हो रहे हैं। कॉलेजों में एक पूरे पेपर के रूप में बालसाहित्य पाठ्यक्रम में लग चुका है। कई विश्वविद्यालयों में एम.ए. के पाठ्यक्रम में भी शुरू हो गया है। अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में बहुत पहले ही एम.ए. के पाठ्यक्रम में शुरू हो चुका था अब दिल्ली विश्वविद्यालय में भी शुरू हो चुका है। यह सारा सर्वेक्षण हमें आशान्वित करता है कि स्वर्णयुग का प्रारंभ हो चुका है।
21वीं सदी के सक्रिय बालसाहित्यकारों ने विविध विधाओं में लिखा है और अपने प्रदेश्य से बालसाहित्य के भंडार को भरा है। मैंने अपने-अपने क्षेत्र के ख्याति प्राप्त साहित्यकारों के उनके किसी विशिष्ट क्षेत्र में योगदान पर विस्तृत आलेख लिखे हैं जो इस पुस्तक में संकलित हैं।
प्रकाशमनु : बालकविता का नया शिल्प
बालसाहित्य के दिग्गज रचनाकार और बहुचर्चित इतिहासकार प्रकाशमनु की साहित्यिक-यात्रा बहुत लंबी है जिसका एक महत्वपूर्ण पड़ाव बालकविता है। इस लेख में जिसकी विशद चर्चा की है। बालकताओं को नया शिल्प नया रूप देने वाले कवि प्रकाशमनु की कविताएं बच्चों का नटखट, सुंदर, बहुरंगी संसार है। जहां बच्चों के इंद्रधनुषी सपने हैं। छोटी-छोटी इच्छाएं और बड़ी-बड़ी आकांक्षाएं हैं। उनका खेल-जगत है। रूठना-मनाना है। मनु जी की कविताएं सीधे बालमन से जुड़ी हैं जहां हलचल है। जिंदादिली है। अलग-अलग मूड्स की अलग-अलग शेड्स की मनभावन और रसमय कविताएं हैं। आइए देखते हैं उनके आलेख में कैसे इन कविताओं में मनु जी ने कुछ अलग हटकर कहने की कोशिश की है।
विनोदचंद्र पांडेय 'विनोद' : कवि एवं समीक्षक
विनोदचंद्र पांडेय 'विनोद' स्वयं एक सहृदय कवि हैं। कवि होने के साथ-साथ दूसरी ओर एक कुशल मूल्यांकनकर्ता व जागरूक समीक्षक भी हैं। विनोदचंद्र पांडेय की आलोचना बालकविता का स्वरूप प्रस्तुत करती है। उसमें कविता की प्रवृत्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण है। उनके बौद्धिक निष्कर्ष हैं। उन्होंने बालकविता में समय और समाज की संवेदना के स्वरूप में आए बदलावों को देखा-परखा और समझा है। नए-पुराने विषयों में आए परिवर्तन का मंथन किया है। विवेचन-विश्लेषण किया है। बालकों की काव्यगत प्रवृत्तियों का आलेखों एवं पुस्तकों के रूप में सोदाहरण यथास्थान विवरण, विवेचन-विश्लेषण, एवं मूल्यांकन प्रस्तुत करना इस बात का गवाह है कि सर्जक होते हुए भी उनमें शोधपरक दृष्टि है क्योंकि वह स्वयं कवि हैं। अतः दूसरी रचनाओं का भी पूरा-पूरा आनंद लेकर उसके मर्म तक पहुंच कर पुनः पाठकों को भी उस रस में भिगोते हैं।
डॉ. सुनीता मनु : सृजन और आलोचना
बालसाहित्य के क्षितिज पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाली डॉ. सुनीता मनु सृजन और आलोचना दोनों से जुड़ी प्रतिष्ठित लेखिका हैं, जिन्होंने प्रौढ़ साहित्य के साथ-साथ छोटे बच्चों और किशोरों के लिए भी साहित्य रचा है। वह बच्चों की जानी-मानी कथा-लेखिका हैं। उनकी बालकहानियां अनुभव और कल्पना के बीच समावेशी भाव लिए हैं। लेखिका की विशेषता यह है कि वह अपने जीवन में आए पात्रों को विस्मृत नहीं कर पाई हैं। उनके साथ भोगे गए क्षणों, उन छोटे-छोटे अनुभवों को बड़ी आत्मीयता के साथ याद करती हैं और उन्हें कहानियों के रूप में यादगार बना देती हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लेखिका के पास अनुकूल भाषा है। सशक्त अभिव्यक्ति-कौशल है।
सुकृति भटनागर : प्यार-दुलार भरी कविताएँ
सुकृति भटनागर का काव्य संसार प्यार-दुलार भरी कविताओं से भरा हुआ है। उन्होंने हर विषय को बिना उकताहट पैदा किए कविता में ढाल दिया है जो अपनी तुक-लय और गेयता मिश्रित तरन्नुम से बच्चों को गाने-गुनगुनाने के लिए आकर्षित करती हैं। वे बच्चों का मनोरंजन करती हैं, उन्हें आनंद देती हैं। बच्चा उनसे रस प्राप्त करता है और साथ ही खेल-खेल में उस मीठी सीख को भी ग्रहण कर लेता है।
21वीं सदी के चुनिंदा बालउपन्यास
इस पुस्तक में 21वीं सदी के चुनिंदा बालउपन्यास नामक आलेख भी है। बाल उपन्यास विधा की मूल प्रेरणा अंग्रेजी बालसाहित्य है। इसका प्रारंभ बीसवीं सदी के साथ-साथ हुआ। अंग्रेजी बालसाहित्य के परिचय को ही इसकी शुरुआत माना जा सकता है। हिंदी में बालउपन्यासों की परंपरा अंग्रेजी से आई है। पिछले दो दशकों में यानी 21वीं सदी के आरंभ से ही बड़ी तीव्रता से इस विधा में विकास देखा जा सकता है। बड़ी संख्या में रोचक कथानक, अच्छी साज-सज्जा एवं आकर्षक आवरण पृष्ठ के साथ अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने इस विधा को विकसित किया है। बच्चों की रुचि, उनके मनोविज्ञान उनकी समस्याओं एवं पर्यावरण सुरक्षा को लेकर अनेक अच्छे उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बालसाहित्यकारों का ध्यान इस ओर गया। अनेक लेखकों ने उसे पल्लवित, पुष्पित एवं फलित किया है। 21वीं सदी के सभी बालउपन्यासों का यदि विवेचन, विश्लेषण और मूल्यांकन किया जाए, तो पूरा ग्रंथ भी कम पड़ेगा। मैंने एक आलेख की सीमा के भीतर कुछ चुनिंदा बालउपन्यासों की ही चर्चा की है।
अखिलेश जी : कविता में नया आयाम
विषयवस्तु और शैलीगत प्रयोग को लेकर बच्चों की कविता को अखिलेश जी ने नया आयाम दिया है। उसे समसामयिक परिवेश से जोड़ा है। उनकी कविता में बच्चों की अनुभूतियां हैं। उनकी भावनाएं, आकांक्षाएं, सपने हैं इसीलिए वे उन्हें आकर्षित करती हैं। बच्चे उन्हें आत्मसात कर लेते हैं, साथ ही साथ गाते और गुनगुनाते हैं।
जगदीश चंद्र शर्मा : वरिष्ठ बालकवि
वयोवृद्ध वरिष्ठ बालसाहित्यकार जगदीश चंद्र शर्मा लगभग आठ दशकों से निरंतर लिखते आ रहे हैं। वह पुराने दौर के चर्चित बालसाहित्यकार हैं, विशेष रूप से बालकविता। इनकी कविताओं में बच्चों की नटखट उपस्थिति है। उनकी सादगी में अपने ढंग का आनंद है। वे अपनी कल्पना के अनूठेपन से बच्चों को रिझाती हैं। बालकविता ही नहीं किशोरों के लिए भी उन्होंने अनेक कविताएं लिखी हैं। इनकी कविताओं का विषय-वैविध्य पाठकों को आकर्षित करता है। यहां इतिहास और पुराण है तो सामयिक विषय भी हैं। इनमें राष्ट्रीयता का स्वर भी मुखरित हुआ है। इनकी कविताएं मनोरंजक और ज्ञानवर्धक ही नहीं, उद्देश्यपूर्ण भी हैं।
डॉ. रामनिवास 'मानव' : मूल्यपरक गीत
बच्चों के लिए प्रेरक, मनोरंजक, एवं मूल्यपरक गीतों की रचना करने वाले डॉ. रामनिवास 'मानव' का विपुल बालककाव्य है। यह मनोरंजक होने के साथ-साथ मूल्यपरक भी है और बालमनोविज्ञान केंद्रित भी है। वह शुभ संस्कार भी प्रदान करता है। बालमनोविज्ञान का संस्पर्श उन्हें खूबसूरती प्रदान करता है। बालकों के सपने, उनके खेलकूद, उनका हंसना-बोलना, झगड़ना-रूठना और बालसुलभ शैतानियां इन कविताओं की प्रमुख विशेषताएं हैं। मानव जी ने अपनी कविताओं द्वारा बालकों का मात्र मनोरंजन ही नहीं किया बालक को ज्ञान और चिंतन से भी पूरी तरह जोड़ा है। उन्होंने उसके लिए ज्ञान का सुविस्तृत मार्ग भी खोला है। अनेक गीतों में बालकों को सद्गुणों का संदेश भी दिया है। इनकी कविताएं विनोदपरक भी हैं जो बच्चों को गुदगुदाती हैं, हंसाती हैं।
राजकुमार निजात : बालकहानियाँ
हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार राजकुमार निजात की साहित्यिक यात्रा बहुत लंबी है। उनका सृजन जितना विशद है उतना ही सहज है विशेष रूप से बालसाहित्य। बालसाहित्य में भी उनकी कहानियां बच्चों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। इन कहानियों में कहीं बच्चों का भाव-जगत है तो कहीं इच्छा जगत है। कहीं उनके मन की प्रतिछवि है तो कहीं बच्चों का प्रिय वन्य-जगत है। कहीं पूरी प्रकृति और उसके सहचर पशु-पक्षी का जगत हैं। यानी इन कहानियों में बच्चों के स्वाद की हर कहानी मिलेगी जो बच्चों को आकर्षित करती हैं। वैसे भी बच्चा हर प्रकार की कहानी को चाव से पढ़ना चाहता है। बच्चों की उस चाहत को बालमनोविज्ञान के पारखी लेखक ने बखूबी समझा है। तभी उनकी रुचि के अनुरूप उन्होंने कहानियां लिखी हैं।
21वीं सदी की बालकहानी : कितनी नई, कितनी पुरानी
21वीं सदी की बालकहानी का आधार-बिंदु बालक, उसका मनोविज्ञान और उससे जुड़ा परिवेश होता है। युगानुरूप इसका परिवेश बदला है। कल की कहानी यानी 19वीं-20वीं सदी की कहानी से आज की कहानी का मिज़ाज बिल्कुल बदला हुआ है और सच तो यह है कि वक्त के साथ-साथ निरंतर बदल रहा है।
निश्चय ही हर युग के हर समाज के अपने आदर्श होते हैं और उसी के अनुरूप ही साहित्य लिखा जाता है। आज बच्चों की मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। बच्चों का मनोरंजन करना अथवा उन्हें कल्पना-लोक में ले जाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें युग की वास्तविकताओं एवं समसामयिक समस्याओं से भी परिचित भी कराना आवश्यक है। इस दिशा में हमारे अनेक लेखक प्रयत्नशील भी हैं।
आज की कहानी युग को अपने साथ लेकर चली है और बदलते हुए आदर्शों व समय-संदर्भों में निरंतर विकसित हो रही है। इसमें कथ्य-शिल्प और दृष्टि का नयापन विद्यमान है। ऐसे अछूते अनेक विषय हैं जिन्हें लेकर कहानियां लिखी जा रही हैं।
आज की ज्वलंत समस्याओं को केंद्र में रखते हुए अनेक कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित हो रही हैं। कहना होगा कि हिंदी बालकहानी की यात्रा निरंतर गतिमान है।
पहेली विधा : परंपरा और विकास
पहेली विधा लोकसाहित्य की सबसे पुरानी विधा है। निश्चित रूप से पहेलियों का जन्म भी लोककथा एवं लोकगीत की भांति हुआ होगा। हिंदी में बच्चों की पहेलियों का उद्गम अलिखित साहित्य में पाया जाता है। पहेलियों का अपना इतिहास है। हमारा लोकसाहित्य लिपि के अभाव में वाचिक परंपरा एक मुख से दूसरे मुख तक चलता आ रहा है। जब से लिपि का विकास हुआ तब से पहेलियों के रचनाकारों का नाम भी प्रकाशित होने लगा है। इस आलेख में पहेली विधा का स्वरूप, परंपरा और विकास पर विचार करते हुए डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' के पहेली विधा में प्रदेश्य पर प्रकाश डाला है।
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' की साहित्यिक यात्रा बहुत लंबी है, जिसका एक पड़ाव है उनका पहेली-लेखन। नागेश पांडेय 'संजय' ने पारंपारिक विधान से हटकर नए ढंग की पहेलियां लिखी हैं। उनकी पहेलियों को बूझते हुए बच्चे आनंदित होते चलते हैं। इनकी बहुत सी पहेलियां परिचयात्मक हैं। उन्हें बूझते हुए बच्चों के मन में जानकारियां भी पुष्ट होती हैं। इनकी पहेलियों में विषय की व्यापकता मुग्ध करती है। वे कवि के चिंतक, विचारक, विज्ञान के ज्ञाता रूप को दर्शाती हैं। बच्चों का बौद्धिक व्यायाम कराते हुए चलती हैं। इनकी पहेलियां केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं मानसिक व्यायाम, बौद्धिक व्यायाम भी कराती हैं।
विमला रस्तोगी : मुस्कुराता बचपन
पुस्तक में बालमनोविज्ञान पर केंद्रित वरिष्ठ एवं ख्याति प्राप्त लेखिका विमला रस्तोगी का एक आलेख भी है 'मुस्कुराता बचपन सोचते मां-बाप'। इस आलेख में बच्चों से जुड़ी विविध समस्याओं को न केवल लिया है वरन् उनका समाधान भी दिया है। इनके आलेखों का निचोड़ यह है कि हम बालकों के मनोविज्ञान को समझें क्योंकि किसी भी अभिभावक के लिए बच्चे उसकी सबसे बड़ी पूंजी/संपत्ति हैं। इन आलेखों की एक सबसे अच्छी बात यह है कि स्थितियों को ज्यों का त्यों लिखना मात्र लेखिका ने अपना दायित्व नहीं माना है और न ही प्रश्न-चिह्न लगाकर उन्हें छोड़ दिया है। उन्होंने कई-कई उदाहरण लेकर भुक्तभोगी परिवारों और उनके बच्चों से मिलकर उनके सकारात्मक हल भी दिए हैं।
कृष्ण 'शलभ' : साहित्यिक मनीषियों के आईने में
मेरी इस पुस्तक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख है 'कृष्ण 'शलभ' : साहित्यिक मनीषियों के आईने में'। इस पुस्तक में 'शलभ' जी के व्यक्तित्व के कई अनछुए पक्ष सामने आए हैं। उनके कृतित्व का विभिन्न विद्वानों द्वारा विश्लेषणात्मक और मूल्यांकनपरक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
दिवोद रमेश : अनुवादक के रूप में
इस पुस्तक में दिवोद रमेश के अनुवादक रूप में लिए गया एक लंबा साक्षात्कार भी है जिसमें अनुवाद से जुड़ी अनेक जानकारियों से पाठक रूबरू होता है। अच्छा अनुवाद क्या है, अनुवादक के क्या गुण हैं, अनुवाद की क्या उपयोगिता है, आदि विभिन्न बिंदुओं पर संवाद-प्रतिसंवाद हुआ है। एक अनुवादक के रूप में दिवोद जी के प्रदेश्य को भी रेखांकित किया गया है।
21वीं सदी की हिंदी बालकविता : बदलते रंग-रूप
पुस्तक का अंतिम आलेख 21वीं सदी की हिंदी बालकविता & बदलते रंग रूप है। हिंदी बाल साहित्य पर यदि एक विहंगम दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बालकों के लिए विशेष साहित्य के सृजन की परंपरा का प्रारंभ 20वीं शती से होता है।
डॉ. प्रकाश मनु के अनुसार बीसवीं सदी ने ही हिंदी की ऐसी बाल कविता को जन्म दिया जिसने भारतीय बचपन का मानसिक और भावनात्मक पोषण किया। उसे उन्मुक्त हंसी, उमंगों और मीठी खिलखिलाहटें बांटी।
21वीं शताब्दी की कविताओं को हिंदी बाल साहित्य का सुंदर नमूना कहा जा सकता है। इन कविताओं में बच्चों के सपनों का संसार है। ये कविताएं बच्चों की उसी मनोरम कल्पनालोक की सैर कराती हैं। ये कविताएं बच्चों के जीवन और बाल स्वभाव के निकट हैं। इन्हीं कवियों की कविताएं आने वाले बाल साहित्य की प्रेरणा बनीं। बच्चों की उम्र और ग्रहणशीलता की सामर्थ्य के अनुसार ही विषय-चयन और भाषा-शैली इस युग की कविताओं की प्रमुख विशेषताएं हैं। बालजीवन के जितने भी रंग हो सकते हैं वे सब इस युग की कविता में विद्यमान हैं।
आज की बाल कविता का वैशिष्ट्य यह है कि उसमें हर विषय बड़ी सरलता से समा गया है। उसमें कल्पना-तत्व या भाव-प्रवणता सबमें बाल मनोविज्ञान है, कृत्रिमता कहीं नहीं है। यही कारण है कि समकालीन कविता परंपरागत कविता के बीच अलग दिखती है। वह पिटी-पिटाई लीक की परिधि को लांघकर संभावना के नए द्वार खोलती है। अनूठे विषय और नायाब प्रस्तुति जिन्हें यादगार बाल कविता बना देती हैं।
यह सभी आलेख स्वतंत्र हैं जिनमें कोई भी पूर्वापर कोई संबंध नहीं है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भिन्न-भिन्न विषयों पर आधारित यह आलेख बालसाहित्य के पाठकों एवं शोधार्थियों के लिए इन्हें मैंने एक जिल्द में पुस्तक रूप में संग्रहीत किया है ताकि सभी इससे लाभान्वित हो सकें।
अंत में मैं नटराज प्रकाशन के सम्मानीय प्रकाशक श्री तहसीलदार सिंह राघव का हृदय से आभार प्रकट करती हूं जिन्होंने सारी सामग्री को पुस्तक रूप में संजोकर पाठकों को सुलभ कराया है। उनके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करती हूं।
पाठकों की प्रतिक्रिया और स्वस्थ सुझावों की प्रतीक्षा में ---------- रामनवमी, 27 मार्च, 2026
संस्मरण विधा की शैली से परिचित कराने का श्रेय मनु जी को है।
— यह आलेख-संग्रह '21वीं सदी का हिंदी बालसाहित्य : विविध सोपान' के रूप में प्रकाशित है।